विधानसभा चुनावों से पहले जम्मू-कश्मीर में दल-बदली जारी

इस वक़्त कश्मीर में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, लेकिन राज्य में सियासी पारा चढ़ा हुआ है.

अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं का दल बदल जारी है.

हड्डियां गलाने वाले इस ठंड में वहां राजनीतिक पार्टी छोड़ने, गठजोड़, फॉर्मूला और राजनीतिक बयानबाज़ी का सिलसिला जारी है.

19 जून 2018 को राज्य की बीजेपी-पीडीपी सरकार गिर गई. तबसे घाटी की राजनीति में उथल-पुथल बनी हुई है. दोनों पार्टियां मिलकर तीन साल से ज़्यादा वक़्त तक राज्य की सत्ता पर क़ाबिज़ रही थीं.

सरकार गिरने के बाद भी असेंबली को कोई दूसरी सरकार बनने की उम्मीद में भंग नहीं किया गया था.

लेकिन पीडीपी नेता महबूबा मुफ़्ती की सरकार बनाने की क़वायद के बीच राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने 21 नवंबर 2018 को विधानसभा भंग कर दी थी.

पीडीपी-बीजेपी गठबंधन टूटने के बाद कश्मीर का सियासी पारा किस क़दर चढ़ा, इस बात का अंदाज़ा 19 जून 2018 के बाद से हो रहे घटनाक्रमों से लगाया जा सकता है. इन घटनाक्रमों से कश्मीर की मुख्यधारा की राजनीति में कई बदलाव आए.

राजनीतिक संभावनाओं की चर्चा

राज्य के राजनीतिक क्षितिज पर नई राजनीतिक संभावनाओं को लेकर चर्चा ज़ोरों पर है.

एक ओर जहां नेता, विधायक और कार्यकर्ता दल-बदल में लगे हैं, वहीं राज्य में एक तीसरा मोर्चा बनाने की बात भी की जा रही है.

इस तीसरे मोर्चे में कई बड़े राजनीतिक चेहरों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है.

तीसरे मोर्चे के गठन का विचार सीपीआई (एम) राज्य सचिव और विधायक एम वाई तारिगामी, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट के चेयरमैन हकीम यासीन और जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक पार्टी (नेशनलिस्ट) के अध्यक्ष ग़ुलाम हसन मीर का था.

तीसरा मोर्चा बनाने की बात कर रहे नेताओं का कहना है कि आने वाले दिनों में एकसमान सोच वाले लोगों का फ्रंट बन सकता है.

हकीम यासीन ने बीबीसी से कहा, "तीसरा मोर्चा बनाने का मक़सद इस अनिश्चितता और रक्तपात को ख़त्म करना है. कुछ जागरूक लोग तीसरे मोर्चे के साथ जुड़ने के लिए सामने आए हैं. हमें कोई राजनीतिक विकल्प चाहिए. कश्मीर अब राजनीतिक बदलाव चाहता है."

इस तीसरे मोर्चे को लेकर पिछले तीन साल से ख़बरें आ रही हैं.

तीसरे मोर्चे से जुड़ी अटकलों और अफ़वाहों के बीच इसकी अगुवाई कर रहे पूर्व अलगाववादी नेता और पीपुल्स कांफ्रेंस के मौजूदा चेयरमैन सज्जाद ग़नी लोन ने विधान सभा भंग होने के समय ये स्वीकार किया था कि पीडीपी-एनसी तीसरे मोर्चे को रोकने के लिए साथ आ रहे हैं.

उस वक़्त ऐसी कई ख़बरें आई थीं कि लोन बीजेपी और दूसरे विधायकों के समर्थन से सरकार बना सकते हैं और राज्य के अगले मुख्यमंत्री हो सकते हैं.

ख़बरों में राज्यपाल सत्यपाल मलिक के हवाले से ये तक कहा गया कि "केंद्र चाहता है कि मैं सज्जाद को जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बना दूं."

तीसरा मोर्चा बनाने पर ज़ोर

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने भी विधानसभा चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा बनाने पर ज़ोर दिया है.

पिछले डेढ़ महीने में पीडीपी छोड़कर आए तीन नेता लोन की पीपुल्स कांफ्रेंस में शामिल हो गए.

नेशनल कांफ्रेंस के पूर्व प्रवक्ता और श्रीनगर के मौजूदा मेयर जुनैद मट्टू ने शहरी स्थानीय निकाय चुनाव जीतने के बाद अक्तूबर 2018 में लोन की पार्टी ज्वाइन कर ली.

शहरी स्थानीय निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी होने के तुरंत बाद मट्टू ने नेशनल कांफ्रेंस से इस्तीफ़ा दे दिया था और चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया.

दरअसल उस वक़्त नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने राज्य के शहरी स्थानीय निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव का बहिष्कार कर दिया था.

पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते बीजेपी से निष्कासित किए जाने के बाद जम्मू से बीजेपी विधायक गगन भगत नेशनल कांफ्रेस में शामिल हो गए. इस मौक़े पर नेशनल कांफ्रेस के अध्यक्ष फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने कहा था कि पार्टी में शामिल होने के लिए कई और लोग भी उनके संपर्क में हैं.

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भगत ने विधानसभा भंग करने के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हुई थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को ख़ारिज कर दिया. भगत ने बीजेपी पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया था.

डॉक्टर करन सिंह के बेटे और पूर्व वरिष्ठ पीडीपी नेता विक्रमादित्य सिंह ने 11 अक्तूबर 2018 को पीडीपी छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया था.

सिंह ने राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल होने के वक़्त कहा कि बीजेप-पीडीपी की सरकार में जम्मू के लोगों की अनदेखी हुई और वो उनके लिए काम करना जारी रखेंगे.

वहीं दूसरी ओर जम्मू प्रांत के पुंछ पॉकेट में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के दो बड़े नेताओं और दर्जनों कार्यकर्ताओं ने राज्य बीजेपी इकाई के अध्यक्ष रविंदर रैना की मौजूदगी में बीजेपी का दामन थामा.

नाराज़ पीडीपी नेता और पूर्व विधायक, मंत्री इमरान अंसारी ने "पीडीपी छोड़ते हुए कहा था कि पीडीपी एक परिवार की पार्टी बन गई है. हमें वहां घुटन हो रही थी."

कई बड़े नेताओं ने भी छोड़ी पार्टी

एक महीने पहले ही अंसारी लोन की पीपुल्स कांफ्रेंस में शामिल हो गए थे.

ये दल बदल का सिलसिला बीजेपी-पीडीपी का गठबंधन टूटते ही शुरू हो गया था.

इसके कुछ दिन बाद ही पीडीपी में भी फूट पड़ती दिखी और अबतक नौ पूर्व विधायक, दर्जनों नेता और कार्यकर्ता पार्टी छोड़ दूसरे दलों में जा चुके हैं.

इनमें से तीन विधायकों ने सज्जाद लोन की पार्टी का हाथ थामा. वहीं पीडीपी के दूसरे नेताओं, जिनमें पूर्व मंत्री बशरत बुख़ारी और पीर मोहम्मद हुसैन शामिल हैं, ये दोनों नेशनल कांफ्रेंस में शामिल हो गए.

हाल ही में दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग में दर्जनों पीडीपी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने प्रदेश कांग्रेस प्रमुख ग़ुलाम अहमद मीर की मौजूदगी में कांग्रेस ज्वाइन कर ली.

दोस्त और दुश्मन बदलने का ये राजनीतिक सिलसिला जम्मू-कश्मीर में अभी भी जारी है.

पीडीपी ने 19 जनवरी 2019 को अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अल्ताफ़ हुसैन बुख़ारी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से बर्ख़ास्त कर दिया था.

उनपर विरोधियों से नज़दीकियां रखने का आरोप था.

हालांकि निकाले जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए बुख़ारी ने कहा कि वो अब जेल से आज़ाद हो गए हैं.

जम्मू प्रांत में भी कई वरिष्ठ नेताओं ने राजनीतिक दल बदले हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये सब राज्य में गहराती अनिश्चितता और व्यवहारिक राजनीतिक हालात का फल है.

राजनीतिक विज्ञानी और कश्मीर के केंद्रीय विश्वविद्यालय में शासन और राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफ़ेसर नूर मोहम्मद बाबा कहते हैं, "ये व्यावहारिक राजनीति है. इसके लिए मध्य स्तर के नेताओं को ग़लत नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे लोगों के अपने भविष्य के राजनीतिक टारगेट होते हैं और वो उसी के हिसाब से वो अपना राजनीतिक झुकाव तय करते हैं."

वो दल बदल के इन हालातों के बीच कश्मीर की मुख्यधारा की राजनीतिक में कोई बड़ा बदलाव होते हुए नहीं देखते. लेकिन वो ये ज़रूर मानते हैं कि ज़मीन पर इस सब से कुछ मामूली बदलाव हो रहे हैं.

'कारण व्यवहारिक'

प्रोफेसर बाबा कहते हैं, "आप देख सकते हैं कि नेशनल कांफ्रेंस राजनीति के मायने बदलना चाह रही है और वो अपने स्वायत्ता के नारे को बुलंद कर रही है. वो जनता से कहना चाहती है कि नेशनल कांफ्रेंस पीडीपी और बीजेपी से बेहतर है. मेरा मानना है कि इन बदलते रंगों और उथल-पुथल के कारण व्यवहारिक हैं. दूसरी बात ये है कि लोग उसी तरफ जा रहे हैं जहां उन्हें कुछ संभावना नज़र आ रही है. मेरा मानना है कि कश्मीर में पीडीपी जिन हालातों का सामना कर रही है, बीजेपी जम्मू में उस तरह के हालातों का सामना कर रही है. इसलिए लोग पार्टियां छोड़ रहे हैं."

लेकिन जम्मू-कश्मीर, ख़ासकर कश्मीर में जारी राजनीतिक उथल-पुथल का असर आम लोगों पर होता नज़र नहीं आता.

29 साल के इम्तियाज़ अहमद एक व्यापारी हैं. उनकी दुकान श्रीनगर में है. वो इस बात को लेकर हैरान हैं कि ये राजनेता कैसे अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए रातों-रात अपनी विचारधारा, दोस्तों और दुश्मनों को बदल देते हैं.

वहीं एक और आम नागरिक इमरान वानी कहते हैं, "कश्मीर मुद्दे का हल हमारा एक बड़ा मसला है. हर दिन आम लोग मारे जा रहे हैं, अधिकारों का हनन हो रहा है. इसलिए हमारे लिए ये मायने नहीं रखता कि कौन पीडीपी छोड़ रहा है या कौन बीजेपी या नेशनल कांफ्रेस. हालांकि हम इससे परेशान ज़रूर हैं."

'कईओं ने पत्ते अब भी नहीं खोले'

वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कश्मीर की राजनीति में ऐसे बदलाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन वो कहते हैं कि ऐसे में राज्य चुनाव के दौरान राजनीतिक अवसरों का फ़ायदा लिया जाता है.

पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हारून रेशी का कहना है कि ये सब बीजेपी और पीडीपी के अलग होने के बाद शुरू हुआ.

वो कहते हैं, "पीडीपी के कई बड़े नेताओं ने या तो दूसरी पार्टी से हाथ मिला लिया या अब भी अपने पत्ते दबाकर बैठे हैं. हमने देखा कि पीडीपी के ज़्यादातर नेता नेशनल कांफ्रेंस में शामिल हो गए. राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को लगता है कि नेशनल कांफ्रेस की हालत पीडीपी या बीजेपी से बेहतर है. इसलिए वो ये कर रहे हैं. पीडीपी के अलावा कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के कई कार्यकर्ता और नेता बीजेपी और दूसरी पार्टियां में भी शामिल हुए हैं."

एक राजनेता जिनका करियर 35 साल से भी ज़्यादा का है और वो चार पार्टियां बदल चुके हैं, वो पहचान छिपाने की शर्त पर कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियां बदलने का मक़सद राजनीतिक प्रमोशन पाना होता है. इसमें बड़ा रिस्क भी होता है.

28 साल के ख़ुर्शीद अहमद एक आम कश्मीरी हैं. वो कहते हैं, "हम देख रहे हैं कि लोग पीडीपी छोड़कर नेशनल कांफ्रेस में जा रहे हैं. नेशनल कांफ्रेंस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. ये लोग एक जैसे ही हैं, जिनकी विचारधारा भी एक सी है. इनका स्वभाव एक सा है और सोच भी एक सी ही है."

वो सवाल करते हैं, "इसका असर आम लोगों पर क्यों पड़ना चाहिए. मुझे ऐसा नहीं लगता. हम समझते हैं कि हवा जिस ओर बहती है, लोग भी उसी दिशा में चलने लगते हैं."

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