प्रशांत किशोर बोले- मैं कभी भी नहीं ज्वाइन करूंगा बीजेपी, इसके पीछे है ये बड़ी वजह
नई दिल्ली, 23 दिसंबर: जब भी प्रशांत किशोर की बात होती है, तो उन्हें 'राजनीतिक रणनीतिकार' कहकर बुलाया जाता है, लेकिन ये शब्द उनको पसंद नहीं है। हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने इसका खुलासा किया। प्रशांत किशोर के मुताबिक 'राजनीतिक रणनीतिकार' शब्द का कोई दायरा नहीं है, इस वजह वो चाहते हैं कि लोग उन्हें 'राजनीतिक सहयोगी' कहें। प्रशांत पॉलिटिकल एक्शन कमेटी, जिसे हम I-PAC के नाम से जानते हैं, उसके संस्थापक हैं। साथ ही मौजूदा वक्त में तृणमूल कांग्रेस के लिए रणनीति बनाने का काम कर रहे हैं।

द प्रिंट को दिए इंटरव्यू में प्रशांत ने कहा कि मैं खुद को उन राजनेताओं के लिए एक राजनीतिक सहयोगी के रूप में देखता हूं, जो मेरे साथ चुनाव में काम करना पसंद करते हैं। वहीं जब उनकी विचारधारा को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि जाहिर है कि मेरे पास भी एक थी, लेकिन वो विचारधारा कभी मुझे निष्पक्षता खोने के लिए मजबूर नहीं करेगी। पीके ने बीजेपी नेताओं द्वारा लिंचिंग को सही ठहराने का उदाहरण देते हुए इसे विचारधारा की निष्पक्षता खोने का उदाहरण बताया।
अपने राजनीतिक करियर पर उन्होंने कहा कि वो बिहार में जेडीयू के सदस्य के रूप में एक असफल राजनेता थे। बाद में पार्टी की राज्य में कमजोर स्थिति को देखते हुए उनके नीतीश कुमार से मतभेद हो गए। एक बार तो वो लगभग कांग्रेस में शामिल हो गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने रास्ता बदल लिया। पीके ने आगे कहा कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं, लेकिन वो कभी भी बीजेपी में नहीं शामिल होंगे। उनके विचार बीजेपी से नहीं मिलते, ऐसे में वो उसमें शामिल होकर असहज हो जाएंगे।
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कांग्रेस पर किया हमला
पीके लंबे वक्त से कांग्रेस पर हमलावर हैं। इस इंटरव्यू में भी उन्होंने उस पर निशाना साधा। पीके ने कहा कि नरेंद्र मोदी के उदय को 7-8 साल हो गए हैं, लेकिन कांग्रेस अभी भी एकजुट नहीं हो पाई। वो धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण पत्र बांटती है, ठीक उसी तरह जिस तरह बीजेपी राष्ट्रवाद का प्रमाण पत्र देती है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पास अपनी विरासत को संभालने की क्षमता की कमी है। पिछले 20 वर्षों में उन्होंने किसी ऐसे राष्ट्रीय आंदोलन का मैनेजमेंट नहीं किया, जो 72 घंटे से ज्यादा चला हो।
क्या थी बीजेपी की हार की वजह?
प्रशांत किशोर के मुताबिक अगर कोई बीजेपी का मुकाबला करना चाहता है, तो उसे कांग्रेस के कब्जे वाले स्थान की जरूरत होगी। उन्होंने कुछ विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार पर कहा कि उसमें पार्टी का प्रदर्शन इसलिए खराब था, क्योंकि वहां पर अतिराष्ट्रवाद काम नहीं करता है। सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण वाले चुनावों में भी बीजेपी को 50-55 फीसदी से ज्यादा हिंदू वोट नहीं मिले हैं।












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