भारत-पाक बंटवारे में टूटे नाना के दिल को नाती ने कैसे जोड़ा
आज से 75 साल पहले भारत विभाजन के वक्त लाखों परिवारों की तरह स्पर्श आहूजा के परिवार को भी अपने घर से भागना पड़ा था. उनके नानाजी जहां से भागे थे वहां का कभी जिक़्र नहीं करते थे. लेकिन उनके नाती नाना को इसका जिक़्र करने के लिए प्रोत्साहित करता रहा. इसी हौसला अफज़ाई की बदौलत दोनों ओर के दो परिवारों का मिलन हो सका.

धर्म और भौगोलिक सीमा ने उन्हें भले ही दशकों तक अलग कर रखा हो लेकिन आख़िरकार वे एक हुए.
स्पर्श अपनी हथेलियों में धूसर रंग के तीन पत्थर को दिखाते हैं. उनके लिए ये बेशकीमती हैं. यही उस जमीन से उनके संपर्क के सूत्र हैं, जहां कभी उनके पूर्वज रहा करते थे.
इन पत्थरों की ओर उनका सफ़र पांच साल पहले शुरू हुआ था, जब वह अपने नाना के घर जा रहे थे. स्पर्श ने पाया कि उनके नाना इशर दास अरोड़ा उर्दू में अपने नोट्स लिख रहे हैं. लेकिन उर्दू तो पाकिस्तानी की आधिकारिक भाषा है. यहीं से स्पर्श का सफ़र शुरू हुआ.
स्पर्श जानते थे कि उनके नाना का घर वहां था, जिसे अब पाकिस्तान कहा जाता है. इससे ज़्यादा उन्हें कुछ मालूम नहीं था. परिवार में इसके बारे में कोई बात नहीं करता था.
वह कहते हैं, '' यहां तक कि टीवी या फिर कोई बोर्ड गेम खेलने के दौरान भी पाकिस्तान से जुड़ी कोई चीज़ आ जाती थी या इसका हल्का सा भी जिक़्र होता तो परिवार में चुप्पी छा जाती थी.
अतीत की याद
स्पर्श को इसे लेकर उत्सुकता रहती थी. एक शाम शतरंज खेलते हुए उन्होंने अपने नानाजी से उनके बचपन के बारे में पूछना शुरू कर दिया. उस जगह के बारे में पूछना शुरू किया,जहां उनका बचपन गुज़रा था.
स्पर्श याद करते हैं, ''असल में वह हिचक रहे थे. पहले कुछ पलों में उन्होंने कुछ सोचा और कहा, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. तुम क्यों इसकी परवाह कर रहे हो? ''
लेकिन धीरे-धीरे वो खुलने लगे. वो यह देख कर खुश थे कि कोई दिचलस्पी दिखा रहा है. स्पर्श ने उनसे पूछा कि क्या वो परिवार की कहानी लिख सकते हैं. इशर राज़ी हो गए. स्पर्श कहते हैं, उन्होंने मेरी नानी से उनका सबसे बढ़िया सूट और टाई निकाल लाने को कहा. वह तुरंत इसे पहन कर तैयार हो गए''.
शानदार सफ़ेद शर्ट पहने और बालों को संवारे इशर ने उस दिन अपने परिवार के इतिहास के बारे में 'चुप्पी' तोड़ डाली.
विभाजन का साया
स्पर्श उम्र के दूसरे दशक में है. वो काफी सोच कर बोलते हैं. उनमें एक शालीनता है. उस दिन अपने नाना से बातचीत ने उनकी ज़िंदगी बदल दी थी .
मैं ईस्ट लंदन के ब्रिक लेन में उनके घर पर मिली. उन्होंने बताया कि कैसे उनके नानाजी ने बताया कि उनका जन्म बेला (पाकिस्तान) में 1940 में हुआ था. यह पंजाब के जांड का एक मुस्लिम बहुल गांव था. उनके नाना के मां-बाप सड़क किनारे एक दुकान में मूंगफली बेचा करते थे. ब्रिटिश भारत में ये वक्त शांति का था.
लेकिन विभाजन के वक्त जब उनके गांव पर हमले होने लगे. इशर उस वक्त सिर्फ़ सात साल के थे.
1947 में धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ. भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना. पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच भी बंटवारा हुआ और बांग्लादेश का जन्म हुआ.
लेकिन इस बंटवारे की वजह से बड़ी तादाद में लोग इस पार से उस पार हुए. युद्ध और अकाल को छोड़ कर इतना बड़ा पलायन नहीं हुआ था. लगभग एक, सवा करोड़ लोगों को दोनों ओर से भागना पड़ा.
बंटवारे के दौरान हिंसा में लगभग दस लाख लोग मारे गए.
पाकिस्तान मिशन
इस हिंसा के दौरान इशर और उनके हिंदू परिवार को गांव के मुखिया के घर में शरण मिली, जो मुसलमान थे. जब हत्यारों की भीड़ हाथ में बंदूक लिए हिंदुओं की तलाश में उनके घर का दरवाज़ा खटखटा रहे थे तो मुस्लिम सरपंच ने किसी को अंदर नहीं आने दिया था.
इशर की यादों में यह खौफ़ छाया हुआ था. उन्हें इसके बाद दिल्ली आने की बात याद नहीं है. हालांकि अब वह यहीं रहते हैं.
स्पर्श ने नानाजी की यह कहानी सुनी. यह भी सुना कि कैसे उनके नानाजी को एक मुस्लिम शख़्स ने बचाया. फिर कैसे उनका परिवार पाकिस्तान से दिल्ली आया. इन बातों ने स्पर्श की मन: स्थिति को बदल दिया. उन्होंने महसूस किया पहली बार वह अपने नानाजी के बारे में ठीक से जान रहे हैं.
लेकिन इन सबके बाद वह एक मिशन पर निकल पड़े. वह कहते हैं, ''अब बस मैं सिर्फ़ ये चाहता था कि सीधे उस गांव में पहुंच जाऊं. मुझे महसूस हुआ कि हमारे परिवार की कहानी वहां एक बार गए और उस जगह को देखे बगैर पूरी नहीं होगी''.
स्पर्श ने अपने नानाजी से कहा कि वह बेला जाना चाहते हैं. लेकिन इशर ने कहा,''वहां जाने में ख़तरा है. यहीं रहो. वहां अब क्या रह गया है?
लेकिन स्पर्श डटे रहे. वह बेहद उत्सुक थे. लेकिन स्पर्श ने देखा कि भले ही उनके नानजी अपने पोते के पाकिस्तान जाने के फै़सले से डर रहे हों लेकिन वो थोड़े उत्सुक भी थे. उनके नाना अब भी बेला को 'घर' कह रहे थे.
स्पर्श पाकिस्तान जाने की तैयारी करने लगे. वह कहते हैं, '' मेरा एक हिस्सा वहां है. मैं कई जगह पला-बढ़ा. भारत में मैं पैदा हुआ. ऑस्ट्रेलिया में पला-बढ़ा. ब्रिटेन में पढ़ा और नौकरी की. इसलिए मेरे लिए यह कहना मुश्किल है कि मैं कहां से हूं. मुझे लगता है मेरे पास कोई ऐसी जगह नहीं है कि जिसके बारे में मैं कह सकूं मैं यहां से हूं. तो मैं कहना ये चाहता हूं कि पहेली का कोई सिरा गायब है. ''
नानाजी की गूंजती पहाड़ी
मार्च 2021 में स्पर्श इस्लामाबाद में थे.अपने पूर्वजों के घर की यात्रा ( 100 किलोमीटर दूर) के लिए वह सुबह जल्दी उठ गए. उन्होंने पारंपरिक नीली सलवार कमीज़ पहनी और खास तरह की पगड़ी बांध रखी थी. उन्होंने इशर के पिता यानी अपने परनाना की तस्वीर देखी . अपने नाना के बनाए नक्शे को हाथ में पकड़े स्पर्श टैक्सी की पिछली सीट पर बैठे थे.
स्पर्श उस सफ़र को याद करते हुए कहते हैं, '' नक्शे में मेरे नाना ने एक मस्जिद, एक नदी और एक पहाड़ी का चित्र खींचा था. इसे वो पुकारने वाली (गूंज) पहाड़ी कहते थे. वो वहां जाकर अपना नाम जोर से बोलते थे और आवाज़ टकरा कर वापस लौटती थी. ''
स्पर्श लंबी यात्रा में शांत बैठे थे. कार चली जा रही थी. फिर वह एक घाटी में पहुंची, जहां नदी बह रही थी. एक जगह लिखा था- बेला. स्पर्श गाड़ी से उतर गए और जितनी अच्छी पंजाबी बोल सकते थे उसमें किसी एक बुजुर्ग महिला को बताया कि वो यहां क्यों आए हैं. वो महिला तो इसके बारे में कुछ नहीं बता पाई लेकिन उसने ये ज़रुर कहा कि गांव के सरपंच इसके बारे में बता सकते हैं.
गांव में घुसते ही कई स्थानीय लोगों से आमना सामना हुआ. वे स्पर्श को घूर रहे थे. वो सोच रहे थे कि आख़िर अचानक ये कार यहां कैसे आई. यह बात तेज़ी से फैल गई. गांव तीन हिस्सों में बंटा था. स्पर्श कहते हैं, '' जब तक मैं गांव के तीसरे हिस्से में पहुंचा यह बात फैल चुकी थी कि कोई युवक गांव में ऐसे ही घूमते-घूमते पहुंच गया है. लोग एक दूसरे को फोन करके ये बात बताने लगे. ''
हिंदू,मुस्लिम ने एक दूसरे को बांहों में भर लिया
स्पर्श ने सरपंच का घर ढूंढ निकाला. उन्होंने परिचय देने के बाद कि 75 साल पहले बेला गांव के एक शख़्स ने उनके नानाजी की जान बचाई थी. क्या वह उन्हें जानते हैं?
स्पर्श कहते हैं, ''वह बिल्कुल चुप हो गए. उन्होंने कहा, '' आप मेरे पिताजी की बात कर रहे हैं. '' सरपंच बुज़ुर्ग थे. विभाजन के वक्त वह बच्चे रहे होंगे.
स्पर्श कहते हैं, '' सरपंच ने बताया कि उन्हें मेरे नाना और मेरे परिवार की याद है. भावुक हुए स्पर्श ने उनसे कहा, ''अगर उस दिन आपके पिता नहीं होते मैं यहां आपको खड़ा नहीं दिखता''
स्पर्श को गांव के सरपंच के घर उनके बेटे और पोते से मिलाने ले जाया गया. उन्होंने साथ में चाय पी. उन्होंने वही कहानी सुनाई कि कैसे उनके परिवार को बचाया गया था. लेकिन इस बार कहानी उन लोगों ने सुनाई, जिनके परिवार वालों ने स्पर्श के नानाजी के परिवार को बचाया था. इसके पहले वो अपने नाना से ये कहानी सुनते आए थे.
फिर इशर (स्पर्श) को बचाने वाले शख़्स के पोते और पड़पोते ने स्पर्श का हाथ पकड़ कर पूरे गांव में घुमाया. फिर एक जगह पर पहुंच कर उन्होंने कहा,'' स्पर्श यही वह मस्जिद है, जिसके थोड़ा आगे तुम्हारे नानाजी रहा करते थे. ''
फिर उन्होंने मिट्टी के एक घर की ओर इशारा करते हुए कहा कि यही वह ज़मीन है, जहां इशर रहते थे. स्पर्श उस खलिहान के बीचोंबीच चले गए और ज़मीन को चूम लिया. जब वह उठे तो एक हिंदू और दूसरे मुस्लिम ने एक दूसरे को बांहों में भर लिया.
पीढ़ियों की त्रासदी से मुक्ति
उन पलों को याद कर स्पर्श की आवाज़ कांप रही थी. वो बेहद भावुक करने वाला पल था. उस दौरान उनकी आंखों में आंसू थे. वह कहते हैं, '' उस पल माहौल ही कुछ ऐसा था. मुझे लगा कि आख़िरकार मैंने मंज़िल पा ली. मैंने सोचा नहीं था कि मेरी ज़िंदगी में यह संभव हो सकेगा. ''
स्पर्श कहते हैं, '' बेला गांव पहुंचने से पहले मैं इस बात को लेकर गुस्से में रहता था उनका सबकुछ खत्म हो गया. लेकिन उस दिन बेला पहुंचने पर काफी कुछ नाराज़गी खत्म हो गई.''
स्पर्श कहते हैं, '' इस तरह की यात्रा से आप एक पूरी पीढ़ी की त्रासदी से खुद को मुक्त कर देते हैं''
अगर आप यह सुनते हुए बड़े होते हैं, '' ये वो जगह है जहां से हम आए हैं और हम फिर वहां नहीं जा सके. ये वो कहानी नहीं है जो मैं अपने बच्चों को बताऊं.'' वह आगे कहते हैं, '' हम अपनी ये ज़मीन खो बैठे लेकिन हम उस जगह लौटे. मेरे हिसाब से समय का एक चक्र पूरा हो चुका था. ''
धूसर पत्थरों से जुड़ा रिश्ता
बेला गांव से लौटने से पहले स्पर्श ने उस जगह से धूसर रंग के कुछ गोल पत्थर के टुकड़ों को उठा कर अपनी जेब में भर लिया था. ये वही जगह थी जहां उनके पूर्वज कभी रहा करते थे.
उस रात इस्लामाबाद में पहुंच कर उन्होंने अपने नाना को वॉट्सऐप किया. इशर ने जवाब दिया, '' हमें तुम पर गर्व है. तुमने मेरी मातृभूमि को स्पर्श किया है. इस अहसास को मैं तुम्हें बता नहीं सकता ''
बंटवारे की इस त्रासद कहानी को फिर से लिखने में तीन पीढ़ियां लग गई.
अब दोनों परिवार ( पाकिस्तान के बेला के सरपंच का परिवार) एक दूसरे से वॉट्सऐप के ज़रिये जुड़े हुए हैं . वे एक दूसरे के पर्व-त्योहारों पर बधाई और शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हैं. लेकिन कुछ चीज़ें अब भी साफ़ नहीं हुई हैं.
जब भी दोनों देशों के बीच राजनीतिक माहौल तनाव भरा होता स्पर्श के नानाजी वॉट्सऐप मैसेज करना बंद कर देते हैं. वह कहते हैं, मैं इस वक्त मैसेज नहीं करना चाहता. मुझे मालूम नहीं कि ये सुरक्षित है या नहीं' ''
दोनों ओर से कड़े रुख़ वाले लोग हैं. पिछले साल बेला के सरपंच के रिश्तेदार ने लिखा, ''अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा इस्लामी की जीत है. '' इस पर स्पर्श ने लिखा, '' भाई आपका ये पोस्ट पढ़ कर मैं काफी निराश हूं. इस तरह के पलायनवादी अतिवाद की वजह से ही मेरे नाना को बेला से भागना पड़ा था''
बेला के सरपंच के परिवार के सदस्यों ने इस पोस्ट पर माफ़ी मांगी और कहा कि उनका मकसद किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं था. स्पर्श कहते हैं, '' कभी-कभी मामला जटिल हो जाता है .''
स्पर्श के मुताबिक उनके परिवार के कुछ लोगों का रुझान बीजेपी की ओर है. लेकिन दोनों परिवारों के बीच बातचीत होती रहती है.
इस अनुभव ने स्पर्श और उनके यूनिवर्सिटी के दोस्तों को एक कदम आगे बढ़कर काम करने के लिए प्रेरित किया. इन लोगों प्रोजेक्ट दास्तान की शुरुआत की. इसके तहत भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश और इन देशों से जुड़े परिवारों को वर्चुअल रियल्टी टेक्नोलॉजी के सहारे उन जगहों की सैर कराई जाती है, जो इतिहास में खो चुके हैं.
हाल ही में स्पर्श ने इशर के सिर पर हेडसेट लगा कर उन्हें बेला का वर्चुअल टुअर कराया. उन्हें उनके पुश्तैनी घर के सामने की मस्जिद दिखाई. वह घर दिखाया जो उस ज़मीन पर कभी खड़ा था और गूंजती पहाड़ी भी दिखाई.
अब 82 साल की उम्र में इशर भी पाकिस्तान के बेला का दौरा करना चाहते हैं. लेकिन भारतीय पासपोर्ट धारक होने की वजह से उनके लिए पाकिस्तान का वीज़ा मिलना मुश्किल है.
स्पर्श ने बेला से लाए गए पत्थरो कों अपने नाना को दिया है. इस पत्थर को वो अपने बिस्तर से लगी टेबल पर रखते हैं. दो पत्थरों से नेकलेस बना लिए गए हैं. दोनों इसे पहनते हैं.
स्पर्श ये नेकलेस अपने आने वाली पीढ़ियों को देना चाहते हैं ताकि उनके पास भी पुरखों के गांव का कुछ हिस्सा बना रहे.
स्पर्श कहते हैं, '' दक्षिण एशियाई के तौर मैं अपनी मिट्टी से खुद को अलग नहीं कर सकता. वे पत्थर मेरे पुरखे हैं. अतीत का वो टुकड़ा जिसे मैं अपने पास रख सकता हूं. ''
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