गढ़ तो चित्तौड़ का, बाकी सब गढ़ैया
चित्तौड़गढ़ - शताब्दियों से अजेय योद्धा की तरह खड़े इस क़िले ने बहुत उतार- चढ़ाव देखे हैं.
क़रीब 700 एकड़ में फैले चित्तौड़ के गढ़ को राजपूत शिल्प का नमूना माना जाता है.
उसकी बनावट और सामरिक स्थिति को देख कर कहा जाता है - गढ़ तो चित्तौड़ का, बाकी सब गढ़ैया.
क़िला जहां भक्ति भी रही और शक्ति भी
महाराणा प्रताप ने इसी क़िले में कोई दो दशक से ज़्यादा का वक़्त गुज़ारा है.
यह क़िला भक्ति की प्रतीक मीराबाई की भी गाथाएं सुनाता है.
चित्तौड़ क़िले के लिए कहते हैं कि यह भक्ति और शक्ति दोनों के समागम की मिसाल है.
यहां मीराबाई का मंदिर भी है
इतिहासकार डॉ लोकेन्द्र चुण्डावत कहते है यही क़िला है जहाँ महाराणा प्रताप ने अपने जीवन के पच्चीस वर्ष व्यतीत किए.
''जब अकबर का घेरा बढ़ने लगा तो अपनी युद्ध परिषद की सलाह पर प्रताप महफ़ूज़ स्थान पर चले गए. पीछे उनके सिपहसलार क़िले की रक्षा के लिए लड़ते रहे.'' डॉ चुण्डावत ने बीबीसी को बताया.
चित्तौड़ में इतिहास के जानकार डॉ एस एस समदानी बताते हैं मीरा इस क़िले में कोई सत्रह साल रही है.
मीरा का विवाह महाराणा सांगा के पुत्र राजकुमार भोज के साथ हुआ था.
लेकिन दिल्ली सल्तनत के साथ युद्ध में भोज घायल हो गए और फिर कुछ वक़्त बाद वे चल बसे.
यहाँ मीरा का मंदिर बना है.
यहीं के पत्थर निकालकर बनी हैं इमारतें
इतिहासकार कहते है यह ऐसा क़िला है जिसमें सेनाओं के लिए हमेशा पानी के पर्याप्त स्रोत रहे हैं.
चित्तौड़ में जनसम्पर्क में उपनिदेशक रहे नटवर त्रिपाठी बताते हैं कि क़िले में जो भी इमारतें बनी है, वे सभी गढ़ के अंदर स्थित पत्थर से बनी है.
उनके मुताबिक़ ''ज़मीन से पत्थर निकाल कर जब इमारत बनाते तो उस स्थान पर गड्ढा हो जाता था, वो बाद में जलाशय बन गया. इस तरह एक वक़्त क़िले में 84 जलाशय थे. अब उनमें से तीस बचे हैं.''
पन्ना धाय की वीरगाथा सुनाता चित्तौड़
चित्तौड़ क़िला पन्ना धाय की याद भी दिलाता है जो राणा संगा के पुत्र उदय सिंह की धाय माँ थी.
मेवाड़ के इस वारिस को शत्रु से बचाने के लिए पन्ना ने अपना पुत्र दे दिया.
नटवर त्रिपाठी बताते हैं कि चित्तौड़ को महाराणा कुम्भा ने बहुत शोहरत दिलवाई.
कुम्भा के समय अनेक जैन संतो और विद्वानों ने यहाँ साहित्य रचना की.
विष्णु उपासना का बड़ा केंद्र रहा
अंदर के निर्माण पर वैष्णव शैली की छाप दिखाई देती है.
''यह उस वक़्त का विष्णु उपासना का बड़ा केंद्र रहा है'', नटवर त्रिपाठी बताते हैं.
क़िले में दो स्तम्भ बने हुए है. नटवर त्रिपाठी कहते हैं एक धनी जैन व्यापारी ने 12 वी सदी में 22 मीटर ऊंचा कीर्ति स्तम्भ बनवाया था. इसे आदिनाथ को समर्पित किया गया.
शायद यही चित्तौड़ क़िले में बने विजय स्तम्भ की प्ररेणा रहा है. नटवर त्रिपाठी बताते हैं, ''कुम्भा ने गुजरात और मालवा में अपनी फ़तह के बाद नौ मंज़िला विजय स्तम्भ बनवाया था. यह एक वैष्ण्व स्तम्भ है.''
पद्मिनी का ज़िक्र है लेकिन दर्पण का नहीं
इतिहासकार समदानी कहते हैं पद्मिनी का उल्लेख किताबों, ख्यात, गाथाओं और वाचक साहित्य में सम्मान के साथ मिलता है.
उनके मुताबिक़ ''इस उपलब्ध जानकारी में किसी ने भी दर्पण की घटना का ज़िक्र तक नहीं किया है. केवल जायसी ने इसका ज़िक्र किया है.''
चित्तौड़ के इस क़िले को देखने हर दिन बड़ी तादाद में देशी-विदेशी सैलानी आते हैं.
कोई इसके इतिहास से रोमांचित है तो कोई शिल्प देख कर अभिभूत हो जाता है.
चित्तौड़ का क़िला 180 मीटर ऊंचे पहाड़ पर 700 एकड़ में बना है. इसे सातवीं सदी में मौर्य शासकों ने बनवाया था.
चित्तौड़ सातवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक मेवाड़ राज्य की राजधानी रहा है. बाहरी हमलों के बावजूद इसे अजेय माना जाता था.
महाभारत से भी जुड़े हैं तार
चित्तौड़ के बारे में महाभारत काल की एक कथा भी है. इसके अनुसार भीम ने धरती पर ज़ोर से पैर पटका और वहां एक गड्ढा हो गया.
उस जगह एक सोता फूट पड़ा. यहीं पर चित्तौड़ क़िले की नीव डाली गई. क़िले में उस जगह को भीम कुंड कहा जाता है.
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