Sabarimala: मंदिरों में ‘प्रसाद में शराब’ से पुरुषों की एंट्री बैन तक—सबरीमाला केस सुनवाई में क्या-क्या हुआ?
Sabarimala Hearing: सुप्रीम कोर्ट में चल रही सबरीमाला केस की सुनवाई अब सिर्फ एक मंदिर या एक परंपरा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे देश में धार्मिक अधिकारों, परंपराओं और संविधान के बीच संतुलन की बड़ी बहस बन चुकी है। 9 जजों की संविधान पीठ लगातार तीसरे दिन इस मामले पर सुनवाई कर रही है और हर दिन नई-नई दलीलें और सवाल सामने आ रहे हैं। हालांकि सबरीमाला केस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अब 4 अप्रैल को होगी।
इस सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार, सॉलिसिटर जनरल, जजों और वकीलों के बीच जो चर्चा हुई, उसने कई अहम मुद्दों को सामने ला दिया है-चाहे वो मंदिरों में प्रसाद के तौर पर शराब देने की परंपरा हो या फिर कुछ मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर रोक। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक सुनवाई की एक-एक बड़ी बात, किसने क्या कहा और कोर्ट का रुख क्या रहा।

🔹शराब का प्रसाद और शाकाहार की जिद: सरकार की दिलचस्प दलीलें
सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) केएम नटराज ने एक बहुत ही व्यावहारिक उदाहरण पेश किया। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के कई मंदिरों में सदियों से शराब (मदिरा) प्रसाद के रूप में दी जाती है। उन्होंने तर्क दिया कि कल को कोई कोर्ट में आकर यह नहीं कह सकता कि मंदिर में शराब देना बंद करो क्योंकि यह उसकी अंतरात्मा के खिलाफ है।
सरकार की दलील का सार यह था कि धार्मिक रीति-रिवाजों को किसी एक व्यक्ति की पसंद-नापसंद के तराजू पर नहीं तौला जा सकता। एएसजी नटराज ने कहा, "सोचिए अगर किसी शाकाहारी मंदिर में कोई जाकर यह कहे कि मेरी पसंद मांसाहार है और मुझे यहां मांस परोसा जाना चाहिए, तो क्या यह संभव है? बिल्कुल नहीं। उस व्यक्ति को दूसरे श्रद्धालुओं के अधिकारों और मंदिर की परंपरा में दखल देने का कोई हक नहीं है।"
उन्होंने यह भी समझाया कि जैसे किसी मंदिर में सिर्फ शाकाहारी भोजन ही प्रसाद के रूप में दिया जाता है, तो कोई व्यक्ति वहां जाकर मांसाहार की मांग नहीं कर सकता। इसी तरह हर धार्मिक परंपरा का सम्मान होना चाहिए और कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद के आधार पर उसे बदलने की मांग नहीं कर सकता।
🔹 'कई मंदिरों में पुरुषों की एंट्री पर भी रोक'
सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सबरीमाला का फैसला इस धारणा पर आधारित लगता है कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाओं को निचले स्तर पर रखा गया है। लेकिन असलियत में कई जगह इसके उलट परंपराएं हैं। उन्होंने कई ऐसे मंदिरों के नाम गिनाए जहाँ पुरुषों का जाना वर्जित है:
पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर: यहां विवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है।
देवी भगवती मंदिर: यहां कुछ विशेष मान्यताओं के कारण पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित है।
केरल का एक विशेष मंदिर: यहां पुरुष केवल महिलाओं के कपड़े (साड़ी) पहनकर और सोलह श्रृंगार करके ही प्रवेश कर सकते हैं। वे बकायदा ब्यूटी पार्लर जाते हैं और उनकी परिवार की महिला सदस्य उन्हें तैयार करती हैं।
महिला भक्तों के पैर धोना: मेहता ने बताया कि ऐसे भी मंदिर हैं जहाँ पुरुष पुजारियों के लिए धार्मिक रूप से यह अनिवार्य है कि वे महिला भक्तों के पैर धोएं।
इन उदाहरणों के जरिए सरकार यह साबित करना चाहती है कि धार्मिक परंपराएं किसी एक जेंडर के खिलाफ नहीं, बल्कि उस देवता और विश्वास के स्वरूप पर आधारित होती हैं।
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पैसा जनता का और मंदिर केवल अपना? वैद्यनाथन का कड़ा तर्क
वरिष्ठ वकील वैद्यनाथन ने एक बहुत ही पते की बात कही। उन्होंने तर्क दिया कि अगर कोई मंदिर सिर्फ अपने ही समुदाय के लोगों के लिए आरक्षित रहना चाहता है, तो उस मंदिर को सरकार या आम जनता से किसी भी तरह का फंड या दान (Donation) नहीं लेना चाहिए। उनका कहना था कि यदि आप 'सार्वजनिक' मदद लेते हैं, तो आप 'सार्वजनिक प्रवेश' से इनकार नहीं कर सकते।
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर कोई प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ नहीं है, तो उसे माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर कोई मंदिर किसी खास संप्रदाय का है, तो उस संप्रदाय को यह तय करने का पूरा अधिकार होना चाहिए कि वहां पूजा की अनुमति किसे देनी है।

🔹 9 जजों की बेंच किन सवालों पर कर रही है सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ सात बड़े संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है।
इसमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है और क्या कोर्ट यह तय कर सकता है कि कौन-सी प्रथा 'जरूरी धार्मिक प्रथा' (Essential Religious Practice) है।
यह मामला 2018 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। उस फैसले के बाद देशभर में विरोध हुआ और कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
2019 में कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए बड़े संवैधानिक सवालों को 9 जजों की बेंच को भेज दिया था, जिस पर अब सुनवाई हो रही है।
🔹 अनुच्छेद 25 और 26 पर गहरी बहस
एएसजी नटराज ने कोर्ट में कहा कि धार्मिक अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत सुरक्षित हैं और ये दोनों आपस में जुड़े हुए हैं।
उन्होंने समझाया कि
- अनुच्छेद 25 व्यक्ति को धर्म मानने और पालन करने का अधिकार देता है
- अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने नियम बनाने का अधिकार देता है
उन्होंने कहा कि इन दोनों को साथ में समझना होगा और किसी एक को दूसरे से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि 'Essential Religious Practice' तय करना भारत जैसे विविध देश में आसान नहीं है और कोर्ट को इसमें बहुत सीमित दखल देना चाहिए।
🔹 जस्टिस नागरत्ना की चिंता: समाज बंट जाएगा
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने साफ कहा कि अगर मंदिरों में प्रवेश को लेकर अलग-अलग समुदायों को रोका जाएगा, तो इससे समाज में विभाजन बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को मंदिर और मठ में जाने का अधिकार होना चाहिए। अगर हर समुदाय अपने-अपने मंदिर बनाकर दूसरों को रोकेगा, तो इससे सामाजिक एकता कमजोर होगी। उन्होंने यह भी कहा कि जितने ज्यादा लोग अलग-अलग मंदिरों में जाएंगे, उतना ही धर्म मजबूत होगा।
🔹'अगर दूसरों को रोकते हैं, तो फंड भी न लें'
सीनियर वकील वैद्यनाथन ने एक अलग नजरिया रखा। उन्होंने कहा कि अगर कोई मंदिर सिर्फ एक खास समुदाय के लिए है, तो उसे सरकार या आम जनता से फंड नहीं लेना चाहिए।
उनका तर्क था कि अगर आप दूसरों को प्रवेश नहीं दे रहे हैं, तो उनसे आर्थिक मदद भी नहीं ले सकते। हालांकि इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ऐसा करना खुद उस समुदाय के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
🔹 आर्टिकल 17: छुआछूत पर CJI की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जब मौलिक अधिकारों की बात आई, तो चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने अनुच्छेद 17 (छुआछूत का अंत) को बहुत 'ताकतवर' प्रावधान बताया। सीजेआई ने कहा कि अनुच्छेद 17 सिर्फ एक कानूनी अपराध नहीं है, बल्कि संविधान खुद इसे एक गंभीर संवैधानिक अपराध घोषित करता है।
वैद्यनाथन ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि यह प्रावधान हमारे इतिहास के अन्यायों का 'प्रायश्चित' है। बहस इस बात पर भी हुई कि क्या सरकार सामाजिक सुधार के लिए जो कानून बनाती है, वह धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों (आर्टिकल 26) पर असर डाल सकता है? सीजेआई ने साफ किया कि थ्योरी में कुछ भी कहना कठिन है, यह हर केस के तथ्यों के हिसाब से तय होगा।
🔹 क्या कोर्ट तय करेगा धार्मिक प्रथा?
इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल यही है कि क्या कोर्ट यह तय कर सकता है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा सही है और कौन-सी नहीं। केंद्र सरकार का कहना है कि यह काम कोर्ट का नहीं है, क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहां की विविधता को देखते हुए हर परंपरा को समझना जरूरी है। वहीं, कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि अगर कोई प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसमें दखल देना जरूरी हो सकता है।
क्या है इस पूरी सुनवाई का निचोड़?
सबरीमाला का यह मामला अब केवल महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब एक बड़ी कानूनी लड़ाई बन चुका है जिसमें निम्नलिखित सवाल शामिल हैं:
व्यक्तिगत अधिकार बनाम संस्थागत अधिकार: आपकी अपनी आस्था बड़ी है या मंदिर की परंपरा?
संवैधानिक नैतिकता: क्या धर्म के मामले में कोर्ट अपनी नैतिकता थोप सकता है?
न्यायिक समीक्षा की सीमा: कोर्ट किसी मंदिर के 'अनिवार्य धार्मिक अभ्यास' (ERP) में कितना हस्तक्षेप कर सकता है?
9 जजों की यह बेंच, जिसमें जस्टिस नागरत्ना, जस्टिस सुंदरेश, जस्टिस बागची और अन्य शामिल हैं, इस बात पर मंथन कर रही है कि क्या धर्म के आंतरिक मामलों की जांच बाहरी अदालतों द्वारा की जानी चाहिए या नहीं।
अगले कुछ दिनों की सुनवाई और भी अहम होने वाली है, क्योंकि इसमें पारसी महिलाओं के टावर ऑफ साइलेंस में प्रवेश और मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश जैसे मुद्दे भी जुड़ सकते हैं। फिलहाल, सरकार का रुख स्पष्ट है धर्म को उसकी आंतरिक मान्यताओं के हिसाब से ही चलने दिया जाना चाहिए, बशर्ते वह किसी की जान या स्वास्थ्य के लिए खतरा न हो।
सबरीमाला केस की यह सुनवाई भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 'मील का पत्थर' साबित होगी। यह तय करेगा कि भारत में धर्म का स्वरूप क्या होगा और संवैधानिक अधिकार मंदिरों की दहलीज के भीतर किस हद तक प्रभावी होंगे।
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