पुडुचेरी:किरण बेदी और नारायणसामी के बीच विवाद में दिल्ली के मुख्यमंत्री वाला मामला क्या है ?
नई दिल्ली: पूर्व आईपीएस किरण बेदी अपने कार्यकाल से कुछ ही कम समय तक पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर रहीं। लेकिन, वह जितने दिन भी रहीं, सिर्फ पुडुचेरी की सरकार का रबर स्टांप बनकर नहीं रह पाईं। उन्होंने बहुत ही ऐक्टिव उपराज्यपाल बनकर काम किया, जो मुख्यमंत्री वी नारायणसामी से उनके झगड़े का कारण बन गया था। बेदी भले ही दावा करती हों कि उन्होंने जो कुछ भी किया वह इस केंद्र शासित प्रदेश के व्यापक हित में किया है, लेकिन नारायणसामी की उनसे शुरू से एक ही शिकायत रही कि वह अपने संवैधानिक दायरे की सीमा लांघती रहीं।

दोनों में अधिकारों को लेकर था टकराव
किरण बेदी और मुख्यमंत्री नारायणसामी के बीच तकरार का मुख्य मुद्दा लेफ्टिनेंट गवर्नर और मुख्यमंत्री के अधिकारों को लेकर था। यह सच है कि किरण बेदी के रहते राजनिवास बहुत ही सक्रिय भूमिका निभाता नजर आया। बस यहीं से नारायणसामी चिढ़ गए और उन्होंने उपराज्यपाल पर आरोप लगाने शुरू कर दिए कि वो पुडुचेरी के विकास में बाधक बन रही हैं। बेदी की नियुक्ति के तकरीबन साल भर बाद ही जून, 2017 में मुख्यमंत्री नारायणसामी ने उनसे खुलकर कह दिया कि वह मुख्यमंत्री और मंत्रियों के कार्यों में दखल देना बंद कर दें। सीएम ने उन्हें संविधान का हवाला दिया कि वह सरकार के रोजाना के कार्यों में ना घुसें। उन्होंने पुडुचेरी के रूल्स ऑफ बिजनेस का हवाला देकर कहा कि लेफ्टिनेंट गवर्नर को मंत्रिपरिषद की सलाह से ही काम करना होगा।
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'दिल्ली से ज्यादा पावरफुल है पुडुचेरी का सीएम'
नारायणसामी ने दलील दी कि पुडुचेरी के उपराज्यपाल के पास ज्यादा अधिकार नहीं हैं। उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री के अधिकारों का हवाला दिया कि पुडुचेरी के मुख्यमंत्री का अधिकार उससे कहीं ज्यादा है। मसलन, दिल्ली के मुख्यमंत्री से अलग पुडुचेरी के सीएम के पास कानून और व्यवस्था और भूमि का अधिकार है। इसके अलावा उसके पास सेवा और वित्तीय अधिकार भी हैं। गौरतलब है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कानून और व्यवस्था और भूमि का अधिकार पूरी तरह केंद्र सरकार के जिम्मे है और इसी को लेकर दिल्ली की आम आदमी सरकार अक्सर केंद्र की बीजेपी सरकार से भिड़ती रहती है। नारायणसामी कहत रहे कि सामान्य परिस्थियों में जब वहां पर विधानसभा मौजूद है, उपराज्यपाल सिर्फ केंद्र सरकार के एक प्रतिनिधि के तौर पर अपनी भूमिका निभा सकती हैं। जब, विधानसभा भंग है कि तो राष्ट्रपति उपराज्यपाल के जरिए शासन-व्यवस्था का संचालन करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अलग-अलग नजरिए से देखा
यही वजह है कि मुख्यमंत्री नारायणसामी किरण बेदी पर तानाशाही रवैया अपनाने का भी आरोप लगाते रहे। उनका आरोप है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के इच्छा के मुताबिक जब वहां की सरकार आईटीडीसी होटल में विनिवेश करना चाहती थी तो उन्होंने उसमें भी अड़ंगा लगा दिया। राज्य सरकार के फाइलों को कई तरह से राजनिवास से रोके जाने का आरोप वह बेदी के पूरे कार्यकाल में लगाते रहे। इस विवाद में तब और गर्माहट आ गई, जब सुप्रीम कोर्ट ने 4 जुलाई, 2018 को राजधानी दिल्ली में विधायी और कार्यपालिका अधिकार दिल्ली की निर्वाचित सरकार और केंद्र सरकार समेत वहां के एलजी के बीच आवंटित कर दिए। अदालत के उस फैसले को पुडुचेरी के मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल ने अपने-अपने नजरिए से व्याख्या करना शुरू कर दिया।

मुख्यमंत्री के विरोध की वजह से ही गईं बेदी
नाराणयसामी का तर्क था कि केंद्र शासित पुडुचेरी में जिस दिन विधानसभा गठित हो जाती है, राष्ट्रपति वहां शांति, प्रगति और गुड गवर्नेंस के लिए कोई नियम नहीं बना सकते। उन्होंने दलील दी की पुडुचेरी की चुनी हुई सरकार के पास दिल्ली की सरकार से कही ज्यादा अधिकार है। यहां तक पुडुचेरी के मामले में राष्ट्रपति तक के पास अधिकार नहीं हैं। ऐसे में उनके प्रतिनिधि यानी लेफ्टिनेंट गवर्नर ऐसे अधिकारों पर कैसे दावा ठोक सकती हैं। आखिरकार उनके इतने विरोध की वजह से ही पुडुचेरी विधानसभा चुनाव के ऐलान से ठीक पहले उन्हें राजनिवास छोड़ना पड़ गया।

जनता की एलजी बनने की कोशिश की थी किरण बेदी ने
इससे ठीक उलट किरण बेदी पहले के उपराज्यपालों की तरह सिर्फ रबर स्टांप बनकर नहीं रहना चाहती थीं। उनका कहना था कि वह लोगों के साथ अन्याय होते नहीं देखेंगी। वह नहीं चाहती थीं कि वह आंख मूंदकर फाइलें साइन करती रहें और 'निहित स्वार्थी तत्वों' के लिए जनता का पैसा कथित तौर पर यूं ही बर्बाद होते रहने दें। उनका आरोप था कि मुख्यमंत्री नारायणसामी बिना पोस्ट के भी अधिकारियों को प्रमोट कराना चाहते या खराब परफॉर्मेंस के बावजूद उनकी तरक्की पर जोर डालते थे। वह राजनिवास में राजसी ठाठ से रहने की जगह वहां के लोगों के साथ चर्चा पसंद करती थीं। यह पूरी तरह वहां के उपराज्यपाल के लिए अबतक बनाई गई छवि के अलग बात थी। इसी के चलते वो मुख्य सचिव और दूसरे अधिकारियों को बुलाने लगीं, उनसे रिपोर्ट तलब करने लगीं और निर्देश देने लगीं। वह सड़कों पर जाती थीं और यह देखती थीं कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करते हैं या नहीं। इसी के चलते सीएम ने उनके खिलाफ जंग छेड़ दिया था और दिल्ली में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक उनकी शिकायत कर आए थे और उन्हें हटाने की मांग कर रहे थे।
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