लोकसभा चुनाव 2019: गढ़चिरौली-चिमूर लोकसभा सीट के बारे में जानिए
नई दिल्ली: महाराष्ट्र की गढ़चिरौली-चिमूर लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद भाजपा के अशोक नेते हैं। उन्होंने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के डॉ नामदे उसेंडी को 23,6870 वोटों से हराया था। अशोक नेते को 53,59,82 वोट मिले थे तो वहीं नामदेव उसेंडी को 29,91, 12 वोटों पर संतोष करना पड़ा था। साल 2014 के चुनाव में इस सीट पर नंबर 2 पर कांग्रेस, नंबर 3 पर BSP और नंबर 4 पर AAP थी। उस साल यहां कुल वोटरों की संख्या 14 लाख 69 हजार 767 थी, जिसमें से मात्र 10 लाख 27 हजार 129 लोगों ने अपने मतों का प्रयोग किया था, जिनमें पुरुषों की संख्या 5 लाख 37 हजार 86 और महिलाओं की संख्या 4 लाख 90 हजार 43 थी।

गढ़चिरौली-चिमूर लोकसभा सीट का इतिहास
गढ़चिरौली-चिमूर संसदीय सीट के अंतर्गत विधानसभा की 6 सीटें हैं। परिसिमन के बाद 2009 में नवनिर्मित गड़चिरोली चिमूर लोकसभा सीट पर पहला चुनाव हुआ जिसमें इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी मारोतराव कोवासे ने भाजपा के अशोक नेते पर मात्र 28 हजार 580 वोटों से जीत दर्ज की थी लेकिन साल 2014 के चुनाव में भाजपा को यहां विजयश्री हासिल हुई और अशोक नेते यहां से जीतकर लोकसभा पहुंचे। आपको बता दें कि गढ़चिरोली-चिमूर लोकसभा सीट ST के लिए आरक्षित है।
गढ़चिरौली,परिचय-प्रमुख बातें-
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले का गठन 26 अगस्त 1982 को हुआ था, इससे पहले ये चंद्रपुर जिले और सिरोंचा तहसील का हिस्सा था, महाराष्ट्र के दक्षिण भाग में स्थित गढ़चिरौली से कई वीरगाथाएं जुड़ी हुई हैं। बहुत सारी ऐतिहासिक बातों के अपने आंचल में संजोए गढ़चिरौली की आबादी 20 लाख 94 हजार 874 है, जिसमें से 90 प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं और 9 प्रतिशत लोग शहरों में निवास करते हैं। गड़चिरोली भौगोलिक दृष्टि से राज्य का सबसे लंबा, दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्र है। गढ़चौली के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है, इस जिले का 79 प्रतिशत हिस्सा वन्य क्षेत्र है, यहां चावल का उत्पादन भी बहुतायत में होता है। यहां 86 प्रतिशत लोग हिंदू धर्म, 7 प्रतिशत बौद्ध धर्म और 1 प्रतिशत लोग इस्लाम धर्म में यकीन रखते हैं।
अशोक महादेवराव का लोकसभा में प्रदर्शन
दिसंबर 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक अशोक महादेवराव नेते की पिछले 5 सालों के दौरान लोकसभा में उपस्थिति 75 प्रतिशत रही है और इस दौरान इन्होंने 29 डिबेट में हिस्सा लिया है और 505 प्रश्न पूछे हैं। संसदीय क्षेत्र बनने के बाद ये सीट एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा के खाते में गई है, इसमें कोई शक नहीं कि अशोक नेते की जीत के पीछे मोदी लहर की भी अहम भूमिका थी, जबकि कांग्रेस की हार के पीछे स्थानीय लोगों का उसके प्रति गुस्सा था। फिलहाल इस लोकसभा चुनाव में जहां बीजेपी के ऊपर दवाब इस सीट को बचाने का होगा, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस इस सीट को जीतने की भरसक कोशिश करेगी, भाजपा की वापसी इस सीट पर इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उसने पिछले 5 सालों के दौरान यहां पर कितना विकास कार्य किया है क्योंकि उसने पिछले चुनाव में विकास के नाम पर ही वोट मांगे थे, फिलहाल शह और मात के इस खेल में जीतेगा वो ही जिसे कि जनता का साथ मिलेगा और वो किसके साथ है, इसे जानने के लिए हमें चुनावी नतीजों का इंतजार करना होगा, देखते हैं कि यहां की जनता इस बार किसे अपना सरताज बनाती है।












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