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Emergency के दौरान की वो बागी कविताएं, जिसने सत्ता की नींव हिला दी

Poems against Emergency 1975: आज, 25 जून 2025 को भारत में घोषित आपातकाल को पचास वर्ष पूरे हो चुके हैं। वह समय जिसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में काला अध्याय कहा जाता है। 25 जून 1975 को घोषित उस आपातकाल ने संविधान की आत्मा, नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार पर गहरी चोट की थी। सत्ता की आलोचना करना अपराध बन गया था। हजारों लोगों को बिना मुकदमे जेलों में डाल दिया गया। अख़बारों की सुर्खियां सरकारी अनुमति से तय होती थीं, और पूरे देश में डर और दमन का साया फैल गया था। लेकिन अंधेरे के उस दौर में एक लौ बुझी नहीं, वह थी कविता की। जब मंच छीन लिए गए, कविता गुप्त सभाओं की फुसफुसाहट बन गई। जब माइक बंद कर दिए गए, तब शब्दों ने दीवारों पर क्रांति की दस्तक दी।

रामधारी सिंह दिनकर की 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' उस समय जनचेतना का बिगुल बन गई। वहीं, नागार्जुन ने सत्ता की आंखों में आंखें डालते हुए सवाल पूछा, 'इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको?' इन कविताओं ने डर के माहौल में साहस, चेतना और प्रतिरोध का संचार किया। आज, जब हम आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर पीछे मुड़कर देखते हैं, तो जरूरी है कि हम उन कवियों और रचनाओं को याद करें, जिन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी की मशाल थामे रखी। आइए, जानें उन शब्द-योद्धाओं को, जिन्होंने अंधकार के विरुद्ध कविता की रोशनी से लड़ाई लड़ी।

Emergency

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है'

सदियों की ठंडी-बुझी राख फिर से सुलग उठी,
मिट्टी ने पहन लिया सोने का ताज, अब वह इठलाती है।
सुनो! समय के रथ का घर्घर नाद गूंज रहा है
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव डगमगाने लगती है,
सांसों के झोंकों से ताज हवा में उड़ जाता है।
जनता की राह रोक सके, समय में इतना बल कहाँ?
जिस दिशा को वह चाहती है, काल भी उसी ओर मुड़ जाता है।

ये कविता जिसने भारतीय लोकतंत्र के सबसे कठिन दौर में भी आमजन को शक्ति और साहस का संचार दिया। दिनकर जी ने इस कविता को 1960 के दशक में लिखी थी, लेकिन इसका वास्तविक पुनर्जन्म हुआ 1975 के आपातकाल के दौरान, जब देश की लोकतांत्रिक संस्थाएं दबाई जा रही थीं, प्रेस की आज़ादी पर ताले लगे थे, और हजारों लोगों को बिना मुकदमे जेल में ठूंसा गया था।

वहीं इस दौरान रामधारी सिंह दिनकर की जयप्रकाश नारायण के लिए लिखी गई कविता भी खूब चर्चा में रही

कहते हैं उसे 'जयप्रकाश', जो मरण से न घबराता,
जब ज्वाला बुझती है कुण्ड में, तब खुद उसमें कूद जाता।
वह 'जयप्रकाश' है, जो कभी सीमित न रह सकता घेरे में,
अपनी मशाल जलाकर, बाँटता फिरता है उजियाला अँधेरे में।

जनकवि नागार्जुन की 'इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?'

क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में
भूल गई बाप को?
इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!
क्या हुआ आपको?
छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको
काले चिकने माल का मस्का लगा आपको
किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको
अन्ट-शन्ट बक रही जनून में
शासन का नशा घुला ख़ून में
फूल से भी हल्का
समझ लिया आपने हत्या के पाप को
इन्दु जी, क्या हुआ आपको
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को

अटल बिहारी वाजपेयी की कविता 'झुलसाता जेठ मास, शरद चांदनी उदास'

सिसकी भरता सावन का
अंतर्घट रीत गया,
एक बरस बीत गया।

सींखचों में सिमटा जग,
किंतु विकल प्राण विहग,
धरती से अम्बर तक,
गूंजा मुक्ति गीत गया,
एक बरस बीत गया।

पथ निहारते नयन,
गिनते दिन, पल, छिन,
लौट कभी आएगा,
मन का जो मीत गया,
एक बरस बीत गया।

दुष्यंत कुमार की कविता 'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए'

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

केदारनाथ सिंह की कविता 'विद्रोह'

आज घर में घुसा
तो वहाँ अजब दृश्य था
सुनिए - मेरे बिस्तर ने कहा -
यह रहा मेरा इस्तीफ़ा
मैं अपने कपास के भीतर
वापस जाना चाहता हूँ

उधर कुर्सी और मेज़ का
एक सँयुक्त मोर्चा था
दोनों तड़पकर बोले -
जी, अब बहुत हो चुका
आपको सहते-सहते
हमें बेतरह याद आ रहे हैं
हमारे पेड़
और उनके भीतर का वह
ज़िन्दा द्रव
जिसकी हत्या कर दी है
आपने

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धर्मवीर भारती की कविता 'ख़लक खुदा का, मुलुक बाश्शा का'

ख़लक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का...

हर ख़ासो-आम को आगह किया जाता है कि
ख़बरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अंदर से
कुंडी चढ़ा कर बंद कर लें

गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी
अपनी काँपती कमज़ोर आवाज़ में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है!

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