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OMG: अचानक धरती फटी और महिला मौत की लपटों में समा गई

OMG: अचानक धरती फटी और महिला मौत की लपटों में समा गई

धरती का सीना धधक रह है। अचानक धरती फट गयी और शौच के लिए जा रही महिला बीस फीट नीचे गड्ढे में समा गयी। उसे निकालने के लिए मशीनें लायीं गयी। उसकी लाश ही बाहर निकली। प्राकृतिक संसाधनों के गलत दोहन और सुरक्षा की अनदेखी की कीमत अब जान देकर चुकानी पड़ रही है। झारखंड के धनबाद जिले का झरिया इलाका सुलग रही धरती पर आबाद है। धरती के अंदर कोयले में लगी आग रह-रह कर मौत का मंजर दिखा देती है। 18 दिसम्बर की बात है। झरिया के धनसार इलाके में दिहाड़ी मजदूर दिलीप बाउरी की पत्नी कल्याणी अपनी छोटी बेटी के साथ शौच के लिए बाहर निकली थी। वह मैदान की तरफ जा ही रही थी उसके पैरों के नीचे की जमीन अचानक फट गयी और वह धुआं निकलते गड्डे में समाती चली गयी। बेटी ने मां को बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह नाकाम रही। झरिया एक तरह से मौत के आगोश में लपटता शहर बन चुका है। इससे पहले भी ऐसे हादसे हुए हैं।

जब रात में सोते समय धंसने लगा घर

जब रात में सोते समय धंसने लगा घर

इसी साल अप्रैल में जब पूरी दुनिया कोरोना के खौफ से डरही हुई थी उस समय खलारी (रांची) के लोग जमीन के फंटने और धंसने से सहमें हुए थे।14 अप्रैल 2020 की रात। रांची के खलारी प्रखंड के जामुन दोहर बस्ती में लोग रोज की तरह सोने की तैयारी कर रहे थे। रात 8 बजे उन्हें हल्के भूकंप का अनुभव हुआ। कुछ सेकेंड के बाद जब कुछ सामान्य रहा तो लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लोग आराम से अपने घरों में सो रहे थे। रात करीब ढाई बजे प्रदीप तुरी और अरविंद तुरी को धरती डोलने का अनुभव हुआ। उनकी नींद खुली तो देखा कि उनका घर तेजी से जमीन के अंदर धंस रहा है। वे परिवार के साथ घर के बाहर निकल आये। बाहर देखा तो सड़क में भी दरारें पड़ गयीं थीं। वे रात भर घर से बाहर रहे। सुबह हुई तो प्रदीप और अरविंद ने देखा उनका घर करीब पांच फीट अंदर धंस गया है। यह बस्ती वर्षों से बंद पड़ी कोयला खदान के ऊपर बसी थी। झारखंड के कोयला खदान वाले इलाकों में जमीन धंसना, जमीन फटना, जमीन के अंदर से धुआं और आग निकलना, जहरीली गैस का निकलना, आम बात है।

झरिया का कोयला दुनिया में सर्वश्रेष्ठ

झरिया का कोयला दुनिया में सर्वश्रेष्ठ

झरिया भारत का सबसे पुराना कोयला उत्पादन क्षेत्र है। यहां का कोयला दुनिया भर में सर्वश्रेष्ठ है। यहां का कोयला स्टील निर्माण के लिए सबसे बढ़िया माना जाता है। 1890 में पहली बार झरिया में कोयला की खोज हुई थी। 1894 से उत्पादन भी शुरू हो गया। भूवैज्ञानिकों के मुताबिक कोयला निकालने के बाद खाली खदान को बालू से भर दिया जाना चाहिए था। भूधंसान और भूगर्भीय आग से बचने के लिए बालू का भराव जरूरी था। बालू भरने से कोयला ऑक्सीजन के सम्पर्क में नहीं आता। शुरू में ही इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया। कोयला का खनन पहले निजी कंपनियों के जरिये होता था। निजी कंपनी के सेठ पैसा बचाने के लिए खाली खदानों में बालू का भराव नहीं करते थे। इसका नतीजा हुआ कि जमीन के अंदर दबे कोयला भंडार में आग लग गयी जो साल दर साल बढ़ती ही गयी।

1916 में पता लगा था भूगर्भीय आग का

1916 में पता लगा था भूगर्भीय आग का

1916 में पहली बार झरिया के भौंराडीह कोयला खदान में आग लगने का पता चला था। 1972 में तत्कानी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। कोयला खनन पर सरकार का नियंत्रण होने के बाद ये उम्मीद की जा रही थी कि इस भूगर्भीय आग पर काबू पा लिया जाएगा। लेकिन कोयला माफिया, भ्रष्ट सरकारी अफसरों और ठेकेदारों की मिलीभगत ने ऐसा होने नहीं दिया। 1972 में जब राष्ट्रीयकरण हुआ था उस समय झरिया और उसके आसपास 70 जगहों पर धरती के अंदर आग सुलग रही थी। 2008 तक जमीन के अंदर धधक रही आग को बुझाने के लिए करीब 70 परियोजनाएं लागू की गयीं। लेकिन आग पर काबू नहीं पाया जा सका।

क्या आग बुझाना मुमकिन नहीं ?

क्या आग बुझाना मुमकिन नहीं ?

2015 में जर्मनी की एक कंपनी ने मशवरा दिया था कि इस भूगर्भीय आग को बुझाने के लिए सबसे पहले पूरे क्षेत्र को खाली कराना होगा। बीसीसीएल ने इसके पहले ही खतरनाक घोषित हो चुके इलाकों को खाली करने का आदेश दिया था। लेकिन मेहनतकश मजदूरों ने रोजगार छीन जाने के डर से अपनी बस्तियां नहीं छोड़ीं। इनके पुनर्वास के लिए झरिया करीब 15 किवोमीटर दूर बेलगढ़िया में बसाने की योजना बनी। लेकिन वह भी परवान नहीं चढ़ी। कोयला के अवैध खनन ने खतरे को और बढ़ा दिया। इसलिए आये दिन हादसे होते रहते हैं। एक अनुमान के मुताबिक कोयला खदानों में लगी आग को बुझाने पर 2018 तक करीब 2200 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं। करीब दस अरब से अधिक का कोयल जल राख हो चुका है। बीसीसीएल (केन्द्र के अधीन) और झारखंड सरकार ने अगर गंभीरता से कोशिश की होती तो स्थिति कम भयावह हो सकती थी। कोयला मंत्रालय का कहना है जमीन के अंदर कोयले में लगी आग को पूरी तरह बुझाना मुमकिन नहीं। हां, इसे कम जरूर किया जा सकता है। ये आग बुझे या ना बुझे लेकिन सरकार लोगों की जान तो बचा सकती है ! पर यह काम भी नहीं हो पा रहा है।

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