लोकसभा सीटें 850 करने का प्लान: परिसीमन क्या है? North vs South विवाद भड़का, विपक्ष क्यों है खिलाफ—Explain
What is Delimitation Exercise: भारत की राजनीति एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। केंद्र सरकार लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने की तैयारी में है और इसके लिए परिसीमन यानी Delimitation की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। सरकार इसे जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण लागू करने का जरूरी कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश मान रहा है।
आखिर 'परिसीमन' की इस गुत्थी में ऐसा क्या है कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच तलवारें खिंच गई हैं। कांग्रेस और पूरा 'INDIA' गठबंधन इसके खिलाफ क्यों है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि परिसीमन क्या है, North vs South विवाद क्यों बढ़ा और कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष इसके खिलाफ क्यों खड़ा हो गया है।

परिसीमन क्या है और क्यों जरूरी है? (What is Delimitation and Why Matters)
परिसीमन का मतलब होता है चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय करना और जरूरत पड़ने पर नई सीटें बनाना। यानी देश की बढ़ती आबादी के हिसाब से यह तय करना कि किस राज्य से कितने सांसद चुने जाएंगे और उनकी सीटों की सीमाएं क्या होंगी। आसान भाषा में कहें तो 'परिसीमन' का मतलब है निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना। जैसे-जैसे आबादी बढ़ती है, यह जरूरी हो जाता है कि हर सांसद के पास मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर हो।
भारत में अब तक पांच बार परिसीमन हो चुका है-1952, 1963, 1973, और 2002। लेकिन 2002 में सिर्फ सीमाएं बदली गई थीं, सीटों की संख्या 543 ही रखी गई थी। यह प्रक्रिया इसलिए जरूरी होती है ताकि हर सांसद लगभग बराबर संख्या के लोगों का प्रतिनिधित्व कर सके। अभी स्थिति यह है कि कुछ सीटों पर 20-30 लाख मतदाता हैं, जबकि कुछ छोटे केंद्र शासित प्रदेशों में यह संख्या लाख से भी कम है।
पेंच यहां फंसा है कि अभी तक हम 1971 की जनगणना के आधार पर सीटें तय कर रहे थे। अब सरकार 2011 की जनगणना को आधार बनाकर सीटों का बंटवारा करना चाहती है। चूंकि पिछले 50 सालों में उत्तर भारत की आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है और दक्षिण भारत ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन काम किया है, इसलिए नई व्यवस्था में उत्तर भारत को 'इनाम' और दक्षिण भारत को 'सजा' मिलती दिख रही है।
सरकार का नया प्लान क्या है?
केंद्र सरकार अब एक बड़ा बदलाव करने जा रही है। प्रस्ताव है कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 कर दी जाएं। इनमें 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी।
इसके साथ ही एक-तिहाई यानी करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है। यह आरक्षण 15 साल तक लागू रहेगा और हर चुनाव में सीटें रोटेशन के आधार पर बदलती रहेंगी।
सरकार 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद के विशेष सत्र में तीन अहम बिल ला रही है:
🔹संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: इसके जरिए लोकसभा की कुल सीटों को 850 किया जाएगा। इसमें राज्यों के पास 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के पास 35 सीटें होंगी।
🔹परिसीमन (संशोधन) विधेयक, 2026: यह नई जनगणना (2011) के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण और 'परिसीमन आयोग' के गठन का रास्ता साफ करेगा।
🔹केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026: यह दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर जैसे इलाकों में नए नियमों को लागू करने के लिए लाया जा रहा है।
इनके जरिए नए परिसीमन आयोग का गठन होगा, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या पूर्व जज करेंगे। आयोग का फैसला अंतिम होगा और इसे कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।
उत्तर बनाम दक्षिण विवाद क्यों भड़का (North vs South Debate Explained)
उत्तर भारत के राज्यों-जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश-में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। अगर नई गणना के आधार पर सीटें बढ़ेंगी, तो इन राज्यों को सबसे ज्यादा फायदा होगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक:
🔹उत्तर प्रदेश: यहां सबसे बड़ा धमाका होगा। सीटें 80 से बढ़कर 140 हो सकती हैं। यानी अकेले यूपी के पास इतनी ताकत होगी कि वह दिल्ली की सरकार तय कर सके।
🔹बिहार: यहां सीटें 40 से बढ़कर 73 होने का अनुमान है।
🔹महाराष्ट्र: 48 से बढ़कर 72 सीटें।
🔹राजस्थान और मध्य प्रदेश: राजस्थान की सीटें 25 से 48 और एमपी की 29 से 51 हो सकती हैं।
🔹दूसरी तरफ, तमिलनाडु (39 से 51) और केरल (20 से 23) जैसे राज्यों में बढ़ोत्तरी तो होगी, लेकिन कुल सदन के अनुपात में उनकी ताकत कम हो जाएगी।
वहीं दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश जहां जनसंख्या वृद्धि कम रही है, वहां सीटों में बढ़ोतरी कम होगी या उनकी हिस्सेदारी घट सकती है। यही वजह है कि दक्षिण के राज्य कह रहे हैं कि उन्हें "सजा" मिल रही है, जबकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया।
यह विवाद सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि 'वर्चस्व' का है। दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक) का तर्क है कि उन्होंने दशकों तक केंद्र के जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को ईमानदारी से लागू किया। इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी आबादी कम बढ़ी। अब अगर केवल आबादी को आधार बनाया गया, तो संसद में उनकी आवाज कम हो जाएगी।
वहीं उत्तर भारतीय राज्य (जैसे यूपी, बिहार, राजस्थान और एमपी), जहां आबादी का विस्फोट हुआ है, उन्हें भारी संख्या में नई सीटें मिलेंगी। दक्षिण का कहना है कि वे देश की जीडीपी में 30% से ज्यादा का योगदान देते हैं, लेकिन राजनीति में उनका कद घटाया जा रहा है। सरकार के नए प्रस्ताव के मुताबिक उत्तर भारत (UP, बिहार) इनकी हिस्सेदारी लोकसभा में 22.1% से बढ़कर 25.1% हो जाएगी। दक्षिण भारत, इनकी हिस्सेदारी 20.1% से घटकर 18% रह जाएगी।
कांग्रेस और विपक्ष क्यों है इस बिल के खिलाफ?
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के घर हुई विपक्षी नेताओं की बैठक में यह साफ हो गया कि पूरा 'INDIA' गठबंधन इस बिल के खिलाफ वोट करेगा। विपक्ष के विरोध के पीछे तीन मुख्य वजह हैं:
विपक्ष को दबाने की रणनीति: विपक्ष का मानना है कि जिन राज्यों में बीजेपी मजबूत है (जैसे यूपी, एमपी, राजस्थान), वहां सीटें ज्यादा बढ़ रही हैं। वहीं जहां विपक्ष की सरकारें हैं (जैसे तमिलनाडु, बंगाल, केरल), वहां सीटों की हिस्सेदारी घट रही है।
महिला आरक्षण का 'छलावा': सरकार का कहना है कि सीटों की संख्या 850 इसलिए की जा रही है ताकि महिलाओं को 33% आरक्षण (273 सीटें) दिया जा सके। विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण तो वर्तमान 543 सीटों पर भी लागू किया जा सकता है, इसके लिए सीटों को 850 करना और परिसीमन का ड्रामा करना सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए है।
राज्यों के अधिकारों का हनन: विपक्ष इसे संघीय ढांचे पर हमला मान रहा है, जहां ज्यादा आबादी वाले राज्यों को अधिक राजनीतिक शक्ति देकर छोटे या जागरूक राज्यों को हाशिए पर धकेला जा रहा है।
क्या संसद में बिल पास करा पाएगी सरकार? (Will the Government be able to Pass the Bill?)
यह सरकार के लिए असली अग्निपरीक्षा है। संविधान संशोधन के लिए 'विशेष बहुमत' की जरूरत होती है। यानी सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई वोट। वर्तमान में लोकसभा में 540 सांसद हैं। बिल पास कराने के लिए कम से कम 360 सांसदों के समर्थन की जरूरत है। एनडीए (NDA) के पास फिलहाल 292 सांसद हैं, जो जादुई आंकड़े से काफी दूर है। विपक्ष (INDIA) के पास 233 सांसद हैं। ऐसे में सरकार को बीजेडी या वाईएसआरसीपी जैसे 'तटस्थ' दलों और विपक्षी खेमे में सेंधमारी पर निर्भर रहना होगा।
क्या यह लोकतंत्र के लिए सही है?
परिसीमन एक संवैधानिक जरूरत है, लेकिन जब यह 'उत्तर बनाम दक्षिण' की लड़ाई बन जाए, तो यह देश की अखंडता के लिए चिंता का विषय है। क्या सिर्फ आबादी ही प्रतिनिधित्व का एकमात्र पैमाना होनी चाहिए? क्या उन राज्यों को सजा मिलनी चाहिए जिन्होंने देश के विकास और जनसंख्या नियंत्रण में योगदान दिया? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब सरकार को संसद के पटल पर देना होगा। फिलहाल, बिहार से लेकर दक्षिण तक की जनता की नजरें 16 अप्रैल पर टिकी हैं, जब भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की नई इबारत लिखी जाएगी।















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