आखिर क्यों राजीव जैसे बिल्कुल नहीं हैं राहुल गांधी?
बैंगलुरू। आज देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का जन्मदिन है, कांग्रेस इसे सद्धभावना दिवस के रूप में मनाती है। राजीव गांधी का व्यक्तित्व एक संयमित, विद्वान और शांत चित्त वाला था, उनके हाथ में सत्ता हालात के हाथों मजबूर होकर आयी थी। अपनी मां को आतंक की भेंट चढ़ने के बाद भी उनका ना तो विश्वास डगमगाया और ना ही वो खुद डगमगाये।
राजीव ने मां इंदिरा की हत्या के बाद संभाली देश की कमान
राजीव गांधी की सत्तासीन होने के बाद देश की राजनीति में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ था, उनका पीएम बनना देश की गति में एक नया मोड़ था इसलिए जब उनकी हत्या हुई तो देश हतप्रभ रह गया था, उनके विरोधियों ने भी कभी नहीं सोचा था कि उनकी मौत ऐसे होगी।
राहुल में लोग पिता राजीव को खोजने लगे
इसलिए जब उनका अक्स पुत्र राहुल गांधी देश की राजनीति में आये तो हर किसी ने उनके अंदर राजीव गांधी को खोजने की कोशिश ह की और इसमें लोगों की गलती भी नहीं है क्योंकि हमारे देश में पिता के छोड़े कर्ज और सपनों को बेटा ही पूरा करता है लेकिन पिछले दस साल से ज्यादा सक्रिय राजनीति में एक्टिव राहुल गांधी ने अभी तक लोगों को निराश ही किया है।
आईये जानते हैं राहुल कहां-कहां और किन बिंदुओं पर अपने पापा के आगे अब तक फेल हुए हैं..

राजीव शांत तो राहुल एंग्रीमैन
राजीव गांधी को जानने वाले बताते हैं कि वो एक शांत, मोहक और मुस्काने वाली छवि के मालिक थे, वो एक्टिव तो थे लेकिन आक्रामक नहीं, जबकि राहुल गांधी ने अपने आपको लोगों के सामने एंग्रीयंगमैन की तरह साबित करने की कोशिश की लेकिन अफसोस वो उसमें भी फेल हुए हैं।

राजीव अच्छे वक्ता तो राहुल गांधी बोलते ही नहीं
राजीव गांधी का अपना एक चार्म होता था लोगों के बीच में, कांग्रेस के बेहद करीबी रहे रायबरेली के पूर्व राजनीतिज्ञ मुनिश्वर दत्त उपाध्याय ने बताया कि उन्होंने 60 साल के कांग्रेस का दौरा देखा है। राजीव गांधी को सुनने के लिए भारी भीड जुटती थी जबकि राहुल गांधी को लोग सुनना ही नहीं चाहते हैं शायद इसके पीछे कारण उनके भाषणों में आकर्षण का अभाव है।

जानकारी की कमी
पूर्व राजनीतिज्ञ मुनिश्वर दत्त उपाध्यायने कहा कि राजीव गांधी प्रखर थे, वो सारे मुद्दों पर नहीं बोलते थे लेकिन जिन मुद्दों पर बातें करते थे उसमें उन्हें कोई हरा नहीं सकता है, लेकिन राहुल के पास ज्ञान का अभाव दिखता है जिसके कारण वो आकर्षण के बजाय परिहास का कारण बनते हैं।

मम्मा बेबी
राहुल गांधी की छवि लोगों के दिलों में मम्मा ब्वॉय की बन गई है, ऐसा लोगों का सोचना है कि वो अपनी मम्मी सोनिया गांधी के बिना एक कदम चल नहीं सकते हैं, जो कि उनके लिए नकारात्मक बात साबित हो रही है, जबकि राजीव गांधी को भी मां का बेटा ही कहा जाता था लेकिन उस बेटे ने अपनी मां की मौत के बाद उनके छोड़े ही कामों संवारने की कोशिश की, मां की हत्या के बावजूद उन्होंने निडर होकर देश संभाला।

लोगों से मिलना
राजीव गांधी ने भी कई बार प्रोटोकाल को तोड़ते हुए लोगों के बीच चले जाते थे और राहुल गांधी भी ऐसा करते हैं, लेकिन दोनों में भारी अंतर यह है कि राहुल की इस हरकत को लोग राजनीति का हिस्सा मानते हैं तो वहीं राजीव गांधी की इस बात को लोग उनका प्यार मानते हैं।

खुद को साबित करना बाकी है?
इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस को लोगों ने रिकार्ड मतों से विजयी बनाया था, जितने वोट उस समय पार्टी को मिले थे, उतना आज तक किसी भी पार्टी को नहीं मिला। राजीव ने उस विश्वास पर खरा उतरने की कोशिश भी की लेकिन राहुल गांधी के दौर में कांग्रेस अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है, ऐसे में उन्हें लेकर भी पार्टी में विरोधाभास है, ऐसे में अगर रांहुल गांधी, जो कि अपने हर भाषण में अपने पिता राजीव गांधी का जिक्र करते हैं, को खुद को साबित करना ही होगा तभी वो अपने पिता की तरह लोगों के दिल में जगह बना पायेंगे।
आपकी राय क्या है?
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