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Same Sex Marriage: LGBTQIA कैटेगरी के अभिभावकों ने CJI को लेटर लिखा, रेनबो शादियों को कानूनी मान्यता की गुहार

Same Sex Marriage को कानूनी मान्यता देने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। CJI Chandrachud ने सरकार से कई तीखे सवाल किए हैं। इसी बीच LGBTQIA कम्युनिटी के बच्चों के अभिभावकों ने चीफ जस्टिस को लेटर लिखा है।

Same Sex Marriage

Same Sex Marriage को कानूनी मान्यता दी जाए या नहीं, इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में जिरह हो रही है। CJI Chandrachud की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ में समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने के पक्ष में पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी पैरवी कर रहे हैं।

20 से अधिक याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हो रही है। अब LGBTQIA कैटेगरी में आने वाले युवकों के parents ने सीजेआई को लेटर लिखा है। इन अभिभावकों ने गुहार लगाई है कि उन्हें रेनबो शादियों को कानूनी मान्यता मिलने की पूरी उम्मीद है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को लिखे एक पत्र में, भारतीय LGBTQIA+ बच्चों के माता-पिता ने विवाह की समानता के लिए याचिका पर विचार करने की अपील की। इनकी दलील है कि "हम अपने जीवनकाल में अपने बच्चों के इंद्रधनुषी विवाहों पर कानूनी मुहर देखने की उम्मीद करते हैं।"

स्वीकार - द रेनबो पेरेंट्स नामक समूह के भारतीय LGBTQIA+ बच्चों के माता-पिता की तरफ से लिखे गए पत्र में कहा गया, "हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे और हमारे बच्चे अपने देश में विशेष विवाह अधिनियम के तहत अपने रिश्ते के लिए कानूनी स्वीकृति प्राप्त करें।

सीजेआई की अगुवाई वाली संविधान पीठ से सकारात्मक फैसले की आशा कर रहे अभिभावकों ने कहा, "हमें यकीन है कि हमारे जितना बड़ा देश, जो अपनी विविधता का सम्मान करता है और समावेश के मूल्य के लिए खड़ा है, हमारे बच्चों के लिए भी विवाह समानता के अपने कानूनी द्वार खोल देगा।

भावुकता से भरे पत्र में कहा गया, हम बूढ़े हो रहे हैं। हम में से कुछ जल्द ही 80 साल के हो जाएंगे। हम आशा करते हैं कि हमें अपने जीवनकाल में अपने बच्चों की इंद्रधनुषी शादियों पर कानूनी मुहर देखने को मिले।

स्वीकार - द रेनबो पेरेंट्स समलैंगिक कैटेगरी के माता-पिता संचालित करते हैं। इनका मकसद LGBTQIA+ के माता-पिता की मदद करना है। देश के कोने-कोने में 400+ से अधिक ऐसे माता-पिता हैं।

सुप्रीम कोर्ट में सुने जाने वाले मुकदमों के मास्टर ऑफ रोस्टर- चीफ जस्टिस से इन अभिभावकों ने कहा, "लिंग और कामुकता के बारे में जानने से लेकर अपने बच्चों के जीवन को समझने तक, अंतत: उनकी कामुकता और अपने प्रियजनों को स्वीकार करने तक - हम भावनाओं के पूरे दायरे से गुज़रे हैं।"

इन अभिभावकों ने कहा, हम उन लोगों के साथ सहानुभूति रखते हैं जो विवाह समानता का विरोध कर रहे हैं क्योंकि हम में से कुछ वहां थे। माता-पिता ने कहा, हमें अपने LGBTQIA+ बच्चों के साथ शिक्षा, बहस और धैर्य के साथ यह महसूस करना पड़ा कि उनका जीवन, भावनाएं और इच्छाएं वैध हैं।

भारतीय LGBTQIA+ बच्चों के माता-पिता ने कहा, "इसी तरह, हम आशा करते हैं कि जो लोग विवाह समानता का विरोध करते हैं वे भी सामने आएंगे। हमें भारत के लोगों, संविधान और हमारे देश के लोकतंत्र पर भरोसा है।"

बता दें कि 6 सितंबर, 2018 को, सर्वोच्च न्यायालय ने यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाली धारा 377 को निरस्त कर दिया था। इस सबंध में द रेनबो पेरेंट्स ने कहा कि समलैंगिक संबंध के बारे में अदालत का रूख पता चला।

पत्र में आगे कहा गया है, "हम आपसे विवाह समानता की याचिका पर विचार करने की अपील कर रहे हैं।" गुहार लगाई गई कि उनके बच्चों के साथ सम्मान और स्वीकृति के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए।

पत्र में आगे कहा गया है कि जेंडर और सेक्सुएलिटी को चुनावी घोषणापत्रों में शामिल किया गया है। कॉरपोरेट इंडिया ने भी धीरे-धीरे समलैंगिक जीवन के विचार को अपनाना शुरू कर दिया है। समाज एक बदलती और विकसित होने वाली इकाई है।

सीजेआई के पास लिखे लेटर में इन अभिभावकों ने कहा, जिस तरह एक बढ़ती हुई ज्वार सभी नावों को उठा लेती है, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने समाज पर एक प्रभाव पैदा किया। नफरत से सहनशीलता की ओर ले जाने में मदद मिली।

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