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नज़रिया: राहुल गांधी भरोसा दिलाकर ग़ायब क्यों हो जाते हैं?

By Bbc Hindi
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    नज़रिया: राहुल गांधी भरोसा दिलाकर ग़ायब क्यों हो जाते हैं?

    लगभग हर साल, साल में एक बार, राहुल गांधी का कद ऊंचा उठता है, लेकिन फिर उतनी ही तेज़ी से वो सुस्त पड़ जाते हैं.

    अमरीकी दौरे से लेकर गुजरात चुनाव तक, राहुल गांधी नए अवतार में दिख रहे थे, लेकिन फिर उनका असर कम होता दिख रहा है.

    वो सब कुछ ठीक कहते और करते हैं, लेकिन रोज़मर्रा की ख़बरों में ख़ुद या पार्टी के लिए सकारात्मक सुर्खियां बटोरने में वो फिर नाकाम हो रहे हैं. इससे लग रहा है कि राहुल 'ग़ायब' हो गए हैं. ग़ायब वो लोगों के जेहन से हो रहे हैं.

    अध्यक्ष बनने के बाद राहुल बहरीन के दौरे पर गए, लेकिन अमरीका की तरह उनका यह दौरा सुर्खियां नहीं बटोर सका.

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    बहरीन में राहुल

    क्या आपको याद है कि राहुल ने बहरीन में क्या कहा? मुझे भी कुछ याद नहीं.

    कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी समय-समय पर अप्रवासी भारतीयों को संबोधित करने की योजना बना रहे हैं.

    ठीक उसी तरह जैसे प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने किया. लेकिन मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश यात्रा नहीं कर रहे थे. अप्रवासी भारतीय वोट जो नहीं देते हैं.

    जब राहुल अपने लोकसभा क्षेत्र अमेठी गए तो इसने सकारात्मक की जगह अधिक नकारात्मक ख़बरें पाईं. ट्विटर पर गेम खेलें अच्छा है लेकिन बीजेपी व्हॉट्सऐप पर अपना गेम खेल रही है.

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    क़ानूनी मुद्दा

    पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान अगस्ता वेस्ट लैंड डिफेंस डील, 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन और महाराष्ट्र के आदर्श हाउसिंग घोटाले जैसे कुछ क़ानूनी फ़ैसले कांग्रेस के हक़ में आए.

    एक ओर जहां बीजेपी आज भी कांग्रेस को भ्रष्ट क़रार देती नहीं थकती. इन अदालती फ़ैसले के मद्देनज़र राहुल गांधी के पास ये मौक़ा था कि वे ख़ुद को और अपनी पार्टी को पीड़ित बताते.

    वे ऐसा करने में नाकाम रहे. एक क़ानूनी मुद्दा जिसमें वे कूद पड़े थे, उससे उन्हें बचना चाहिए था.

    चीफ़ जस्टिस के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों की प्रेस कॉन्फ़्रेंस को राजनीतिक रंग देते हुए राहुल गांधी को मीडिया से बात करने की कोई ज़रूरत नहीं थी.

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    राजनीति का एजेंडा

    राहुल गांधी जो कुछ भी कहते हैं, अगर वो आप सुनें तो पाएंगे कि वे सभी बात सही-सही ही कहते हैं. वे किसानों और जवानों की बात करते हैं.

    वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से डोकलाम और नौकरियों के मुद्दे पर तमाम मुश्किल सवाल पूछते हैं.

    वे छोटे लघु उद्योगों और दूसरे तरीक़ों से नौकरियों के अवसर तैयार करने पर अपना नज़रिया रखते हैं. लेकिन वे फिर भी राजनीति का एजेंडा सेट करने में नाकाम रहे हैं.

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    बात इस पर कहीं फंस रही हो, शायद वे ख़ुद से ही सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं, वे कभी बहरीन में तो कभी बहरीन से अमेठी में अवतरित हो जाते हैं.

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    पार्टी संगठन

    राहुल गांधी ने छह महीने के भीतर एक नई कांग्रेस पार्टी का वादा किया है. तब तक अगले लोकसभा चुनाव के लिए साल भर से भी कम समय रह जाएगा.

    और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चुनावी अभियान के बीच में कहीं सक्रिय होंगे. कांग्रेस पार्टी और संगठन में बदलाव लाने के साथ-साथ राहुल गांधी के ऊपर कर्नाटक विधानसभा चुनाव में अपने कुनबे के नेतृत्व का भी ज़िम्मा होगा.

    इस बीच उन्हें देश के सियासी फलक पर भी सत्तारूढ़ बीजेपी के ख़िलाफ़ माहौल खड़ा करना है. ये वो तीन चीज़ें हैं जिन पर राहुल गांधी को बहुत काम करना है.

    उन्हें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो उनका थोड़ा काम हल्का कर सकें और क़ायदे से राहुल गांधी को इन कामों में केवल एक ही चुनौती पर ध्यान देना चाहिए.

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    2019 का चुनाव

    यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी में भी दो लोग हैं जो चीज़ें मैनेज कर रहे हैं, वो हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह.

    राज्य विधानसभा चुनावों पर ध्यान देना और साल 2019 के लिए पूरे देश में अपने पक्ष में माहौल तैयार करना एक जैसी बात नहीं है.

    केंद्र में विपक्ष की भूमिका निभाना, सत्तारूढ़ पार्टी की कमज़ोरियों का अपने हक़ में फ़ायदा उठाना एक फ़ुल टाइम काम है.

    और इस वक़्त को राज्य विधानसभा चुनाव लड़ने और पार्टी संगठन का कामकाज संभालने में खर्च नहीं किया जा सकता है.

    अगर कांग्रेस एक या दो राज्य विधानसभा का चुनावों जीत भी लेती है तो इसका मतलब ये नहीं निकाला जा सकता कि इससे 2019 के चुनाव में उन्हें मदद मिल जाएगी.

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    कर्नाटक का इम्तेहान

    क्योंकि राज्य विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में वोटिंग को लेकर लोगों का रवैया अलग-अलग होता है.

    जैसे गुजरात विधानसभा चुनावों में पटेलों की नाराज़गी का मुद्दा बना था, लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि लोकसभा चुनावों में ऐसा ही हो.

    ठीक इसी तरह कर्नाटक में पूरी ऊर्जा झोंकना भी कांग्रेस के लिए ख़तरनाक़ हो सकता है.

    अगर कर्नाटक में कांग्रेस हारी तो ये न केवल सिद्धारमैया की हार होगी बल्कि राहुल गांधी को भी लूज़र कहा जाएगा.

    साल 2018 में राहुल गांधी के पास अब कोई सफ़ाई नहीं बची है. वे कांग्रेस पार्टी के निर्विरोध अध्यक्ष बन गए हैं और अब उन पर पार्टी की पुरानी पीढ़ी का कोई दबाव नहीं है.

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    मोदी विरोध

    इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेरोज़गारी और गांवों की ख़राब परिस्थितियों की वजह से सत्ताविरोधी रुझान का सामना कर रहे हैं.

    नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप भी मोदी विरोधी जगह पर काबिज़ होने के लिए संघर्ष नहीं कर रहे हैं.

    अतीत के मुक़ाबले राहुल गांधी के लिए मोदी की बीजेपी के ख़िलाफ़ पूरे देश में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने के लिए इतनी अनुकूल परिस्थिति पहले कभी नहीं रही.

    लेकिन चीज़ें जिस रफ़्तार से चल रही हैं, उससे ऐसा नहीं लगता कि राहुल गांधी साल 2019 के लिए तैयार हैं. शायद वे 2024 के लिए सोच रहे हैं.

    (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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    BBC Hindi
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    English summary
    Opinion Why do Rahul Gandhi lose faith

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