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'जनसंख्या बढ़ोतरी का धर्म से कोई लेना-देना नहीं, प्रजनन दर में सबसे ज्यादा गिरावट मुसलमानों में: NGO का दावा

भारत में अल्पसंख्यकों की आबादी में बढ़ोतरी पर छिड़ी बहस के बीच एनजीओ पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने कहा है कि, ''जनसंख्या बढ़ोतरी दर धर्म से जुड़ी नहीं है और सभी धार्मिक समूहों के बीच कुल प्रजनन दर (TFR) में गिरावट आ रही है, जिसमें सबसे ज्यादा कमी मुसलमानों में देखी गई है।''

ये प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की रिपोर्ट के बाद आई है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने रिपोर्ट में कहा था कि हिंदुओं की जनसंख्या घट रही है और मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ी है।

Population Foundation of India

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के मुताबिक भारत में 1950 और 2015 के बीच हिंदू आबादी की हिस्सेदारी में 7.82 प्रतिशत की कमी आई, जबकि मुसलमानों की हिस्सेदारी में 43.15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरान अन्य अल्पसंख्यकों जैसे ईसाई, बौद्ध और सिखों की आबादी भी बढ़ी है।

इस रिसर्च के आने के बाद लोकसभा चुनाव-2024 के मद्देनजर राजनीतिक दलों के बीच विवाद शुरू हो गया। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आरोप लगाया कि कांग्रेस की "तुष्टीकरण की राजनीति" के कारण देश में मुसलमानों की आबादी में बढ़ोतरी हुई है।

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने EAC-PM की रिपोर्ट पर क्या कहा?

  • अब पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने दावा किया है कि जनसंख्या बढ़ोतरी दर का धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने मीडिया रिपोर्टिंग को भ्रामक और चिंताजनक बताया है। उन्होंने ये भी कहा है कि "गलत रिपोर्टिंग" करने वाली हालिया मीडिया रिपोर्टों से वह बहुत चिंतित हैं।
  • पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा के मुताबिक, मुस्लिम आबादी में बढ़ोतरी को दिखाने के लिए मीडिया जिस तरह आंकड़ों को तोड़ कर पेश कर रही है, वह गलत है। साथ ही यह व्यापक जनसांख्यिकीय रुझानों को मीडिया नजरअंदाज कर रही है।
  • इन रिपोर्ट में कहा गया है कि, "65 साल की अवधि में वैश्विक स्तर पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों की हिस्सेदारी में बदलाव पर अध्ययन का ध्यान किसी भी समुदाय के खिलाफ भय या भेदभाव को भड़काने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।''
  • जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन दशकों में मुसलमानों की दशकीय वृद्धि दर में गिरावट आ रही है। खासकर मुसलमानों की दशकीय वृद्धि दर 1981-1991 में 32.9 प्रतिशत से घटकर 2001-2011 में 24.6 प्रतिशत हो गई।
  • एनजीओ ने कहा, "यह गिरावट हिंदुओं की तुलना में ज्यादा स्पष्ट है, जिनकी वृद्धि दर इसी अवधि में 22.7 से गिरकर 16.8 प्रतिशत हो गई है।
  • एनजीओ ने कहा है कि, जनगणना के आंकड़े 1951 से 2011 तक उपलब्ध हैं और यह इस अध्ययन के आंकड़ों से काफी मिलते-जुलते हैं, जिससे पता चलता है कि ये आंकड़े नए नहीं हैं।
  • एनजीओ ने कहा है कि, सभी धार्मिक समूहों के बीच कुल प्रजनन दर में गिरावट आ रही है। इसमें कहा गया है कि, 2005-06 से 2019-21 तक कुल प्रजनन दर में सबसे अधिक कमी मुसलमानों में देखी गई, जिसमें 1 प्रतिशत की गिरावट आई, इसके बाद हिंदुओं में 0.7 प्रतिशत की गिरावट आई है।
  • एनजीओ ने यह भी कहा है कि, "ये रिपोर्ट बताते हैं अलग-अलग धार्मिक समुदायों में प्रजनन दर एक समान हो रही है।'' उन्होंने ये भी कहा है कि ऐसी व्याख्याएं न केवल गलत हैं बल्कि भ्रामक और आधारहीन भी हैं।
  • बता दें कि एनजीओ पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया, लिंग-संवेदनशील जनसंख्या, स्वास्थ्य और विकास रणनीतियों और नीतियों के प्रभावी निर्माण और कार्यान्वयन को बढ़ावा देता है।
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