प्रियंका की बोट यात्रा: आखिर कांग्रेस की चुनावी रणनीति है क्या?
नई दिल्ली। कांग्रेस की नवनियुक्त महासचिव प्रियंका गांधी सोमवार को 'गंगा जी की मदद लेकर’ उत्तर प्रदेश की जनता से 'सच्चा सम्वाद’ करने निकल पड़ी हैं. उन्होंने जनता के नाम लिखी अपनी पाती में कहा है कि 'उत्तर प्रदेश में किसी राजनैतिक परिवर्तन की शुरुआत आपकी बात सुने बगैर, आपकी पीड़ा को साझा किए बगैर नहीं हो सकती.’ तो, माना जाना चाहिए कि प्रियंका का यह अभियान उत्तर प्रदेश में राजनैतिक परिवर्तन की शुरुआत के लिए है. पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें लक्ष्य भी यही दिया है कि 2022 में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनानी है. यानी प्रियंका की नजर में 2022 के विधान सभा चुनाव पर हैं. सवाल उठता है कि लोक सभा चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति क्या है?

चुनाव सिर पर, लेकिन रणनीति?
चुनाव सिर पर हैं. मतदान के पहले चरण में एक महीने से भी कम समय है. कांग्रेस का तात्कालिक लक्ष्य क्या है? क्या रणनीति है? पूछना क्या, कांग्रेस का सीधा लक्ष्य मोदी सरकार को अपदस्थ करना होना ही होगा. एक तो इसीलिए कि वह अकेली राष्ट्रीय पार्टी है जो भाजपा का मुकाबला कर सकती है और दूसरे इसलिए कि आज जमीन से उसके पाँव उखड़े हुए है. अपने राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए उसे अपना जनाधार वापस पाना है. हकीकत यह है कि कांग्रेस आज अकेले दम पर भाजपा को सीधे चुनौती देने और उससे सत्ता छीनने की स्थिति में नहीं दिखाई देती. हाल के विधान सभा चुनावों में तीन राज्यों में भाजपा को सत्ता से बाहर करने के बावजूद कांग्रेस संगठन, कार्यकर्ता, नेता और धन के मामले में वह भाजपा से बहुत पीछे है. उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल जैसे राज्यों में लम्बे समय से उसके पास कायदे का संगठन भी नहीं।
हालात को देखते हुए कांग्रेस का पहला लक्ष्य यही हो सकता था कि वह महागठबंधन न सही, राज्य-स्तर पर क्षेत्रीय दलों के सहयोग से भाजपा को सत्ता में आने से रोकने की रणनीति पर चले. राष्ट्रीय स्तर की पार्टी होने और सफलतापूर्वक यूपीए जैसा गठबन्धन चला चुकी कांग्रेस के लिए यह मुश्किल काम नहीं था. उसकी तरफ से दो साल से ऐसी कोशिश होती भी दिख रही थी. लेकिन आज जब मतदान का समय करीब आ गया है तब भी कांग्रेस की चुनावी रणनीति साफ नहीं है. जैसे, उत्तर प्रदेश में पता नहीं चलता कि सपा-बसपा से उसकी पीठ पीछे की दोस्त है या उनसे लड़ाई. वह गठबंधन में शामिल होने को उत्सुक थी, अब भी लगती है लेकिन इस दिशा में उसने जरूरी पहल नहीं की. सपा से उसका करीबी रिश्ता दिखता है, लेकिन बसपा के करीब जाने के उसके प्रयासों को मायावती दुत्कार देती हैं. कांग्रेस यह भी नहीं कह पा रही है कि वह अकेले दम मैदान में है और भाजपा समेत सपा-बसपा से भी लड़ेगी।

सपा-बसपा के लिए सात सीटें छोड़ने की वजह
विडम्बना देखिए कि प्रियंका गांधी की बहुप्रचारित गंगा-यात्रा की पूर्व संध्या पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजबब्बर कहते हैं कि हम सपा-बसपा के लिए सात सीटें छोड़ रहे हैं. क्यों छोड़ रहे हैं? क्या इसलिए कि सपा-बसपा ने सोनिया और राहुल की सीटों पर कोई प्रत्याशी खड़ा नहीं किया है? या इसलिए कि अब भी उन्हें गठबंधन में अवसर मिलने का इंतजार है?और देखिए, कांग्रेस उत्तर प्रदेश में उस अपना दल के एक धड़े से दो सीटों पर समझौता करती है जो तीन-चार टुकड़ों बंटा हुआ है और जिसका सबसे प्रभवशाली गुट भाजपा का साझीदार है. यही नहीं, राजबब्बर बाबू सिंह कुशवाहा की उस जन अधिकार पार्टी से सात सीटों पर ‘समझौते' की घोषणा करते हैं जो पहले ही इन सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी थी. इन समझौतों से क्या यह समझा जाए कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से तालमेल करके भाजपा को हराने के लक्ष्य पर ही काम कर रही है? ऐसा है तो वह शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी से बात करने में क्यों हिचक रही, जो कि तालमेल को लालायित हैं और नाराजगी भी दिखा चुके हैं कि संकेत देकर भी कांग्रेस बात नहीं कर रही? तो क्या यह समझा जाए कि कांग्रेस शिवपाल से मिल कर अखिलेश को नाराज नहीं करना चाहती? यानी सपा से भीतर-भीतर कोई सहमति बनी है? या यह सिर्फ नतीजों के बाद की सम्भावनाओं का खुला द्वार है?
यह हाल कांग्रेस का उत्तर प्रदेश ही में नहीं है. बिहार में वह महागठबंधन का हिस्सा है लेकिन सीटों पर अंतिम सहमति नहीं बन पाई है. महाराष्ट्र में एनसीपी से तालमेल है लेकिन कुछ सीटों को लेकर खटपट कायम है. बंगाल में माकपा के साथ बात साफ नहीं हुई है और उस ममता बनर्जी से कोई चर्चा नहीं हुई जो कबसे कांग्रेस को साथ लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाना चाहती थीं. आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम से तालमेल टूट चुका है. दिल्ली और हरयाणा में ‘आप' से तालमेल की बातचीत टूट जाने के बावजूद फिर-फिर बात हो रही है लेकिन तस्वीर कतई साफ नहीं है. हाँ-हाँ-ना-ना का दौर जारी है।

एनडीए तैयारी में आगे
दूसरी तरफ एनडीए ने अपनी सहयोगी दलों से सीटों का समझौता न केवल फाइनल कर दिया है बल्कि जो छोटे-छोटे दल अन्यान्य कारणों से नाराज थे, उन्हें मना लिया है. असम गण परिषद जैसा सहयोगी जो एनडीए छोड़ कर चला गया था, वापस आ गया है भाजपा के नेतृत्त्व में यह गठबन्धन पूरी तैयारी के साथ चुनाव मैदान में आ डटा है, जबकि कांग्रेस, जिसे गठबन्धन की ज्यादा जरूरत है, बीच चौराहे पर ‘इधर-जाऊँ या उधर जाऊँ' के असमंजस खड़ी दिख रही है. कांग्रेस का यह असमंजस समझ में आता है. मसलन, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा से तालमेल की उसे भारी कीमत चुकानी पड़ती. उसे इतनी कम सीटें मिलतीं कि उसके लिए सबसे बड़े राज्य में अपनी पहचान दिखाना मुश्किल हो जाता. उसके सामने अस्तित्त्व का बड़ा संकट है. लेकिन जिस अगर-मगर में वह उत्तर प्रदेश की लड़ाई लड़ने जा रही है उससे तो यह संकट और बढ़ना ही है. तिकोनी लड़ाई से भाजपा की मदद हो रही है, सो अलग.
उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन पाने के लिए कांग्रेस को भाजपा से भी ज्यादा कठिन लड़ाई सपा-बसपा से ही लड़नी होगी. चूंकि इस समय यह व्यावहारिक नहीं है, इसलिए उसे भाजपा को किसी भी तरह से सत्ता में नहीं आने देने की रणनीति पर काम करना चाहिए था. यह रास्ता क्षेत्रीय दलों से बड़ी कीमत पर समझौते का ही हो सकता था. कई राज्यों में भाजपा से उसकी सीधी लड़ाई है. बाकी राज्यों में क्षेत्रीय दलों से तालमेल ही उसे भाजपा के मुकाबिल खड़ा कर सकता है. मैदान में उतरने से पहले युद्ध क्षेत्र के अलावा अपनी और शत्रु की स्थितियों का आकलन करना ही होता है. क्या कांग्रेस इस मामले में चूक कर बैठी है?












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