Rajya Sabha Deputy Chairman Election: 17 अप्रैल को होगा राज्यसभा के उपसभापति चुनाव, फिर बाजी मारेंगे हरिवंश?
Rajya Sabha Deputy Chairman Election: राज्यसभा के उपसभापति चुनाव को लेकर संसद में सरगर्मी बढ़ गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस महत्वपूर्ण पद के लिए अपनी गोटियां सेट करने में जुटे हैं। सरकार की मंशा है कि अनुभवी नेता हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर यह जिम्मेदारी संभालें, जबकि विपक्षी खेमा अपना संयुक्त उम्मीदवार उतारने पर विचार कर रहा है।
17 अप्रैल को होने वाले इस चुनाव ने सियासी माहौल को गरमा दिया है, क्योंकि इससे सदन के भीतर बदलते शक्ति समीकरणों का पता चलेगा।

हरिवंश की फिर से दावेदारी
हरिवंश नारायण सिंह ने हाल ही में तीसरी बार राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली है। उन्हें संसदीय कामकाज का गहरा अनुभव है और वे पिछले कार्यकाल में भी उपसभापति रह चुके हैं। जदयू से जुड़े होने और राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होने के कारण उनकी स्थिति काफी मजबूत मानी जा रही है। भाजपा नेतृत्व को भरोसा है कि उनके शालीन स्वभाव और काम करने के तरीके के कारण वे फिर से सदन का विश्वास जीतने में सफल रहेंगे।
सरकार का 'आम सहमति' कार्ड
मोदी सरकार इस बार चुनाव की जगह निर्विरोध चयन पर जोर दे रही है। इसके लिए किरन रिजीजू, जेपी नड्डा और पीयूष गोयल जैसे दिग्गज मंत्रियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। ये नेता विपक्ष के विभिन्न गुटों से बात कर रहे हैं ताकि हरिवंश के नाम पर सभी की सहमति बन सके। सरकार का तर्क है कि सदन की गरिमा के लिए उपसभापति का चुनाव सर्वसम्मति से होना चाहिए, जिससे सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चल सके।
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विपक्ष की 15 अप्रैल वाली बैठक
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। विपक्षी खेमे की एक बड़ी बैठक 15 अप्रैल को होने वाली है, जिसमें महिला आरक्षण बिल और उपसभापति चुनाव पर रणनीति बनेगी। विपक्ष इस बात पर मंथन कर रहा है कि क्या उन्हें अपना उम्मीदवार उतारकर सरकार को चुनौती देनी चाहिए या हरिवंश के नाम को स्वीकार कर लेना चाहिए। इस बैठक के बाद ही साफ होगा कि 17 अप्रैल को मुकाबला होगा या नहीं।
मुकाबले की संभावना और रणनीति
अगर विपक्ष अपना साझा उम्मीदवार मैदान में उतारता है, तो मुकाबला काफी रोचक हो जाएगा। दोनों पक्ष छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों को अपने पाले में लाने की कोशिश करेंगे। सत्ता पक्ष अपने संख्या बल को लेकर आश्वस्त है, वहीं विपक्ष इसे अपनी एकजुटता दिखाने के मौके के तौर पर देख रहा है। आने वाले कुछ दिन जोड़-तोड़ की राजनीति और बैठकों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं, जिससे संसद का पारा चढ़ा हुआ है।












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