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Northeast Flood: असम-मणिपुर में कुदरत का कहर, पूर्वोत्तर में क्यों हर साल आती है बाढ़ और लैंडस्लाइड? जानें वजह

Northeast Flood News: देश का पूर्वोत्तर भाग है इन दिनों प्रकृति की सबसे भयावह आपदा की मार झेल रहा है। असम, मेघालय, मणिपुर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश में बाढ़, बारिश और लैंडस्लाइड ने भयंकर तबाही मचा रखी है। मीडिया रिपोर्टस की माने तो इस आपदा में बीते चार दिनों में इन राज्यों में अब तक लगभग 48 लोगों की मौत हो चुकी है। पीएम मोदी वहां की हालात का जायजा लिया है और हर संभव मदद के लिए निर्देश दिया है।

पूर्वोत्तर भारत अपनी हरियाली, सुंदर पहाड़ी इलाकों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। हालांकि, ये कोई पहली बार नहीं है की यहां पर भारी बाढ़ और भूस्खलन की ये घटना कोई पहली बार नहीं हुआ है। हर साल प्रकृति यहां की खूबसूरती पर कहर बरपाता है।

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Northeast Flood: हर साल बाढ़ की मार झेल रहा पूर्वोत्तर भारत

हालांकि पूर्वोत्तर के राज्यों में भारी मानसूनी बारिश कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग और बेहद गंभीर है। जलवायु विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन का खौफनाक परिणाम बता रहे हैं। हालांकि इस स्थिति के लिए कई पर्यावरणीय कारण जिम्मेदार हैं। मॉनसून का समय से पहले आगमन, बदलते मौसमीय पैटर्न, कम समय में अधिक बारिश, और नाजुक भूगर्भीय संरचना ने मिलकर इस क्षेत्र को जल-आपदा की ओर धकेल दिया है।

आइए जानते हैं आखिर क्यों हर साल भारत के ये खूबसूरत राज्य खौफनाक बारिश, बाढ़ और लैंडस्लाइड की मार झेल रहा है...

वैसे तो पूर्वोत्तर भारत सदियों से भारी मानसूनी वर्षा के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन पिछले एक दशक में बारिश का पैटर्न बदला है। अब बारिश कम दिनों में, अत्यधिक मात्रा में होती है जिसे 'एक्सट्रीम वेदर इवेंट' कहा जाता है। इस बार....

  • सिलचर में 24 घंटे में 415.8 मिमी बारिश, जो 1893 के 290.3 मिमी रिकॉर्ड को तोड़ती है।
  • चेरापूंजी (सोहरा) में 796 मिमी और मौसिनराम में 774.5 मिमी बारिश केवल कुछ दिनों में दर्ज हुई है।
  • हाफलॉन्ग (असम) में 2023 में दो दिन में 650 मिमी बारिश हुई थी।

ये आंकड़े सिर्फ रिकॉर्ड नहीं तोड़ रहे हैं, ये इस बात का प्रमाण हैं कि जलवायु प्रणाली बुरी तरह से डिसरप्ट हो रही है।

Northeast में बदलता बारिश का पैटर्न बढ़ा रहा खतरा

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का कहना है कि इस क्षेत्र में वायुमंडलीय साइक्लोन साइकल और लो लाइंग थ्रो का ऐसा संयोजन बन रहा है जो बदलते मौसम को और अधिक अस्थिर बना रहा है। पहले जहां मानसून में कई दिनों तक हल्की-फुल्की बारिश होती थी, वहीं अब कम समय में बेहद भारी बारिश हो रही है। इससे प्राकृतिक जलनिकासी प्रणाली जैसे नदियां, झीलें और झरने भी ओवरफ्लो हो जाते हैं, जिससे भूस्खलन और बाढ़ की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

विकास की मार झेल रहे पूर्वोत्तर के राज्य

पूर्वोत्तर भारत की पारिस्थितिकी अत्यंत नाजुक है। यहां की भौगोलिक संरचना, पर्वतीय इलाका और घने जंगल हमेशा से संवेदनशील रहे हैं। लेकिन अब ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हिमालय क्षेत्र गर्म हो रहा है, जिससे परिस्थिति तेजी से बदल रही है और कई गंभीर आपदा का संकेत दे रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया का तापमान बढ़ते जा रहा है जिससे बादल फटने की समस्या बढ़ते जा रही है।

इतना ही नहीं पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में विकास के नाम पर बड़ी संख्या में जंगलों की कटाई हो रही है जिससे पहाड़ों की कसक कमजोर पड़ते जा रही है। हल्की बारिश में भी पहाड़ों की मिट्टी कटने से लैंडस्लाइड की घटना बढ़ती जा रही है। इसके अलावा अंधाधुंध शहरीकरण का बढ़ना और अवैध खनन से भी मिट्टी की पकड़ कमजोर हो रही है, जिससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं।

क्या कहता है सरकारी डेटा?

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) की एक रिपोर्ट की मानें तो पूर्वोत्तर के राज्यों में पिछले कई सालों से बारिश के पैटर्न में काफी बदलाव देखने को मिला है। साल 2000 से 2020 के बीच असम, मेघालय और अरुणाचल में एक दिन में बारिश के आंकड़ों में 33% की वृद्धि दर्ज की गई है।

ये बदलाव जलवायु परिवर्तन के कारण हुई है जो इन क्षेत्रों में बाढ़ का एक बड़ा कारण भी है। यह वृद्धि स्थानीय इकोसिस्टम के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि बारिश जितनी अधिक और तीव्र होगी, उतना अधिक क्षरण, भूस्खलन और शहरी बाढ़ का खतरा बढ़ेगा।

Northeast में तबाही का भयावह मंजर

  • सिक्किम: उत्तरी हिस्से में 1200 से ज्यादा पर्यटक फंसे। तीस्ता नदी में वाहन गिरने से 8 लोग लापता।
  • मेघालय: 10 जिले बाढ़ और भूस्खलन की चपेट में।
  • त्रिपुरा: 10,000 से ज्यादा लोग प्रभावित।
  • असम: 19 जिलों में 764 गांवों के 3.6 लाख लोग संकट में हैं।

क्या किया जा सकता है?

यह घटना केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह मानवजनित जलवायु परिवर्तन की चेतावनी है। विकास के नाम पर पर्यावरण से समझौता, वनों की कटाई, अवैज्ञानिक निर्माण कार्य और जलवायु नीति की अनदेखी ने इस संकट को और गहरा किया है।

  • जलवायु अनुकूल विकास मॉडल अपनाना होगा - जिसमें हर परियोजना का पर्यावरणीय मूल्यांकन अनिवार्य हो।
  • जल प्रबंधन ढांचे को पुनर्गठित करना होगा, ताकि अधिक बारिश का सामना किया जा सके।
  • वन संरक्षण और फिर से वन बचाने के लिए कार्यक्रम तत्काल प्रभाव से लागू करने होंगे।
  • आम लोगों को जलवायु साक्षरता के माध्यम से जागरूक करना होगा कि ये आपदाएं इंसानी गतिविधियों का ही परिणाम हैं।

पूर्वोत्तर भारत की यह आपदा दरअसल एक बड़ा सवाल है हम अपने पर्यावरण के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं? यह केवल बारिश का मामला नहीं है यह हमारे पूरे अस्तित्व के मॉडल पर पुनर्विचार का समय है। ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ विज्ञान के शब्द नहीं रहे, वे अब खबरों की सुर्खियां और हमारी जिंदगियों की हकीकत बन चुके हैं।

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