गलवान घाटी में संतोष बाबू की टीम के इन 5 सैनिकों ने चीनी सैनिकों को दिलाया था छठी का दूध याद
नई दिल्ली, 23 नवंबर। चीन के साथ भारत का सीमा विवाद बहुत पुराना है, लेकिन इस विवाद के इतिहास में गलवान घाटी में चीन और भारत के सैनिकों के बीच हुई मुठभेड़ किसी युद्ध से कम नहीं थी। गलवान घाटी में चीन ने भारत को बहुत गहरा जख्म दिया था। चीनी सैनिकों ने 20 भारतीय जवानों को मार गिराया था। हालांकि भारतीय सेना ने भी 40 से अधिक चीनी सैनिकों को मार गिराने का दावा किया था। इस मुठभेड़ में बड़ी बहादुरी के साथ चीनी सैनिकों के साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होने वाले 5 सैनिकों को मंगलवार को मरणोपरांत वीरता पुरस्कार दिया गया।
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पढ़िए गलवान के वीरों की गाथा
इनमें कर्नल संतोष बाबू को महावीर चक्र तो अन्य 4 सैनिकों को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। शहीद संतोष बाबू के अलावा जिन सैनिकों को वीरता पुरस्कार दिया गया है, उनमें सूबेदार नूडूराम सोरेन, पंजाब रेजिमेंट के सिपाही गुरतेज सिंह, हवलदार के पलानी और बिहार रेजिमेंट के नायक दीपक सिंह का नाम शामिल है। इन वीरों की शहादत की बदौलत ही गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों ने डटकर चीन का मुकाबला किया था। आइए इन वीर शहीदों के बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
कर्नल संतोष बाबू
- गलवान घाटी में चीन के साथ हुई मुठभेड़ की चर्चा जब-जब होगी, तब-तब कर्नल संतोष बाबू का नाम लिया जाएगा। संतोष बाबू 16 बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर थे, जिन्हें ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के लिए गलवान घाटी में तैनात किया गया था। चीनी सैनिकों के साथ गतिरोध के दौरान पिछले साल कर्नल संतोष बाबू को उनकी यूनिट के सीओ के रूप में, उन्हें दुश्मन के सामने एक ऑब्जर्वेशन पोस्ट स्थापित करने का जिम्मा सौंपा गया था। इस जिम्मेदारी को उन्होंने सफलतापूर्वक निभाया।
- संतोष बाबू ने उस पोस्ट पर रहते हुए चीनी आर्मी का डटकर सामना किया। चीनी सैनिक धारदार हथियारों के साथ-साथ पत्थर से भी हमले कर रहे थे। इसके अलावा गोलीबारी भी हो रही थी। इस गोलीबारी में संतोष बाबू घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपनी टीम को मुसीबत में नहीं छोड़ा और पूरी जिम्मेदारी के साथ टीम का नेतृत्व किया। अपने अंतिम सांस तक संतोष बाबू ने चीनी सैनिकों को भारतीय सीमा में घुसने से रोका और अपनी टीम को भारतीय सीमा में दाखिल होने से रोकने के लिए प्रेरित किया।
नायब सूबेदार नूडूराम सोरेन
16 बिहार रेजिमेंट के नायब सूबेदार नूडूराम सोरेन भी ऑपरेशन स्नो लैपर्ड के दौरान गलवान घाटी में ही तैनात ते। वो संतोष बाबू की ही टीम का हिस्सा थे और अपनी एक अलग सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। गलवान में जिस वक्त चीनी सैनिक पत्थरबाजी और धारदार हथियारों से हमला कर रहे थे, उस वक्त नूडूराम सोरेन ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए अपनी सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व जारी रखा था। सोरेन की बहादुरी की वजह से ही गलवान में चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुसपैठ करने में नाकाम रहे थे, लेकिन इस संघर्ष में सूबेदार नूडूराम सोरेन ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया था।
सिपाही गुरतेज सिंह
पंजाब रेजिमेंट तीसरी बटालियन के सिपाही गुरतेज सिंह को गलवान घाटी में चौकी स्थापित करने का काम सौंपा गया था। उन्होंने बखूबी इस जिम्मेदारी को निभाते हुए भारत के खिलाफ योजना बना रही चीनी सेना की टुकड़ी की पहचान की थी। गुरतेज सिंह अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ चीनी सैनिकों से ना सिर्फ भिड़े थे, बल्कि उन्होंने अपनी टीम के कई साथियों की जान भी बचाई थी। सैनिकों की तादाद अधिक होने और घातक हथियारों से लैस होने के बावजूद गुरतेज सिंह ने अदम्य वीरता, जबरदस्त साहस और असाधारण युद्ध-कौशल परिचय उस वक्त दिया था। गंभीर रूप से घायल अवस्था के दौरान भी गुरतेज सिंह लड़ते रहे और आखिर में उन्होंने राष्ट्र के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया।
नायक दीपक सिंह
बिहार रेजिमेंट के नायक दीपक सिंह आर्मी मेडिकल कोर (एएमसी) से ताल्लुक रखते थे और वह ऑपरेशन स्नो-लैपर्ड के दौरान गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हुई झड़प में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन घायल होने के बावजूद उन्होंने घायल कई सैनिकों का उपचार किया और फिर उन्होंने शहादत हासिल कर ली।
हवलदार के पलानी
गलवान घाटी में अपनी शौर्य गाथा के लिए ये नाम भी हमेशा याद रखा जाएगा। गलवान घाटी में चीनी सेना की ओर से अचानक हुए हमले में शहीद होने वाले हवलदार के. पलानी को उनकी अदम्य साहस के लिए मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।












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