Delhi ordinance: विपक्षी एकता से भी नहीं बनेगी बात, इस तरह से राज्यसभा में भी बीजेपी सरकार की जीत तय
Opposition meeting in bangalore: दिल्ली पर केंद्र सरकार ओर से लाए गए अध्यादेश का कांग्रेस की ओर से विरोध के ऐलान के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के विपक्षी दलों की दूसरी बैठक में शामिल होने का रास्ता साफ हुआ है। लेकिन, इससे संसद से अध्यादेश को मंजूरी दिलाने में कोई रुकावट पैदा होगी, इसकी संभावना नहीं है।
दिल्ली अध्यादेश पर संसद की मुहर के लिए उसे दोनों सदनों से पास करवाना जरूरी है। लेकिन, राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है। इसलिए दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को इस मसले पर कांग्रेस का समर्थन मिलना महत्वपूर्ण है। लेकिन,तथ्य ये है कि संख्या गणित के हिसाब से सरकार के लिए इसे राज्यसभा से भी पास करवाने में मुश्किल नहीं होगी।

दिल्ली अध्यादेश को संसद की दोनों सदनों से पास कराना जरूरी
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने जब सेवाओं पर दिल्ली सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण के पक्ष में फैसला सुनाया, तो केंद्र सरकार मई में अध्यादेश लेकर आई और इस मसले पर उपराज्यपाल को अंतिम शक्ति सौंप दी। इसी अध्यादेश को कानून का शक्ल देने के लिए संसद से मंजूर करवाना है। संभावना है कि यह अध्यादेश विधेयक के रूप में संसद के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।
संसद की दोनों सदनों में संख्या बल सरकार के पक्ष में
लोकसभा में तो बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार पूर्ण बहुमत में है। सवाल राज्यसभा से इसे पास करवाने को लेकर उठ रहा है, जहां सरकार के पास बहुमत नहीं है। यही वजह है कि दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल विपक्षी दलों की बैठक में शामिल होने से पहले कांग्रेस से केंद्र सरकार के विधेयक का विरोध करने की गारंटी मांग रहे थे। लेकिन, अगर राज्यसभा में सत्तापक्ष, विपक्ष और अन्य दलों के सांसदों का समीकरण देखें, तो मोदी सरकार के लिए इसे पास करवाने में वहां भी कोई मुश्किल नहीं होगी।
अध्यादेश के विरोध में संभावित 105 सांसद
राज्यसभा में सांसदों की मौजूदा संख्या 237 है। ऐसे में विधेयक को पास कराने के लिए कम से कम 119 सांसदों के वोट की आवश्यकता होगी। बीजेपी के पास राज्यसभा में अपने 92 सांसद हैं। जबकि, एनडीए के कुल सांसदों की संख्या 104 है। वहीं कांग्रेस,आम आदमी पार्टी और भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) समेत विपक्षी दलों की कुल सदस्य संख्या 105 होती है। इनमें बीआरएस को छोड़कर सारे दल बेंगलुरू में होने वाली बैठक में शामिल हो रहे हैं। इन सभी दलों ने दिल्ली अध्यादेश के विरोध का फैसला किया है।
सत्तापक्ष के सांसदों की संख्या- 111
एनडीए के पास राज्यसभा में भले ही 104 सदस्य हों, सत्ताधारी दल को 5 नामांकित और दो निर्दलीय सांसदों का भी समर्थन मिलना तय है। इस तरह से सत्तापक्ष की प्रभावी सदस्य संख्या 111 हो जाती है। ऐसे में दो पार्टियों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है। ओडिशा में सत्ताधारी बीजेडी और आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी वाईएसआर कांग्रेस। दोनों दलों के पास 9-9 सांसद हैं। ये दोनों ही पार्टियां कई महत्वपूर्ण मौकों पर सरकार को समर्थन दे चुकी हैं और यह विपक्षी दलों के साथ नहीं हैं।
इस तरह से राज्यसभा में बीजेपी सरकार की जीत तय
अगर ये दोनों दल सरकार के पक्ष में मतदान नहीं करके भी दिल्ली अध्यादेश वाले विधेयक पर वोटिंग से अनुपस्थित रह जाते हैं तो इसे पास कराने के लिए जरूरी आंकड़ा घटकर 110 ही रह जाएगा। जबकि, सरकार के पास अपने ही 111 सदस्य हैं। यही नहीं एक-एक सांसद जेडीएस, टीडीपी और बीएसपी के पास भी हैं। ये पार्टियां भी पहले कई मौकों पर सरकार के पक्ष में जा चुकी हैं। जबकि, टीडीपी और जनता दल (सेक्युलर) के एनडीए में आने की चर्चा भी चल रही है।
यानी दिल्ली पर केंद्र सरकार के अध्यादेश को संसद से मंजूरी मिलना तय है, जबतक कि आंध्र प्रदेश के सीएम जगन मोहन रेड्डी और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक इसे गिराने की न ठान लें। लेकिन, फिलहाल ऐसी कोई संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है।












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