प्रशांत किशोर ने क्यों कहा कि लखीमपुर खीरी कांड से प्रियंका-राहुल को कोई फायदा नहीं मिलेगा?
नई दिल्ली, 09 अक्टूबर। क्या लखीमपुर खीरी हिंसा को राजनीतिक मुद्दा बनाने से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का आधार मजबूत हो जाएगा ? क्या प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के यूपी अभियान से हाशिये पर पड़ी कांग्रेस में नयी जान आ जाएगी ?

लखीमपुर खीरी हिंसा में 8 लोग मारे गये हैं और इसमें केन्द्रीय मंत्री अजय मिश्र के पुत्र समेत अन्य को आरोपी बनाया गया है। उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले कांग्रेस को क्या भाजपा के खिलाफ एक मजबूत मुद्दा हाथ लग गया है ? इन सारे सवालों के संदर्भ में प्रशांत किशोर का उत्तर नकारात्मक है। उनका मानना है कि लखीमपुर खीरी घटना से कांग्रेस को कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलने वाला। उन्होंने कांग्रेस को ग्रैंड ओल्ड पार्टी कह कर उसका मजाक उड़ाया है।

क्या कहा प्रशांत किशोर ने ?
प्रशांत किशोर ने कांग्रेस का नाम तो नहीं लिया है लेकिन लिखा है, "लखीमपुर खीरी घटना के आधार पर जो लोग ग्रैंड ओल्ड पार्टी (GOP) के त्वरित और स्वत:स्फूर्त पुनरुत्थान की आशा कर रहे हैं उन्हें निराशा हाथ लगेगी। जीओपी की समस्याएं और संरचनात्मक कमजोरियां जड़ तक गहरी हो चुकी हैं। दुर्भाग्य से इनका शीघ्र और नियत समाधान संभव नहीं है।" प्रशांत किशोर ने आखिर कांग्रेस पर क्यों कटाक्ष किया ? उनकी नजर में कांग्रेस की कौन सी समस्याएं हैं जिनका निदान नहीं हो सकता ? क्या प्रशांत किशोर ऐसा इसलिए कह रहे क्यों कि उनके कांग्रेस में जाने की सारी संभावनाएं लगभग खत्म हो गयीं हैं ? प्रशांत किशोर ने जुलाई 2021 में राहुल-प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी। उनके कांग्रेस में जाने की पुरजोर चर्चा चली। लेकिन ढाई महीने से यह मामला अधर में लटका हुआ था। अब जब प्रशांत किशोर ने कांग्रेस और राहुल-प्रियंका पर तीखा हमला किया है तो इसका मतलब है कहानी बीच में ही खत्म हो चुकी है। दरअसल प्रशांत किशोर बंगाल विजय के बाद भाजपा के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे थे। उनकी यह कोशिश नाकाम हो गयी। उन्हें कहना पड़ा कि विपक्ष की जो मौजूदा स्थिति (अपने अपने हितों में विभाजित) है उसके दम पर भाजपा को हराना मुश्किल है।

क्या लखीमपुर खीरी कांड से कांग्रेस को फायदा मिलेगा ?
लखीमपुर खीरी कांड किसान आंदोलन से जुड़ा है। यह कैसे हिंसक हुआ और कैसे 8 लोग मारे गये ? यह जांच का विषय है और मामला कोर्ट के अधीन है। लेकिन कांग्रेस इस घटना को भाजपा सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाने के लिए कमर कस चुकी है। खुद प्रियंका गांधी सड़क पर उतर गयीं। वे गिरफ्तार हुईं। इस दौरान उनके झाड़ू लगाने की तस्वीर चर्चा में रही। राहुल गांधी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, चर्चित नेता नवजोत सिंह सिद्धू जैसे दिग्गजों ने कांग्रेस के आंदोलन को नयी धार देने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा विपक्षी दल है समाजवादी पार्टी। उसके बाद बसपा का नम्बर है। विधायकों की संख्या के आधार पर कांग्रेस का तीसरा स्थान है। लेकिन लखीमपुर खीरी हिंसा पर सपा और बसपा की तुलना में कांग्रेस ही सबसे अधिक सक्रिय है। इस दौरान प्रियंका गांधी ने एक संघर्षशील नेता की छवि बनायी है। कांग्रेस इस घटना को न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पंजाब के लिए भी भुनाना चाहती है। इन दोनों राज्यों में अगले साल ही चुनाव होना है। लखीमपुर खीरी घटना के बाद प्रियंका गांधी को बहुत एक्सपोजर मिला है। इसके आधार पर कुछ लोगों का कहना है कि फिलहाल प्रियंका गांधी की लोकप्रियता अखिलेश यादव और मायावती से अधिक है। फिर प्रशांत किशोर कैसे कह रहे हैं कि कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिलेगा ?

भीड़ जुटने का मतलब जनसमर्थन नहीं
क्या प्रशांत किशोर यह कहना चाहते हैं कि किसी नेता के समर्थन में जुटने वाली भीड़, वोट की गारंटी नहीं होती ? 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की प्रभारी थीं। उनकी रैलियों में भीड़ जुटती थी। लेकिन ये भीड़ वोट में तब्दील नहीं हो सकी। कांग्रेस की करारी हरा हुई। चार महीने पहले भी पांच राज्यों में चुनाव हुए थे। केरल में राहुल गांधी ने समुद्र में मछली मारी, सिक्स पैक एब्स दिखाये, मार्शल आर्ट्स के नमूने भी पेश किये । लेकिन कांग्रेस को सत्ता नहीं दिला सके। जब कि वे केरल के वायनाड से ही सांसद हैं। प्रियंका गांधी असम में चाय की पत्तियां तोड़ कर भी कांग्रेस को सत्ता नहीं दिला सकीं। प्रियंका गांधी को लेकर आम लोगों में एक उत्सुकता तो है लेकिन इसका उन्हें चुनावी फायदा नहीं मिल सका है। प्रशांत किशोर (पीके) ने कांग्रेस को ग्रैंड ओल्ड पार्टी कह कर यह बताने की कोशिश की है उसकी परम्परावादी सोच उसे आगे नहीं बढ़ने दे रही। उन्होंने कांग्रेस को लकीर का फकीर बताया है। पीके ने वैसे तो कांग्रेस की बीमारी को लाइलाज बताया है लेकिन समस्या क्या है ? ये नहीं बताया है।

पुराने गौरव पर कब तक वोट मांगेगी कांग्रेस ?
पीके की राय में, कोई पार्टी मजबूत संगठन और लोकप्रिय कार्यक्रमों के बिना जनता के दिल में जगह नहीं बना सकती। चुनाव टोटकों से नहीं बल्कि जनसमर्थन से जीता जाता है। कांग्रेस कब तक अपने पुराने गौरव के नाम पर वोट मांगती रहेगी ? सिर्फ नेहरू-गांधी की विरासत पर निर्भर रहना ठीक नहीं, कांग्रेस को कुछ नये प्रयोग करने होंगे। नयी नीतियां बनानी होंगी। चर्चा के मुताबिक, प्रशांत किशोर ने राहुल-प्रियंका के सामने शर्त रखी थी के वे कांग्रेस में तभी आएंगे जब उन्हें काम करने की पूरी आजादी मिलेगी। वे सिर्फ सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को ही रिपोर्ट करेंगे। इसके अलावा कोई उनके काम में हस्तक्षेप नहीं करेगा। वे उसी तरह काम करेंगे जैसे की उन्होंने ममता बनर्जी के साथ किया था। लेकिन कांग्रेस यह जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हुई। प्रशांत किशोर के कहने का मतलब है, जब तक कांग्रेस की सोच नहीं बदलेगी उसका पुनरुद्धार संभव नहीं है।












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