Parliamentary Committee Meeting: क्यों मेधा पाटकर को देखते ही भड़के NDA सांसद? किसने कहा इन्हें 'देशद्रोही'?
Parliamentary Committee Meeting Cancelled: मंगलवार को संसद की स्थायी समिति की एक अहम बैठक बिना किसी चर्चा के रद्द हो गई। यह बैठक ग्रामीण विकास और पंचायती राज पर बनी संसदीय समिति द्वारा बुलाई गई थी, जिसमें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 की समीक्षा की जानी थी। इस कानून के तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि जिन लोगों की जमीन अधिग्रहण की जाती है, उन्हें उचित मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन की सुविधाएं दी जाएं।
बैठक में भूमि संसाधन विभाग (ग्रामीण विकास मंत्रालय), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जनजातीय कार्य मंत्रालय, विभिन्न एनजीओ, विशेषज्ञ और अन्य हितधारकों को बुलाया गया था। इन्हीं के साथ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर (Medha Patkar) और अभिनेता से कार्यकर्ता बने प्रकाश राज (Prakash Raj) को भी आमंत्रित किया गया था, ताकि वे कानून पर अपने अनुभव और सुझाव साझा कर सकें।

बैठक शुरू होने से पहले मचा हंगामा
जैसे ही बैठक शुरू होने वाली थी, एनडीए के कई सांसदों ने पाटकर और राज की मौजूदगी पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि उन्हें इन दोनों की उपस्थिति की पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। एक सूत्र के अनुसार, 11 सांसद,(ज्यादातर एनडीए से) ने इस मुद्दे पर बैठक का बहिष्कार किया, जिससे कोरम पूरा न हो सका और बैठक रद्द करनी पड़ी।
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एनडीए सांसदों को मेधा पाटेकर पर आपत्ति
सूत्रों का कहना है कि कुछ एनडीए सांसदों को खासतौर पर मेधा पाटकर की मौजूदगी पर आपत्ति थी। उनका मानना था कि पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के जरिए गुजरात की विकास योजनाओं को बाधित किया था। उनका तर्क था कि अगर नर्मदा परियोजना समय पर पूरी होती, तो गुजरात का एक बड़ा हिस्सा सूखे और जल संकट से बचाया जा सकता था।
बीजेपी सांसद बोले- पारदर्शिता नहीं थी
बिहार से बीजेपी सांसद संजय जायसवाल ने कहा, "हमें बताया गया था कि इस बैठक में मंत्रालयों और कुछ एनजीओ के प्रतिनिधि भाग लेंगे। लेकिन मेधा पाटकर और प्रकाश राज को क्यों बुलाया गया, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई। हम पारदर्शिता की उम्मीद करते हैं, और जब वो नहीं दिखी तो हमने बैठक से वॉकआउट कर दिया।"
संसदीय समिति प्रमुख का जवाब
समिति के अध्यक्ष और कांग्रेस सांसद साप्तगिरी शंकर उल्का ने एनडीए सांसदों के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पाटकर और राज को सिर्फ कानून पर उनके विचार जानने के लिए बुलाया गया था। उल्का ने कहा, "यह सामान्य प्रक्रिया है कि सिविल सोसाइटी के लोगों से कानून की समीक्षा के दौरान सुझाव लिए जाते हैं। उन्होंने मंत्रालय की बात नहीं सुनी होती, सिर्फ अपने विचार साझा करते।"
उन्होंने यह भी बताया कि समिति में शामिल सभी सदस्यों को बैठक की जानकारी पहले ही दे दी गई थी और मेहमानों की सूची स्पीकर कार्यालय को नियमानुसार भेजी गई थी। उन्होंने सवाल उठाया, "एनडीए सांसद आखिर डर किस बात से रहे थे? हम सब मिलकर सुझाव सुनते और रिपोर्ट भी आपसी सहमति से तैयार की जाती।"
पूर्व प्रधानमंत्री भी थे बैठक में मौजूद
इस स्थायी समिति में कुल 29 सदस्य हैं, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा भी शामिल हैं। देवगौड़ा इस बैठक में मौजूद थे, लेकिन बैठक शुरू होने से पहले ही वॉकआउट और कोरम की कमी के कारण पूरी प्रक्रिया रुक गई।
अब 14 जुलाई को होगी बैठक
बैठक में हुए गतिरोध के बाद इसे स्थगित कर दिया गया है। अब यह बैठक 14 जुलाई को दोबारा बुलाई जाएगी। उम्मीद है कि इस बार सभी पक्षों की सहमति से बैठक आयोजित होगी और भूमि अधिग्रहण कानून पर गंभीर चर्चा संभव हो सकेगी।
2013 का कानून क्यों है अहम
भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति की भूमि अधिग्रहण के समय उसे उचित मुआवज़ा मिले और उसकी आजीविका और पुनर्वास की व्यवस्था भी हो। इस कानून में पारदर्शिता, सहमति और सामाजिक प्रभाव आंकलन जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है।
विवाद के बीच बड़ा सवाल
इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या संसद की समितियों में विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी पर राजनीतिक सहमति जरूरी है? या फिर ऐसे मुद्दों पर राजनीति हावी हो जाएगी, जिससे जनहित से जुड़े कानूनों की समीक्षा प्रभावित होगी? यह देखना दिलचस्प होगा कि 14 जुलाई को जब बैठक दोबारा होगी, तब क्या सभी पक्ष सार्थक चर्चा के लिए तैयार होंगे या फिर एक और गतिरोध का सामना करना पड़ेगा।
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