राहुल गांधी से क्यों कन्नी काटने लगे लालू यादव,कोई नई वजह है या पुराना हिसाब चुकता कर रहे?

आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने जिस तरह से इंडिया ब्लॉक की अगुवाई के लिए ममता बनर्जी के नाम का समर्थन किया है, वह करीब तीन दशकों की उनकी और कांग्रेस के बीच की घुटने भर वाली दोस्ती के लिए अप्रत्याशित है। पिछले दो दशकों में तो लालू ने खुद को कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के सबसे खास लेफ्टिनेंट के रूप में समर्पित कर रखा है। फिर अचानक क्या हुआ कि उनके बेटे राहुल गांधी के लिए उन्होंने पहले वाली भावना दिखाना बंद कर दिया है।

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और उसकी अगुवाई वाले इंडिया ब्लॉक की जिस तरह से बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन की वजह से फजीहत हुई है, उससे अबकी बार कांग्रेस के पीछे-पीछे चलने वाली पार्टियों के नेताओं का भी राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर भरोसा डंवाडोल हो गया है।

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इंडिया ब्लॉक में नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा पकड़ चुका है जोड़
मौका देखकर टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम आगे कर दिया। हालांकि, राहुल गांधी औपचारिक तौर पर इसकी अगुवाई नहीं कर रहे हैं। लेकिन, अघोषित तौर पर कांग्रेस हाई कमान होने की वजह से उन्हें बाय डिफॉल्ट विपक्षी गठबंधन का भी नेता माना जाता है।

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टीएमसी ने ममता के लिए जो बैटिंग शुरू की और फिर बनर्जी ने खुद भी अपनी दावेदारी सामने रखी तो शरद पवार और शिवसेना (यूबीटी) से लेकर कई दलों के नेताओं ने उनका समर्थन किया। सपा के अखिलेश यादव तो यूपी उपचुनाव से ही कांग्रेस से दूर जाने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

लालू यादव ने राहुल की जगह टीएमसी सुप्रीमो के लिए दिखाई ममता
यह सब देखकर पहले राजद के प्रवक्ता ने गोल-मटोल जवाब दिया। बाद में तेजस्वी यादव ने भी कह दिया कि उन्हें ममता बनर्जी की अगुवाई से कोई दिक्कत नहीं है,लेकिन जो भी फैसला हो,वह सर्वसम्मति से हो।

लेकिन,तेजस्वी के पिता लालू यादव की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली रही। उन्होंने पत्रकारों से कह दिया कि इंडिया अलायंस का नेतृत्व ममता बनर्जी को देना चाहिए। जब उनसे कहा गया कि अगर इसपर कांग्रेस को आपत्ति हो तो लालू ने यहां तक दिया कि उनके (कांग्रेस) बोलने से कुछ नहीं होगा।

राहुल को सियासी तौर पर कमजोर पाकर लालू ने मारी पलटी!
ये वही लालू यादव हैं, जो 2004 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर उनके साथ चट्टान की तरह खड़े हो गए। ये बात अलग है कि शायद सोनिया खुद ही प्रधानमंत्री बनने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं और मनमोहन सिंह का नाम आगे बढ़ा दिया। इन 20 वर्षों में लालू और सोनिया के बीच गजब की राजनीतिक ट्यूनिंग नजर आई है। लेकिन,इस बार राहुल अपने गठबंधन में ही कमजोर पड़ रहे हैं तो लालू ने पलटी मारने में भी देरी नहीं दिखाई है।

जब पिछले साल इंडिया ब्लॉक की पहली बैठक नीतीश कुमार की अगुवाई में पटना में हुई थी, तब यही लालू थे, जो राहुल गांधी की शादी में देरी से उनके परिवार के सदस्य की तरह चिंतित हो रहे थे। जब उस समय विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व का मुद्दा उठा और नीतीश ने अपने लिए बैटिंग शुरू की तो लालू ने ऐसा दांव चला कि कांग्रेस के हाथों में बाय डिफॉल्ट इसका नेतृत्व आ गया और लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी ही उसकी कमान संभाले रहे।

लालू ने राहुल से चुकता किया पुराना हिसाब?
सवाल है कि फिर क्या वजह है कि लालू ने अब राहुल से किनारा करने का फैसला किया है। शायद ऐसा करके उन्होंने अपना पुराना सियासी हिसाब भी चुकता करने की कोशिश की है और भविष्य में अपनी पार्टी राजद की गोटी को भी मजबूत करने का प्रयास किया है।

फाड़ी थी दागी नेताओं को बचाने वाला वाले ऑर्डिनेंस की कॉपी
दरअसल,जब मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-2 की सरकार के दिन पूरे होने वाले थे, उसी दौरान राहुल गांधी ने केंद्रीय कैबिनेट से पास एक ऐसे ऑर्डिनेंस की कॉपी सार्वजनिक मंच पर फाड़ डाली, जिसके बारे में बताया जाता है कि वह तब लालू यादव की सदस्यता बचाने की नीयत से ही लाया जा रहा था। वह ऑर्डिनेंस दागी नेताओं को कांग्रेस सरकार की ओर से बेदाग बनाने वाले एक हथियार की तरह था।

2020 में कांग्रेस का बहुत ही खराब प्रदर्शन
2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में लालू यादव जेल में थे। तब कांग्रेस ने आरजेडी पर बहुत ज्यादा मोलभाव करके अपने लिए 70 सीटें हासिल कर लीं। कांग्रेस का संगठन मजबूत नहीं था। फिर भी राजद को उसकी बात माननी पड़ी। लेकिन, नतीजे आए तो महागठबंधन के जातीय समीकरण के बावजूद कांग्रेस सिर्फ 19 सीटें ही जीत पाई। जबकि, आरजेडी 144 पर लड़कर 75 सीटें जीत गई और सबसे बड़ी पार्टी बनी।

सीपीआई,सीपीएम और सीपीआई (माले) की स्ट्राइक रेट तो और जबर्दस्त रही और वह 16 सीटें जीत गए। मतलब, कांग्रेस की भी स्ट्राइक रेट सहयोगियों की तरह रहता तो महागठबंधन की सरकार बन सकती थी। उसके बाद राजद के अंदर से कांग्रेस खिलाफ खूब नाराजगी जाहिर की गई। शायद लालू वह घाव आज भी नहीं भूले हैं।

कांग्रेस में कन्हैया कुमार की एंट्री
जब जेएनयू वाले कन्हैया कुमार लेफ्ट की राजनीति करने में एंट्री में ही फेल कर गए तो उनके सामने अपना सियासी बजूद बचाए रखने का संकट खड़ा था। बिहार की सियासत को समझने वाले लोगों का कहना है कि लालू यादव कभी नहीं चाहते थे कि महागठबंधन में कोई भी ऐसा युवा नेता खड़ा हो, जो उनके बेटे तेजस्वी यादव के लिए चुनौती बन सकता है। लेकिन, राहुल नहीं माने और खुद ही उन्हें कांग्रेस में लाकर गदगद हो गए।

पप्पू यादव भी हो सकते हैं वजह!
राहुल से लालू की नाराजगी की एक वजह पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव भी हो सकते हैं। जानकारी के मुताबिक लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पप्पू को अपनी पार्टी में लेने के लिए तैयार थी। उनकी पत्नी रंजीत रंजन पहले ही कांग्रेस सांसद हैं। लालू के दबाव की वजह से कांग्रेस पप्पू को तो पार्टी में नहीं ले सकी, लेकिन वह फिर भी चुनाव जीते और कांग्रेस के साथ ही हर मौके पर खड़े दिखाई पड़े।

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2025 के विधानसभा चुनाव की वजह से लालू ने मारी पलटी?
2025 में बिहार विधानसभा का चुनाव होना है। शायद लालू यादव को लग रहा है कि कांग्रेस फिर से अपनी क्षमता से ज्यादा सीटें मांगने का दबाव बनाएगी। लोकसभा चुनावों में राजद को चार सीटें मिली हैं और कांग्रेस तीन सीट जीती है। पप्पू यादव उसके साथ जुड़े दिख ही रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस फिर चाहेगी कि वह राजद से ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करे। माना जा रहा है कि ऐसी स्थिति पैदा हो, उससे पहले ही लालू ने अपना रास्ता खोज लिया है!

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