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'हिंदू-मुस्लिम अलग हो जाओ', Pahalgam Terror Attack में जान गंवाने वाले शैलेश कलथिया के बेटे ने बताई आपबीती

Pahalgam Terror Attack: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल की दोपहर ऐसा आतंकी हमला हुआ, जिसने पूरे देश को सन्न कर दिया। बैसरन इलाके में आतंकवादियों ने धर्म पूछकर लोगों को गोली मारी, जिसमें 25 भारतीयों और एक नेपाली नागरिक सहित कुल 26 लोगों की जान चली गई। आतंकियों की गोली का शिकार बनने वालों में से एक सूरत (गुजरात) के शैलेश कलथिया भी थे, जो कि अपने परिवार के साथ वहां घूमने गए थे।

गुजरात से सैकड़ों किलोमीटर दूर जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत वादियों में अपने परिवार के साथ खुशियों के पल बीताने गए शैलेश का हमले के एक दिन बाद यानी 23 अप्रैल को जन्मदिन था, लेकिन उससे पहले ही वो दहशतगर्दों का बलि चढ़ गए। अब शैलेश के बेटे ने मीडिया से बात करते हुए जो बताया, वो भी रूह कंपाने वाला है।

Pahalgam terror attack

'हिंदू और मुस्लिम अलग हो जाओ', मासूम ने क्या-क्या बताया?

सूरत शहर के वराछा इलाके के मूल निवासी शैलेश कलथिया के बेटे नक्श कलथिया ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया कि, "हम पहलगाम, जम्मू-कश्मीर में 'मिनी स्विटजरलैंड' पॉइंट पर थे। हमने गोलियों की आवाज सुनी, जब हमें लगा कि आतंकवादी इलाके में घुस आए हैं तो हम छिप गए। लेकिन, उन्होंने हमें ढूंढ लिया। हमने दो आतंकवादियों को देखा। मैंने सुना कि उनमें से एक ने सभी लोगों को मुसलमान और हिंदू में अलग-अलग रहने का आदेश दिया और फिर सभी हिंदू लोगों को गोली मार दी।"

'तीन बार 'कलमा' पढ़ने को कहा और फिर...'

मासूम नक्श कलथिया ने आगे कहा कि, "आतंकवादियों ने लोगों से तीन बार 'कलमा' पढ़ने को कहा, जो लोग इसे नहीं पढ़ पाए, उन्हें गोली मार दी गई। जब आतंकवादी चले गए, तो स्थानीय लोग आए और कहा कि जो लोग बच गए हैं, उन्हें तुरंत नीचे उतर जाना चाहिए। हम पॉइंट से नीचे उतरने के एक घंटे बाद सेना आई। आतंकवादी उन्हें (मेरे पिता को) बिल्कुल भी बोलने नहीं दे रहे थे। उन्होंने (मेरी मां से) कुछ नहीं कहा। आतंकवादियों में से एक गोरा था और उसकी दाढ़ी थी। उसने अपने सिर पर कैमरा बांधा हुआ था। उन्होंने महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया।"

'अचानक एक आतंकवादी हमारे सामने खड़ा था'

वहीं शैलेश कलथिया की पत्नी शीतल कलथिया ने बताया कि गोलियों की आवाज सुनते ही हम छिपने के लिए भागे, लेकिन पूरा इलाका सीमा से घिरा हुआ था, इसलिए छिपने की कोई जगह नहीं थी। अचानक एक आतंकवादी हमारे सामने खड़ा था। उसने हिंदुओं को एक तरफ और मुसलमानों को दूसरी तरफ जाने के लिए कहा, जब आतंकवादी ने हर व्यक्ति को 'कलमा' कहा, तो मुसलमानों ने 'मुस्लिम' कहकर जवाब दिया। फिर उसने हिंदू पुरुषों को अलग किया और उन सभी को गोली मार दी। उसके पास एक लंबी बंदूक थी, जिसके ऊपर एक कैमरा लगा हुआ था।

'मेरे पति का सिर मेरी गोद में था और मैं....'

शीतल ने आगे कहा कि वह (आतंकी) वहीं खड़ा रहा और उसने जिन लोगों को गोली मारी थी, उनके मरने का इंतजार करता रहा। उसने हमारे सामने 6-7 लोगों को गोली मारी। उसने उन्हें इतनी नजदीक से गोली मारी कि वे लोग गोली लगने के बाद 2-3 मिनट से ज्यादा जिंदा नहीं बचे। मेरे पति का सिर मेरी गोद में था और मैं कुछ नहीं कर सकती थी। मुझे आश्चर्य है कि वहां (बैसरन घास का मैदान) बहुत सारे पर्यटकों के बावजूद, एक भी सेना या पुलिस अधिकारी उस इलाके में मौजूद नहीं था।

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