भाजपा की तीसरी सीट का दांव: इतिहास रचेगा या मोहन यादव सरकार के लिए संकट बनेगा?
मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। सबसे बड़ी चर्चा भाजपा की उस संभावित रणनीति को लेकर है जिसके तहत पार्टी तीसरी सीट पर भी अपना उम्मीदवार उतारने पर विचार कर रही है। पहली नजर में यह केवल एक संसदीय चुनाव दिखाई देता है, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चुनाव का प्रभाव सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक प्रतिष्ठा और प्रदेश भाजपा के भविष्य के शक्ति संतुलन पर पड़ सकता है।
सूत्रों के अनुसार भाजपा तीसरी सीट पर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसी प्रत्याशी को मैदान में उतारने पर विचार कर रही है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम भी छिपा हुआ है। यदि ऐसा प्रत्याशी चुनाव हार जाता है तो इसका संदेश सीधे एससी-एसटी समाज में जाएगा कि भाजपा उन्हें जिताने की स्थिति में होने के बावजूद केवल प्रतीकात्मक उम्मीदवार बना रही है। इससे इन वर्गों में अनावश्यक नाराजगी पैदा हो सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा वास्तव में एससी-एसटी वर्ग को मजबूत राजनीतिक संदेश देना चाहती है तो उसे अपने पहले या दूसरे सुरक्षित उम्मीदवार के रूप में ऐसे वर्ग के प्रतिनिधि को भेजना चाहिए। तीसरी सीट पर उन्हें उतारना और हार का जोखिम उठाना राजनीतिक दृष्टि से उचित रणनीति नहीं माना जा सकता।
इतिहास भी भाजपा को सावधानी बरतने का संकेत देता है। वर्ष 2016 में भी भाजपा ने तीसरी सीट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। उस समय परिस्थितियां वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक अनुकूल थीं। विधानसभा में भाजपा के पास लगभग 165 विधायक थे जबकि कांग्रेस के पास केवल 58 सदस्य थे। इसके अलावा बसपा और निर्दलीय सदस्यों का भी समर्थन मिलने की उम्मीद थी। इसके बावजूद भाजपा उम्मीदवार विनोद गोटिया मात्र 50 वोट प्राप्त कर सके और कांग्रेस के विवेक तन्खा 62 वोटों के साथ विजयी हुए।
विशेष बात यह है कि उस समय प्रदेश भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार अरविंद मेनन माने जाते थे। संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक प्रबंधन के लिए प्रसिद्ध मेनन भी तमाम प्रयासों के बावजूद तीसरी सीट भाजपा की झोली में नहीं डाल पाए थे। यही कारण है कि राजनीतिक पर्यवेक्षक आज की परिस्थितियों को और अधिक चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं।
वर्तमान स्थिति में भाजपा के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का नेतृत्व है जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में उल्लेखनीय सफलता दिलाई। दूसरी ओर पार्टी के भीतर ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं है जो स्वयं को भविष्य के मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ असंतुष्ट तत्व किसी भी राजनीतिक असफलता का ठीकरा मुख्यमंत्री और प्रदेश नेतृत्व पर फोड़ने का अवसर तलाश रहे हैं।
ऐसे माहौल में यदि तीसरी सीट पर भाजपा का उम्मीदवार हारता है तो विपक्ष से अधिक हमला पार्टी के अंदर से होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। मुख्यमंत्री के अब तक के सफल राजनीतिक रिकॉर्ड पर प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयास भी हो सकता है।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भाजपा के पास एक वैकल्पिक रणनीति भी मौजूद है। यदि पार्टी तीसरी सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी या पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा जैसे व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता वाले चेहरे को मैदान में उतारती है तो जीत की संभावना बढ़ सकती है। दोनों नेताओं के पास व्यक्तिगत संपर्क, राजनीतिक अनुभव और विभिन्न दलों के विधायकों के बीच संवाद की क्षमता है।
यदि भाजपा तीसरी सीट जीतने में सफल होती है तो यह केवल एक चुनावी जीत नहीं होगी। यह स्वतंत्रता के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक घटना होगी, जब कांग्रेस राज्यसभा की एक भी सीट जीतने में असफल रह जाएगी। ऐसी सफलता का राजनीतिक श्रेय स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश नेतृत्व को मिलेगा, जिससे उनका राजनीतिक कद और मजबूत होगा।
लेकिन राजनीति में सफलता और विफलता के बीच की दूरी बहुत कम होती है। यदि प्रत्याशी चयन में रणनीतिक चूक हुई और तीसरी सीट हाथ से निकल गई तो विपक्ष इसे भाजपा की राजनीतिक हार के रूप में प्रचारित करेगा, जबकि पार्टी के भीतर मौजूद असंतुष्ट गुट भी इसे नेतृत्व की विफलता साबित करने का प्रयास करेंगे।
इसलिए यह चुनाव केवल राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट का नहीं, बल्कि भाजपा की राजनीतिक रणनीति, संगठनात्मक एकता और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व की अग्निपरीक्षा भी साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में पार्टी का प्रत्याशी चयन ही तय करेगा कि यह दांव इतिहास रचेगा या फिर अनावश्यक राजनीतिक संकट को जन्म देगा।












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