जरा सोचिए क्या होता अगर पुरुषों को भी होते पीरियड्स
नयी दिल्ली। अरे ओ मर्दों! ना हंसो मुझ पर कि जब मैं इस दर्द से छटपटाती हूं,
क्योंकि इसी माहवारी की बदौलत मैं तुम्हें ‘भ्रूण' से इंसान बनाती हूं।
बात सिर्फ भारत की कर रहे हैं क्योंकि यही एक ऐसा देश है जहां परंपरा, विज्ञान और भ्रातियां (छूत-अछूत) कभी ना मिलने वाली नदियों के दो किनारों के की तरह बहती रहती हैं। यहां के ज्यातार हिस्सों में हिंदू और मुसमलान तबकों में मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान महिलाओं के साथ अछूतों की तरह व्यवहार किया जाता है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है लेकिन परंपरा के नाम पर यह अभी भी बदस्तूर चला आ रहा है। सामान्यत: चार दिनों तक चलने वाला पीरियड्स महिलाओं के लिए किसी सजा से कम नहीं होता। मासिक धर्म को लेकर बदल रही है सोच

ये ना टच करो, वो ना टच करो... कोई शुद्ध चीजों को हाथ ना लगाओ वरना अशुद्ध हो जायेगा या फिर इस दौरान पूजा बिल्कुल मत करना वरना पति की मौत हो जाएगी। माहवारी के दौरान महिलाएं न तो खाना पका सकती हैं और न ही दूसरे का खाना या पानी छू सकती हैं। उनको मंदिर और पूजा-पाठ से भी दूर रखा जाता है। कई मामलों में तो उनको जमीन पर सोने के लिए मजबूर किया जाता है। साफ शब्दों में कहें तो इस दौरान महिलाओं को अपवित्र माना जाता है।
पर क्या आपने कभी सोचा है कि अगर ऐसी ही प्रक्रिया पुरुषों में भी होती तो क्या ऐसा ही भेदभाव होता। क्या उन्हें भी घर से ना निकलने की हिदायत दी जाती या फिर उन्हें भी कहा जाता कि पूजा-पाठ ना करो। हालांकि इस चर्चा में दम नहीं है लेकिन फिर भी यह सोचा तो जा ही सकता है कि अगर महिलाओं की तरह पुरुषों को भी पीरियड्स होतो तो क्या होता? तो आईए इसी गंभीर मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करते हैं। पीरियड की तस्वीर हटाने पर इंस्टाग्राम को जाना पड़ा कोर्ट, मांगी माफी
अबतक हर स्कूलों में बंट चुके होते सेनेटरी पैड
पीरियड्स के दौरान महिलाओं को झेलने वाले सामाजिक दंश और इस दौरान उनके अंदर से गिरते आत्मबल को समझते हुए सेनेटरी पैड प्रयोग में लाया गया। चुकि सेनेटरी पैड महंगे होते हैं इसलिए हर महिलाओं तक इनकी पहुंच नहीं हो पाती। इस गंभीर मुद्दे को संज्ञान में लेते हुए केंद्र सरकार ने हर सरकारी स्कूलों में सेनटरी पैड बंटवाने का सर्कुलर जारी किया। हालांकि यह सर्कुलर ठंड़े बस्ते है। लेकिन पीरियड्स की समस्या अगर पुरुषों को भी होती शायद यह सर्कुलर अमल में आ चुका होता।
तो समाज की संकुचित सोच बदल जाती
आज अगर पीरियड्स के बारे में किसी से कोई सवाल पूछा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ ऐसी बात कह दी गई हो जिसे कहना ही जुर्म हो। लेकिन अगर पुरुषों को भी पीरियड्स होते तो शायद समाज की सोच बदल जाती और इस मुद्दे पर भी चर्चा होती।
जनसंख्या पर भी लग जाती लगाम
पीरियड्स के दौरान सेक्स से दूर रहने की सलाह दी जाती है। तो जरा सोचिए चार दिन महिलाओं की तरफ से मनाही होती और चार दिन पुरुषों की तरफ से मनाही होती तो जनसंख्या कंट्रोल हो जाता।












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