Indira and RSS: नीरजा चौधरी की पुस्तक से इंदिरा गांधी और संघ के संबंध फिर चर्चा में
Indira and RSS: दुनिया के सबसे बड़े गैर राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और देश में लगभग छह दशक तक सरकार चलाने वाली पार्टी कांग्रेस के संबंधों को लेकर तमाम तरह के रोचक दावे सामने आते रहते हैं। हालांकि इनमें से कई पूरी तरह सच नहीं होते, कई आधे सच होते हैं तो कुछ पूरी तरह सुनी सुनाई बातों पर आधारित होते हैं। याददाश्त के आधार पर किए गए कुछ दावे तथ्यपरक नहीं होते तो कुछ तथ्यों में घालमेल से उपजे होते हैं।
इन दिनों संघ नेतृत्व और कांग्रेस के नेताओं के संबंधों को लेकर कई तरह के दावे सामने आते रहते हैं। इनमें से सबसे ताजा रोचक वर्णन संघ के तीसरे सरसंघचालक रहे मधुकर दत्तात्रेय देवरस (प्रचलित नाम बालासाहब देवरस) और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पत्र व्यवहार का है। विशेषकर मनमाफिक तौर पर व्याख्या किए गए उन पत्रों का जो देवरस ने आपातकाल के दौर में लिखे थे।

उन पत्रों का आधार लेकर यह गाहे-बगाहे यह बताने की जबरिया कोशिश की जाती है कि आपातकाल के विरोध और इंदिरा गांधी के शासन को लेकर संघ के अंदर राय बंटी हुई थी। तत्कालीन हकीकत यह थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा हुआ था। देश के कई बड़े नेताओं की तरह संघ के सरसंघचालक बालासाहब देवरस जेल में बंद थे। देश में आपातकाल विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था। इसके साथ ही सरकार का दमनचक्र भी अपने चरम पर था।
फिर क्यों सुर्खियों में आया 1975-76 का लिखा देवरस का पत्र
अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की कंट्रीब्यूटिंग एडिटर नीरजा चौधरी ने अपनी किताब 'हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड' में देश के प्रधानमंत्रियों के बारे में लिखते हुए कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ रिश्ते को लेकर कई दावे किए हैं। इनमें इंदिरा गांधी, बालासाहब देवरस और आपातकाल का जिक्र एकबारगी फिर से सुर्खियों में आ गया है।
उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि आरएसएस प्रमुख बालासाहब देवरस ने एक बार बातचीत में कहा था कि 'इंदिरा गांधी बहुत बड़ी हिंदू हैं।' किताब में लिखा गया है कि आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने देवरस से मुलाकात का प्रस्ताव ठुकरा दिया था और बाद में उन्होंने 1982 में अपने बेटे राजीव गांधी को बालासाहब देवरस के छोटे भाई और संघ के सीनियर नेता भाउराव देवरस से मिलने और बातचीत करने भेजा था। 1982-1984 में दोनों की तीन मुलाकातें हुईं और चौथी मुलाकात 1991 में हुई थी। किताब में दावा किया गया है कि आपातकाल के बाद सत्ता में वापसी और संजय गांधी की आकस्मिक मौत के बाद इंदिरा गांधी का झुकाव हिंदूवादी संगठनों की ओर होने लगा था।
किताबों-संस्मरणों और राजनीतिक दावों में क्या दोहराया जाता है
मीडिया रिपोर्ट्स में इंदिरा गांधी को लिखे बालासाहब देवरस के पत्रों के आधार पर दावा किया जाता है कि उन्होंने संघ को आपातकाल विरोधी आंदोलन से अलग बताया था और मुसलमानों के परिवार नियोजन के लिए संजय गांधी के सख्त कदमों की तारीफ की थी। उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का समय भी मांगा था, जो उन्हें नहीं मिला था।
इन दावों के लिए बालासाहब देवरस की किताब 'हिंदू संगठन और सत्तावादी राजनीति' का सहारा लिया जाता है जिसके परिशिष्ट में वे पत्र प्रकाशित हैं जो यरवदा जेल से 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को और 1976 में सर्वोदयी नेता बिनोबा भावे को लिखे गए हैं। इन पत्रों में देवरस ने इंदिरा गांधी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और लालकिले से उनके भाषण का जिक्र किया है, उनसे मिलने का समय मांगा है, आपातकाल विरोधी आंदोलन से संघ को अलग बताया है और संघ के कार्यकर्ताओं का देश के लिए उपयोग की चर्चा की है।
विनोबा भावे को लिखे पत्र में उन्होंने संघ के विषय में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गलत धारणाओं को दूर करने के लिए प्रयास करने की प्रार्थना की है। इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक टीवी राजेश्वर अपनी किताब 'इंडिया: द क्रूसियल इयर्स' में इसका जिक्र करते हुए लिखते हैं कि आपातकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध के बाद देवरस ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आवास तक चुपचाप संपर्क स्थापित कर लिया था। 1980-90 के दशक में कई राज्यों में राज्यपाल रहे राजेश्वर की किताब का पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने विमोचन किया था।
क्या है इंदिरा गांधी-विनोबा भावे को देवरस के पत्रों का सच
संघ के तत्कालीन प्रमुख बालासाहब देवरस के इंदिरा गांधी के लिखे पत्रों को लेकर ऐसे तमाम दावों और मनमाफिक व्याख्याओं पर के. आर. मलकानी ने 1980 में प्रकाशित अपनी किताब 'द आरएसएस स्टोरी' में पृष्ठ संख्या 93-94 पर बहुत स्पष्टता से जवाब दे दिया था। 'द ट्रूथ बिहाइंड श्री बालासाहब देवरस' लेटर्स टू प्राइम मिनिस्टर इंदिरा गांधी' शीर्षक वाले चैप्टर में उन्होंने विनोबा भावे को लिखे देवरस के पत्रों का भी जिक्र किया है।
पांडिचेरी के राज्यपाल रहे केएल मलकानी ने लिखा कि आपातकाल लागू होने के दो महीने बाद संघ प्रमुख बालासाहब देवरस ने इंदिरा गांधी को पत्र लिखा। उन्होंने संघ पर लगे आरोप को झूठा बताते हुए प्रतिबंध हटाने की मांग की। जवाब नहीं आया तो तीन महीने बाद उन्होंने दूसरा पत्र लिखा। इसमें उनके चुनाव को वैध ठहराए जाने, देश के विकास की समस्याएं और संघ पर से प्रतिबंध हटाए जाने पर अपना मत रखा। इसका जवाब भी नहीं आया। इसके बाद बालासाहब देवरस ने विनोबा भावे को दो पत्र लिखे। इनमें देवरस ने विनोबा भावे से संघ को लेकर प्रधानमंत्री की गलत धारणाओं को दूर करने और प्रतिबंध हटाने के लिए कहने हेतु लिखा।
दूसरे पत्र के चार दिन बाद ही संघ का आपातकाल विरोधी देशव्यापी सत्याग्रह
मलकानी ने यह भी बताया है कि बालासाहब देवरस ने इंदिरा गांधी को 10 नवंबर, 1975 को दूसरा पत्र लिखा था। इसके ठीक 4 दिन बाद उन्होंने संघ कार्यकर्ताओं के एक देशव्यापी सत्याग्रह का आरंभ किया था। इसमें संघ के 80 हजार से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी दी और आपातकाल लाने वाली सरकार को बुरी तरह हिलाकर रख दिया था। आपातकाल विरोधी आंदोलन की यह सबसे बड़ी राजनीतिक गतिविधि के तौर पर दर्ज है।
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