'वंदे मातरम्' को मिले 'जन गण मन' जैसा सम्मान, दिल्ली HC में PIL दायर, क्या दी गई है दलील ? जानिए

नई दिल्ली, 24 मई: दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को भी राष्ट्र गान 'जन गण मन' जैसा सम्मान और दर्जा देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस गीत ने बहुत ही बड़ी भूमिका निभाई है, इसीलिए इसे भी राष्ट्र गान जैसा सम्मान मिलना चाहिए। इसमें 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के बयान की भावना का जिक्र करते हुआ कहा गया है कि 'गीत वंदे मातरम्, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका अदा की, उसे भी जन-गण-मन जैसा सम्मान और दर्जा मिलेगा।' यह याचिका भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने हाई कोर्ट में दायर की है।

'वंदे मातरम्' को मिले 'जन गण मन' जैसा सम्मान-पीआईएल

'वंदे मातरम्' को मिले 'जन गण मन' जैसा सम्मान-पीआईएल

वंदे मातरम् को जन गण मन जैसा दर्जा देने की मांग करते हुए जनहित याचिका में दिल्ली उच्च न्यायालय से यह भी मांग की गई है कि वह केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दे कि हर कार्य दिवस पर सभी स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में जन गण मन और वंदे मातरम् बजाया/गाया जाए। याचिकाकर्ता ने इसके लिए संविधान सभा से 24 जनवरी, 1950 को पारित प्रस्ताव की भावना के तहत मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अधार पर गाइडलाइन तैयार करने की भी गुहार लगाई गई है।

'इन दोनों पर फैसला संविधान निर्माताओं ने किया है'

'इन दोनों पर फैसला संविधान निर्माताओं ने किया है'

अश्विनी कुमार ने कहा है कि भारत राज्यों का एक संघ है, ना कि राज्यों का संगठन या परिसंघ है। सिर्फ एक राष्ट्रीयता है और वह है भारतीय; और यह हर भारतीय का उत्तरदायित्व है कि वह 'वंदे मातरम्' का सम्मान करे। इसमें कहा गया है, 'देश को एकजुट रखने के लिए, जन गण मन और वंदे मातरम् को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय नीति तैयार कर उसका प्रचार-प्रसार करना सरकार का कर्तव्य है। कोई कारण नहीं है कि यह कोई अन्य भावना को पैदा करे, क्योंकि इन दोनों पर फैसला संविधान निर्माताओं ने किया है।'

वंदे मातरम् का सम्मान हर भारतीय का कर्तव्य

वंदे मातरम् का सम्मान हर भारतीय का कर्तव्य

याचिका के मुताबिक 'जन गण मन में व्यक्त भावनाओं को राज्य (राष्ट्र) को ध्यान में रखते हुए जाहिर किया गया है। जबकि, वंदे मातरम् में व्यक्त भावनाएं राष्ट्र के चरित्र और शैली को जाहिर करती हैं और एक समान सम्मान के पात्र हैं। कई बार, वंदे मातरम् ऐसी परिस्थितियों में गाया जाता है जो क्षम्य नहीं हैं और जिसका कभी भी कानून समर्थन नहीं किया जा सकता है। यह हर भारतीय का कर्तव्य है कि जब वंदे मातरम् बजाया जाय/गाया जाए तो उसका सम्मान करें।'

वंदे मातरम् से डर गए थे अंग्रेज- पीआईएल

वंदे मातरम् से डर गए थे अंग्रेज- पीआईएल

याचिका के मुताबिक जब भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्ति दिलाने के लिए स्वाधीनता आंदोलन चल रहा था, तब वंदे मातरम् पूरे राष्ट्र की सोच और लक्ष्य बना हुआ था। बड़ी रैलियों और सभाओं में वंदे मातरम् के नारे गूंजते थे। इसकी लोकप्रियता से अंग्रेज इतने डर गए थे कि सार्वजनिक सभाओं में इसपर एक बार पाबंदी तक लगा दी थी और कई स्वतंत्रता सेनानियों को फरमान नहीं मानने के लिए जेल में डाल दिया था।

स्वतंत्रता आंदोलन में लोकप्रिय था वंदे मातरम्

स्वतंत्रता आंदोलन में लोकप्रिय था वंदे मातरम्

याचिका में वंदे मातरम् के बारे में बताया गया है कि राष्ट्र गान की रचना करने वाले गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया था। पांच साल बाद 1901 में दखिना चरण सेन ने कांग्रेस के ही एक और कलकत्ता अधिवेशन में इसे गया था। 1905 में सरला देवी चौधरानी ने बनारस के कांग्रेस अधिवेशन में भी यह गीत गाया था। लाला राजपत राय ने तो लाहौर से एक जर्नल ही शुरू कर दिया था, जिसका नाम ही वंदे मातरम् था।

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