CG Naxalism: क्या भारत से खत्म हो रहा है नक्सलवाद? देवजी के सरेंडर के बाद कैसे बिखरता गया नक्सल नेटवर्क
CG Naxalism End India 2026: बस्तर की पहाड़ियों और दंडकारण्य के घने जंगलों में पिछले चार दशकों से जारी लाल सलाम के बंदूक का आतंक अब अंतिम सांसें ले रही है। सुरक्षाबलों के 'ऑपरेशन कगार-2 (Operation Kagar-2)' और 'ब्लैक फॉरेस्ट' जैसे अभियानों ने माओवादी संगठन की कमर तोड़ दी है।
बस्तर आईजी पी. सुंदरराज और तेलंगाना डीजीपी बी. शिवधर रेड्डी की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, सीपीआई (माओवादी) का शीर्ष नेतृत्व अब आधिकारिक तौर पर शून्य हो गया है। भारत में चार दशक से अधिक समय तक चुनौती बने नक्सलवाद को लेकर अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है क्या यह आंदोलन अपने अंत के करीब पहुंच चुका है?

हालिया घटनाक्रम, सुरक्षा बलों के दावे और केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़े इस ओर इशारा कर रहे हैं कि नक्सली संगठन न सिर्फ कमजोर हुआ है, बल्कि उसकी शीर्ष नेतृत्व संरचना लगभग खत्म हो चुकी है। बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी के शब्दों में, अब माओवादियों की टॉप लेवल लीडरशिप शून्य हो चुकी है।
Anti Naxal Operation में अब तक क्या-क्या हुआ? कैसे बिखरता गया नक्सली नेटवर्क
सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के मुताबिक, बस्तर के अलग-अलग इलाकों में अब करीब 200 नक्सली ही सक्रिय बचे हैं। कभी माओवाद का मजबूत गढ़ माना जाने वाला महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ (MMC) जोन पूरी तरह खत्म हो चुका है। उत्तर बस्तर और माड़ डिवीजन में भी नक्सलियों को गहरी चोट पहुंची है। इन इलाकों में या तो संगठन बिखर चुका है या कैडर आत्मसमर्पण कर चुके हैं।
बस्तर आईजी पी. सुंदरराज और तेलंगाना डीजीपी बी. शिवधर रेड्डी की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, सीपीआई (माओवादी) का शीर्ष नेतृत्व अब आधिकारिक तौर पर शून्य हो गया है। फिलहाल नक्सली गतिविधियां दक्षिण बस्तर के घने जंगलों तक सीमित रह गई हैं, जहां कुछ बचे हुए सीनियर कैडर और चुनिंदा टॉप लीडर अब भी छिपे हुए हैं।
बसवराजू से हिडमा तक कितना कमजोर हुआ नक्सली ढांचा?
नक्सली संगठन के लिए पिछले दो साल किसी बुरे सपने से कम नहीं रहे हैं। मई 2025 में माओवादियों के सबसे बड़े रणनीतिकार और तत्कालीन महासचिव नंबाल्ला केशव राव उर्फ बसवराजू की अबूझमाड़ के जंगलों में एक मुठभेड़ में मौत हो गई। बसवराजू की मौत संगठन के लिए पहला बड़ा झटका थी, क्योंकि वह हथियारों और तकनीकी युद्ध में माहिर था। इसके बाद हिडमा और उसकी पत्नी की मौत ने लाल आतंक की कमर कमजोर करने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई।
बसवराजू के बाद थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी को संगठन का नया मुखिया और महासचिव माना जा रहा था। देवजी, जो मूल रूप से तेलंगाना के जगतियाल का रहने वाला था और 1980 के दशक से सक्रिय था, उसे संगठन का 'दिमाग' माना जाता था। लेकिन सुरक्षाबलों के चौतरफा घेराव और रसद की कमी के चलते देवजी ने 22 फरवरी 2026 को अपने कई साथियों के साथ तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उनके साथ सेंट्रल कमेटी के सदस्य मुरली उर्फ सांगरा और अन्य शीर्ष कैडरों का सरेंडर करना यह दर्शाता है कि अब संगठन के पास लड़ने की इच्छाशक्ति खत्म हो चुकी है।
Devji surrender Maoist: देवजी का सरेंडर क्यों माना जा रहा है टर्निंग पॉइंट
सीपीआई (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी के वरिष्ठ सदस्य थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी का तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण नक्सल आंदोलन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। देवजी, मारे गए शीर्ष नेता नंबाल्ला केशव राव उर्फ बसवराजू के बाद संगठन का सबसे बड़ा चेहरा माना जा रहा था। बसवराजू की मौत के बाद देवजी ने ही पार्टी की कमान संभाली थी और उन्हें संभावित महासचिव माना जा रहा था।
तेलंगाना के डीजीपी बी. शिवधर रेड्डी के अनुसार, लगातार सुरक्षा बलों के दबाव के कारण सेंट्रल कमेटी की बैठक तक नहीं हो सकी, जिससे नया महासचिव चुना ही नहीं जा पाया। नतीजा यह हुआ कि संगठन आज हेडलेस, रडरलेस और लीडरलेस स्थिति में पहुंच गया।
Naxal Leader Encounter में कौन-कौन टॉप लीडर ढेर हुए
बीते कुछ सालों में माओवादी संगठन को सबसे बड़ा झटका उसकी टॉप लीडरशिप के खत्म होने से लगा है। बसवराजू की एनकाउंटर में मौत, हिडिमा और उसकी पत्नी समेत कई सीनियर कमांडरों का मारा जाना और अब देवजी का सरेंडर इन सबने संगठन की रीढ़ तोड़ दी है।
IG बस्तर सुंदरराज पी का कहना है कि अब माओवादी कैडर केवल इलाके बदल-बदल कर पुलिस की कॉम्बिंग से बचने की कोशिश कर रहे हैं, किसी बड़े पुनर्गठन की क्षमता उनमें नहीं बची है। आंकड़े गवाह हैं कि कभी 126 जिलों तक फैले इस आंदोलन का दायरा अब सिमटकर केवल 11 जिलों तक रह गया है।
MMC जोन का खात्मा: महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का वह त्रिकोण (MMC Zone), जिसे नक्सली अपना नया सुरक्षित ठिकाना बनाने की कोशिश कर रहे थे, अब पूरी तरह साफ हो चुका है।
बचे-खुचे लड़ाके: पुलिस के अनुमान के मुताबिक, अब पूरे बस्तर संभाग में केवल 200 से 250 सक्रिय नक्सली ही बचे हैं। उत्तर बस्तर और माड़ डिवीजन से नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है, और जो थोड़े-बहुत नक्सली बचे हैं, वे दक्षिण बस्तर (सुकमा-बीजापुर) के सीमावर्ती इलाकों में जान बचाने के लिए भाग रहे हैं।
संगठन की हालत: तेलंगाना डीजीपी ने न्यूज एजेंसी ANIसे बातचीत करते हुए कहते हैं- अब नकस्लवाद 'हेडलेस' (बिना सिर का) और 'रडरलेस' (बिना दिशा का) है। सेंट्रल कमेटी की बैठकें बंद हो चुकी हैं और अब कोई नया महासचिव चुनने वाला भी नहीं बचा है।
बस्तर को 'माओवाद मुक्त' घोषित करने पर बहस क्यों? आंकड़े क्या कहते हैं?
छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबलों की आक्रामक कार्रवाई के बीच बस्तर को 'माओवाद मुक्त' घोषित करने की चर्चा तेज हो गई है, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़े अभी सतर्क रहने का संकेत देते हैं। केंद्र सरकार की ओर से जारी लिस्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ के 33 में से 15 ज़िले माओवादी हिंसा से प्रभावित रहे हैं।
बस्तर संभाग के सात ज़िले बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा, बीजापुर और कोंडागांव लंबे समय तक नक्सली गतिविधियों के केंद्र रहे हैं। देशभर में माओवाद से 'सबसे अधिक प्रभावित जिलों' की कैटेगरी में फिलहाल 6 जिले हैं, जिनमें से चार अकेले छत्तीसगढ़ के बस्तर से हैं- बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा। यह दिखाता है कि भले ही संगठन कमजोर हुआ हो, लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
Maoist Leadership Zero 2026 के लक्ष्य के लिए गणपति और भास्कर अभी भी सुरक्षा बलों के लिए सिरदर्द
हालांकि टॉप लीडरशिप को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन गणपति और मिशिर बेसरा उर्फ भास्कर जैसे नाम अब भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। गणपति, जिसे मुपल्ला लक्ष्मण राव के नाम से भी जाना जाता है, पर 3.5 करोड़ रुपये से ज्यादा का इनाम है। वह कई बड़े नक्सली हमलों का मास्टरमाइंड रहा हैं चाहे वह सुकमा का कड़गम ब्लास्ट हो या दंतेवाड़ा और ताड़मेटला के हमले।
वहीं भास्कर, जिस पर एक करोड़ से ज्यादा का इनाम है, अब भी बस्तर और झारखंड क्षेत्र में भूमिगत माना जाता है और नई भर्तियों में सक्रिय बताया जाता है।
सुरक्षा बलों की रणनीति अब केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है। एक ओर जहां ऑपरेशन कागर-2 के तहत बचे हुए कैडरों पर दबाव बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार सरेंडर और पुनर्वास नीति के जरिए उन्हें मुख्यधारा में लाने पर जोर दे रही है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कई बार दोहरा चुके हैं कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का पूरी तरह खात्मा सरकार का लक्ष्य है। हालांकि, जब तक बचे हुए सशस्त्र गुट पूरी तरह खत्म या आत्मसमर्पण नहीं कर देते, तब तक सुरक्षा बलों के सामने चुनौतियां बनी रहेंगी।
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