सपा में दो फाड़, अब उठेगा सवाल कि असली समाजवादी कौन!
सपा में दो फाड़ होने की सियासी घटना के बाद अब यह सवाल गूंजेगा कि आखिर असली समाजवादी है कौन? साथ ही सपा समर्थकों के बीच भी असमंजस की स्थिति बनेगी कि वह किस खेमे में जाएं?
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पिछले करीब तीस वर्षों से कई बार सरकार बनाने वाली समाजवादी पार्टी अब अधिकृत रूप से दो फाड़ हो गई है। पूर्व में राज्य की सत्ता पर काबिज रहने वाली असली समाजवादी पार्टी का गठन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव ने किया था। हाल ही में बीते विधानसभा चुनाव से पूर्व यूपी के इस खास सियासी घराने में राजनीतिक मिल्कियत को लेकर छिड़े ड्रामे के बाद पार्टी की कमान अखिलेश यादव के हाथ में आ गई थी। फलस्वरूप परिवार और परिवार के बाहर के सभी अखिलेश विरोधी लोग किनारे लग गए। आखिरकार, विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार हुई। स्वाभाविक है, अखिलेश से खार खाए लोग उनके सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए यह कयास लगाने लगे थे कि पार्टी में बहुत जल्द विभाजन होगा, सो हो गया। सपा में हाशिए पर चल रहे शिवपाल यादव ने अपनी अलग पार्टी समाजवादी सेक्युलर मोर्चा के गठन की की है। दिलचस्प है अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव ही शिवपाल यादव की पार्टी समाजवादी सेक्युवलर मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे। 05 मई को घटी इस बड़ी सियासी घटना के बाद अब यह सवाल गूंजेगा कि आखिर असली समाजवादी है कौन? साथ ही सपा समर्थकों के बीच भी असमंजस की स्थिति बनेगी कि वह किस खेमे में जाएं?

सबसे पहले हम समाजवाद की परिभाषा जानने की कोशिश करते हैं। दरअसल, समाज को अवांछित विक्षोभ, आपसी अविश्वास, असमानता, द्वंद्व, अशांति आदि से बचाने के लिए एक कल्याणकारी व्यवस्था की परिकल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी। उन मनुष्यों ने जिनकी विद्वता स्थापित थी, जिनके दिलों में दूसरों के प्रति चिंताएं थीं, जो बुद्धिमान, उदार, सहिष्णु, न्यायप्रिय, संवेदनशील और सबका भला सोचने वाले थे, उन लोगों ने एक अनुकूल वातावरण पैदा किया ताकि संसाधनों के सदुपयोग तथा उनके द्वारा अर्जन-उपार्जन और वितरण को लेकर किसी प्रकार का झगड़ा न रहे। लोग दूसरों की जरूरतों का भी उतना ही ख्याल रखें, जितना वे अपनी जरूरतों का रखते हैं। सच पूछिए तो समाजवाद की नींव यही है। फिर भी समाजवाद को सीधे-सरल शब्दों में परिभाषित करने को कहा जाए तो उसका अर्थ होगा, ऐसी व्यवस्था जिसमें समाज के संसाधनों पर जन-जन का साझा हो। सभी लोग अपनी क्षमतानुसार काम करें। अर्जित संपत्ति का मिल-बांटकर, अपने और सर्व-हित में उपयोग करें। उसका प्रबंधन समाज द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित व्यवस्था, सरकार द्वारा किया जाता हो। सरकार प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार काम लेकर, हर एक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप लौटाए। यह बिना समर्पण और त्याग के असंभव है। यानी व्यक्ति त्याग करेगा तभी तो दूसरे के अभावों की पूर्ति के संसाधन जमा होंगे। यह कोई पहेली नहीं, सीधी-सी व्यवस्था थी। त्याग और भोग के बीच संतुलन बनाए रखने की।
दूसरे शब्दों में 'समाजवाद' वह कल्याणकारी व्यवस्था है, जिसमें नागरिकों के बीच निजता का लोप होकर, कल्याण का समविभाजन होने लगता है। यह कामना आज की नहीं है। जब से समाज का गठन हुआ है, मनुष्य ने संगठित होना सीखा है, तभी से किसी न किसी रूप में चली आ रही है। हालांकि इसमें विक्षोभ भी हुए हैं। दूसरे का हिस्से पर अधिकार जमा लेने वाले, लोगों के श्रम, उनके खून-पसीने की कमाई पर जीवनयापन करने वाले और दूसरों का हक मारकर विलासितापूर्ण जीवन जीने वाले लोग भी समाज में रहे हैं। उन्होंने समाज को अपनी मर्जी के अनुसार हांकने की कोशिश भी है। समाजवाद कहता है कि लोग अपने-अपने दायित्वों को समझें। उनका पालन करें। उनके बीच जाति, लिंग, वर्ण, भाषा, क्षेत्र, जन्म आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का द्वैत अथवा विभाजन न हो। ऊपर से नीचे तक सभी कुछ एक समान हो। समाज की संपदा में उसके सभी वर्गों, इकाइयों का साझा हो। वह समाज के सभी वर्गों, इकाइयों के साथ इस तरह घुली-मिली हो जैसे शर्करा पानी में घुल-मिल जाती है। फिर उसको कहीं से भी चखकर देखो, उसमें एक समान मिठास मिलती है। समाजवाद की परिकल्पना का आधार यह सिद्धांत है कि पूरी सृष्टि एक परिवार है। हम सब धरती के गर्भ से उपजे उसकी संतान हैं। समाजवाद की भावना भले लोगों के मन में आदिकाल से रहती आई हो। इसके लिए उद्धरण वेदों से लिए जा सकते हैं, उपनिषदों और महाकाव्यों से लिए जा सकते हैं। लोकसंस्कृति और लोकसाहित्य में भी इसके अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन एक समाजार्थिक प्रणाली के रूप में समाजवाद आधुनिक अवधारणा है।
यूं कहें कि समाजवाद कोई राजनीतिक प्रणाली नहीं है। किसी एक राजनीतिक प्रणाली पर यह निर्भर भी नहीं है। यह समाजवाद की खूबी भी है और कमजोरी भी। खूबी इसलिए कि कोई भी राजनीतिक प्रणाली जो अरस्तु के शब्दों में 'शुभ की स्थापना' को अपना लक्ष्य मान चुकी है, समाजवादी सपने को आसानी से साकार कर सकती है। कमजोरी यह कि हिटलर जैसे तानाशाह भी खुद को समाजवादी बताकर सत्तासीन होते आए हैं। अपनी इन्हीं खूबियों-खामियों के कारण 'समाजवाद' शुरू से ही विवादास्पद पद रहा है। इसकी परिभाषा पर बुद्धिजिवियों के बीच मतांतर रहे हैं। सबसे पहली परिभाषा अलेक्सेंडर विनेट की ओर से आई थी कि 'समाजवाद पूंजीवाद का विलोम है।' पर इससे समाजवाद की परिभाषा अस्पष्ट थी। उससे समाजवाद की विशेषताओं का पता ही नहीं चलता था। न यह पता चलता था कि पूंजीवाद और समाजवाद में मानवमात्र के लिए कौन अधिक कल्याणकारी है। फिलहाल, हम नवसमाजवाद की चर्चा कर रहे हैं। इधर, मुलायम सिंह यादव को कुछ वर्षों से इस समाजवाद के प्रणेता के रूप में कुछ लोग (उनके समर्थक) देखने लगे थे। मुलायमवादियों को यह लगने लगा था कि 'नेताजी' ही इस धरती पर समाजवाद के सपने को पूरा कर रहे हैं और कर सकते हैं। पर हकीकत इससे कोसों दूर रही। मुलायम सिंह यादव का समाजवाद उनके परिवार के इर्दगिर्द ही सिमटकर रह गया। मुलायम सिंह यादव के परिवार और रिश्तेदारी का शायद ही कोई व्यक्ति बचा हो, सत्ता के गलियारे में अठखेलियां न करता हो। यदि मुलायम सिंह यादव के समाजवाद को 'फर्जी' कह दिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
खैर, 05 मई को अधिकृत रूप यह स्पष्ट हो गया कि समाजवादी पार्टी दो फाड़ हो गई है। एक के मुखिया अखिलेश यादव और दूसरे के मुखिया मुलायम सिंह यादव होंगे। यह कितना हास्यास्पद भी है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पुत्र अखिलेश यादव और समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा के अध्यक्ष पिता मुलायम सिंह यादव होंगे। अखिलेश यादव के चाचा और पूर्व मंत्री शिवपाल यादव (जिन्हें अखिलेश ने अपने मंत्रिमंडल से कई बार बेदखल किया और पिता मुलायम के कहने पर वापस लिया) ने कहा कि नेताजी (मुलायम सिंह यादव) के सम्मान की खातिर नई पार्टी (समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा) का गठन किया जा रहा है। पिछले कई दिनों से इस मुद्दे पर मंथन चल रहा था कि मुलायम सिंह यादव को पुरानी समाजवादी पार्टी की कमान पुनः सौंपी जाए अथवा दूसरी पार्टी बनाई जाए। सूत्रों का कहना है कि इस संबंध में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से भी कहा गया था कि वे अध्यक्ष पद छोड़ दें और मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने दें। लेकिन लगता है कि इस मुद्दे पर बात नहीं बन सकी। मुलायम के परिवार में इसे लेकर दो फाड़ थी। अपर्णा यादव भी कह चुकी हैं कि मुलायम सिंह को अध्यक्ष पद लौटा दिया जाना चाहिए। उनके परिवार में मुलायम सिंह यादव, उनकी दूसरी पत्नी साधना यादव और छोटे बेटे प्रतीक यादव, बहू अपर्णा यादव और शिवपाल एक तरफ हैं जबकि रामगोपाल यादव परिवार के इस विवाद में शुरू से ही मुलायम और शिवपाल के खिलाफ अखिलेश के साथ खड़े हैं। फलस्वरूप शिवपाल सिंह यादव ने नई पार्टी की घोषणा करते हुए मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। अब देखना यह है कि मुलायम सिंह यादव का परिवार किस पार्टी को असली समाजवादी की संज्ञा देता है?
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