मिलिए परंपराओं को तोड़ने वाले फ़ैशन डिज़ाइनर आयुष केजरीवाल से

Posted By: BBC Hindi
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"मैं लोगों के लिए कपड़े बनाता हूं. लोग हर तरह के होते हैं. काले, गोरे, सांवले, लंबे, मोटे, नाटे और दुबले.'' ये कहना है आयुष केजरीवाल का.

35 साल के आयुष एक फ़ैशन डिज़ाइनर हैं. वो फ़िलहाल लंदन में रहकर काम कर रहे हैं. आयुष को उनकी देसी साड़ियों और लहंगों के लिए जाना जाता है.

आयुष भी वही काम करते हैं जो बाकी डिज़ाइनर, लेकिन कई मायनों में वो दूसरों से काफ़ी हटकर हैं.

उनकी मॉडल्स को देखकर ऐसा लगता है जैसे वो आपके नज़दीकी बाज़ार या मुहल्ले के लोगों में से एक हैं.

सांवली, पतली, मोटी औरतें...जिनके चेहरों के धब्बों को फ़ोटोशॉप से हटाया नहीं जाता, जिनका रंग हल्का नहीं किया जाता. उन्हें वैसा ही रहने दिया जाता है, जैसी वो असल में हैं.

कई बार आयुष अपने ग्राहकों की तस्वीरें भी मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल करते हैं. इनमें युवतियां भी होती हैं और अधेड़ उम्र की महिलाएं भी.

आयुष कहते हैं,''मैं चाहता हूं कि लोग मेरे कपड़ों को देखें तो सोचें कि वो उनके लिए ही बनाए गए हैं.''

कोलकाता में पले-बढ़े आयुष को कपड़े डिज़ाइन करने का शौक़ कैसे हुआ?

बचपन में अपनी मां की साड़ियां पहनकर खेलते और गुड्डे-गुड़ियों के कपड़े सिलते, आयुष को कपड़ों और उनके रंगों से प्यार हो गया.

वो बताते हैं,''बाद में मां की आखें कमज़ोर हो गई थीं और वो अपने साड़ियों के लिए मैचिंग ब्लाउज़ नहीं चुन पाती थीं. इसमें मैं उनकी मदद करने लगा. फिर धीरे-धीरे इसमें मेरी दिलचस्पी जगी.''

ख़ास बात ये है कि आयुष ने फ़ैशन डिज़ाइनिंग में कोई डिग्री नहीं ली है. बैंगलोर में बीबीए की पढ़ाई करते वक़्त उनके दोस्तों ने उन्हें डिज़ाइनिंग में हाथ आज़माने की सलाह दी.

आयुष ने प्रयोग के लिए चार-पांच साड़ियां डिज़ाइन कीं और कुछ ही दिनों में वो बिक गईं. तब आयुष को लगा कि वो इस पेशे में उतर सकते हैं.

एक बार आयुष ने हिजाब और साड़ी मिलाकर एक ड्रेस तैयार की. कुछ ही दिनों में ये पोशाक इंटरनेट पर सनसनी की तरह छा गई. कइयों को इससे शिक़ायत भी थी.

कुछ लोगों का कहना था कि आयुष ने साड़ी और हिजाब मिलाकर हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है. लेकिन आयुष इन आलोचनाओं से बेफ़िक्र रहे और उन्होंने सोशल मीडिया पर साफ़ कहा, ''अगर आपको मुझसे कपड़े खरीदने हैं तो आपको उदार होना होगा.''

सांवली और काली मॉडलों के चुनाव के बारे में पूछने पर आयुष कहते हैं,''मैंने कुछ सोचकर या किसी ख़ास मक़सद से ऐसा नहीं किया था. गोरा और काला रंग इतना बड़ा मुद्दा है इसका अहसास मुझे तब हुआ जब मुझे लोगों के फ़ोन आने शुरू हो गए.''

आयुष कहते हैं कि अगर उनके काम से समाज में किसी भी तरह की सकारात्मकता आती है तो ये उनके लिए ख़ुशी की बात है.

ख़ूबसूरती क्या है? इस सवाल के जवाब में आयुष कहते हैं, ''जब आपका दिल ख़ुश होता है तब आप ख़ूबसूरत महसूस करते हैं. जिस तरीके के कपड़े पहनने पर, जिस तरह तैयार होने पर आपको ख़ुशी मिले वो चीजें आपको ख़ूबसूरत बनाती हैं.''

पहनावे को लेकर जो परंपरागत सोच है, उसे कैसे ख़त्म किया जाए? आयुष कहते हैं कि कपड़ों को सिर्फ कपड़ों की तरह देखा जाना चाहिए, सर्टिफ़िकेट की तरह नहीं.

सलवार-कुर्ता पहनने वाली लड़की को 'बहनजी' और शॉर्ट्स पहनने वाली लड़की को मॉडर्न समझना बेवकूफ़ी है.

ठीक इसी तरह साड़ी पहनने वाली महिला बहुत सभ्य हो और शॉर्ट्स पहनने वाली महिला असभ्य, ये समझना भी बेवकूफ़ी है.

आयुष का कहना है कि वो आलोचनाओं से घबराते नहीं लेकिन बेवजह की आलोचना बर्दाश्त भी नहीं करते.

आगे की क्या योजना है?

"मैं आगे भी इसी तरह काम करूंगा. मेरी मॉडल्स नहीं बदलेंगी और न मेरा नज़रिया.''

BBC Hindi
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English summary
Ramp meet aayush kejriwal fashion designer who breaks the traditions
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