पीएम मोदी के सबसे पसंदीदा 'नारे' का BJP में ही होने लगा विरोध! किसकी चलेगी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पहली बार केंद्र में भाजपा को मिले पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आए तो उन्होंने 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा दिया, जो आगे चलकर उनकी सरकार के कार्यों का आधार वाक्य की तरह बन गया।

जैसे-जैसे प्रधानमंत्री मोदी का कार्यकाल आगे बढ़ता गया, उन्हें अपने नारे के प्रति विश्वास और बढ़ता गया और उसे उन्होंने अपनी सरकार का संकल्प बनाकर उसमें और शब्दों को शामिल किया।

pm modi and sabka sath sabka vikas

'सबका साथ, सबका विकास......हर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण- पीएम मोदी
एक ऐसा समय भी आया जब पीएम मोदी ने 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से इसका विस्तार करते हुए कहा, 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास हमारे हर लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।'

भाजपा के एक वर्ग में उठ रहा है इस नारे पर से विश्वास!
लेकिन, इस बार के लोकसभा चुनावों में जिस तरह के नतीजे आए हैं, उससे लग रहा है कि बीजेपी के अंदर एक वर्ग में ही 'सबका साथ, सबका विकास' की भावना पर से विश्वास उठ रहा है!

इलाका देखकर फंड आवंटित करने की होने लगी चर्चा
गुजरात में बीजेपी इस बार 26 में से 25 सीटें ही जीत सकी है। लेकिन, इतने से ही पार्टी के अंदर एक असहजता की स्थिति पैदा होने लगी है। पहले वडोदरा के भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि विकास से जुड़े फंड उन इलाकों में नहीं खर्च होना चाहिए, 'जहां' पार्टी को पर्याप्त वोट नहीं मिले हैं।

जूनागढ़ से नव-निर्वाचित पार्टी सांसद राजेश चुडास्मा का भी कहना है कि चुनावों के दौरान उन्हें 'जिन लोगों' ने परेशान किया है, वह उन्हें नहीं छोड़ेंगे।

इससे पहले वडोदरा भाजपा अध्यक्ष विजय शाह ने कहा था कि 'ऐसे बूथ भी हैं जहां बीजेपी को हमेशा कम वोट मिलते हैं। सात या आठ सौ वोटों में से कभी-कभार एकल या दहाई अंकों में।' शाह का कहना था कि जिन इलाकों में बीजेपी को पिछले पांच, दस, पंद्रह वर्षों से कभी वोट नहीं मिलते हैं, उनकी जगह उन क्षेत्रों पर बजट का पैसा खर्च किया जाना चाहिए, जहां के लोगों ने पार्टी को वोट दिया है।

भाजपा सरकार विकास कार्यों में किसी तरह भेदभाव नहीं करती- बीजेपी
हालांकि, शाह के नजरिए की बीजेपी के नेताओं की ओर से भी आलोचना हो चुकी है और उनकी टिप्पणी को उनकी निजी राय बताने की कोशिश की गई है। वैसे गुजरात बीजेपी के प्रवक्ता यमल व्यास का दावा है कि इस तरह की टिप्पणियां नेताओं की तरफ से बोलने में हुई चूक है,क्योंकि पार्टी विकास कार्यों में लोगों के बीच भेदभाव नहीं करती।

व्यास ने कहा, 'चाहे पानी हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या आवास हो, कल्याणकारी योजनाएं राज्य के सभी नागरिकों के लिए हैं, किसी एक वर्ग के लिए नहीं।'

यूपी के रामपुर की कुछ बूथों की हो रही है खूब चर्चा
दरअसल, इस बार के चुनाव नतीजों के बाद सोच-विचारकर कल्याणकारी योजनाओं का फंड खर्च करने की चर्चा भाजपा के अंदर और पार्टी समर्थकों में खूब जोर-शोर से चल रही है।

क्योंकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूपी में रामपुर लोकसभा सीट पर कुछ ऐसे बूथ सामने आए हैं, जहां सिर्फ मुसलमान ही वोटर हैं, लेकिन भाजपा के पक्ष में लगभग नहीं के बराबर वोट पड़े हैं। जबकि, प्रधानमंत्री आवास योजना समेत तमाम केंद्रीय योजनाओं का लाभ उन क्षेत्रों के लोगों को बिना किसी भेदभाव के पहुंचाया गया है।

जेडीयू के सांसद के बयान पर भी हो चुका है विवाद
सिर्फ भाजपा ही नहीं, बिहार में पार्टी की सहयोगी जेडीयू के सीतामढ़ी से नव-निर्वाचित सांसद का भी इसी तरह का कथित बयान आ चुका है कि उन्हें मुसलमानों ने वोट नहीं दिया और वह उनका काम नहीं करेंगे। हालांकि, बाद में विवाद बढ़ने पर उन्होंने सफाई दी कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया।

बीजेपी में किसकी चलेगी?
बड़ा सवाल है कि बीजेपी के अंदर और सहयोगी दलों के मन में उठ रहे विचारों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है। वैसे 10वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर पीएम मोदी ने जिस तरह से श्रीनगर में स्थानीय लोगों के साथ गर्मजोशी और भरपूर उत्साह के साथ योग किया है, उससे लगता नहीं कि वे अपनी नीतियों और सिद्धांतों के पथ से डगमगाने वाले हैं!

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