राजनीतिक 'कलाबाजी' में धुरंधर हो चुके हैं नवजोत सिंह सिद्धू, उनकी पूरी सियासी कुंडली देखिए
नई दिल्ली, 28 सितंबर: पंजाब में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने आज अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को काफी मायूस करके उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन वह 72 दिन से ज्यादा इस पद पर भी नहीं टिक पाए। जबकि, प्रदेश में पार्टी उसी रास्ते चलती दिखी जिसपर सिद्धू ने उसे चलाने की कोशिश की है। कैप्टन को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा, सिद्धू को भरोसे में लेने के बाद ही चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले वहां का ताज दिया गया। मंत्री-उपमुख्यमंत्री बनाने में भी सिद्धू की ही चलती रही। लेकिन, सिद्धू ने अचानक पार्टी चीफ का पद छोड़कर कांग्रेस आलकमान को फिर से नए संकट में डाल दिया है। अब तो न उसके पास अमरिंदर हैं और ना ही सिद्धू वह जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं। हम आपको बताते हैं कि कैप्टन ने उन्हें 'अस्थिर' बताया है तो इसकी वजह क्या है ?

बीजेपी से कब पैदा हुई सिद्धू की नाराजगी ?
नवजोत सिंह का सक्रिय राजनीतिक करियर करीब 17 साल का हो चुका है। पहली बार बीजेपी ने उन्हें 2004 के लोकसभा चुनाव में अमृतसर सीट से टिकट दिया और वह चुनाव जीत गए। 2006 में उन्हें 1988 के रोड रेज केस में दोषी करार दिए जाने की वजह से लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ गई। 2007 में हुए उपचुनाव में उन्होंने भाजपा के टिकट पर यह सीट दोबारा जीत ली। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने लगातार तीसरी बार अमृतसर सीट से जीत दर्ज की। भाजपा से उनकी पहली मायूसी तब शुरू हुई, जब उन्हें दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में यह सीट छोड़नी पड़ी। हालांकि, जेटली को यहां कांग्रेस के अमरिंदर सिंह ने हरा दिया।
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2017 के चुनाव से पहले कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया
दो साल के इंतजार के बाद भाजपा ने सिद्धू को राज्यसभा में भेज दिया। लेकिन, शायद तबतक बहुत देर हो चुकी थी और नवजोत सिंह सिद्धू भीतर ही भीतर पार्टी से दूरी बना चुके थे। वह एक साल भी राज्यसभा के सदस्य बनकर नहीं रहे और उससे इस्तीफा दे दिया। वैसे भी शिरोमणि अकाली दल के बादल परिवार को तबज्जो देने से वह अपनी पार्टी से कभी खुश नहीं रहे। लेकिन, एनडीए का गठबंधन धर्म निभाने के चक्कर में पार्टी ने सिद्धू की दलीलों को हमेशा ही अनसुना किया था। भाजपा से जब उन्होंने नाता तोड़ लिया तब अटकलें शुरू हुईं कि वह 2017 के विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का सियासी 'मोहरा' बन सकते हैं। लेकिन, उस साल चुनाव से पहले सिद्धू आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस में शामिल हो गए।

राजनीति छोड़ देने वाला दांव फेल कर गया
कांग्रेस ने 2017 का विधानसभा चुनाव कैप्टन अमरिंदर सिंह का नेतृत्व, बादल-बीजेपी सरकार के खिलाफ जनता का आक्रोश और बॉलीवुड की फिल्म 'उड़ता पंजाब' से बनाए गए माहौल की वजह से भारी बहुमत से जीत लिया। कैप्टन कांग्रेस सरकार के कप्तान बने और सिद्धू को पर्यटन और स्थानीय निकाय जैसे विभागों का मंत्री बनाया गया। सिद्धू को कांग्रेस में लाने का श्रेय राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा का था, इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनकी आस लगातार कायम रही। यही वजह है कि गांधी परिवार के लिए अपनी राजनीति को सियासी दांव पर लगाने में भी सिद्धू पीछे नहीं रहे। अप्रैल, 2019 में जब लोकसभा चुनाव से पहले अमेठी में राहुल गांधी की हालत पतली होने का दावा किया जा रहा था तो सिद्धू ने यहां तक ताल ठोक दियाकि अगर राहुल गांधी अमेठी में हार जाएंगे तो वह राजनीति छोड़ देंगे। उन्होंने राजनीति तो नहीं छोड़ी, लेकिन काफी दिनों तक मीडिया में बोलना जरूर बंद कर दिया।

अमरिंदर सिंह से अदाबत शुरू की
2019 के लोकसभा चुनाव में कैप्टन के नेतृत्व में कांग्रेस ने बाकी राज्यों के मुकाबले पंजाब में अच्छा ही प्रदर्शन किया। पार्टी को कुल 52 सीटें मिलीं, जिसमें पंजाब की 13 में से 8 शामिल थीं। लेकिन, सिद्धू ने इसे खराब प्रदर्शन बताकर अमरिंदर से अदाबत की शुरुआत कर दी। विवाद बढ़ा और अमरिंदर ने यहां तक कह दिया कि सिद्धू उनकी जगह सीएम बनना चाहते हैं। विवाद बढ़ने पर सिद्धू ने 10 जून,2019 को अमरिंदर कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया, लेकिन उसे सीएम या राज्यपाल को सौंपन की बजाए सोनिया गांधी को भेज दिया। चुनावों में बुरी तरह से पिटने के बाद राहुल ने पहले ही इस्तीफा दे दिया था। आखिरकार एक महीने से ज्यादा गुजरने के बाद सिद्धू ने 15 जुलाई को मुख्यमंत्री को इस्तीफा भेजकर सरकार से निकलने की औपचारिकता निभाई।

अमरिंदर सरकार के लिए 'विपक्ष' की भूमिका में रहे सिद्धू
उसके बाद से नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब में अपनी पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री पर विपक्षी नेताओं से भी बढ़कर हमला करना शुरू कर दिया। समझ पाना मुश्किल था कि सिद्धू खुद ऐसा कर रहे थे कि उनसे अमरिंदर की फजीहत करवाने के लिए ऐसा करने को कहा जा रहा था। दो साल तक पंजाब कांग्रेस और उसकी सरकार इसी अंतरविरोध को झेलने को मजबूर रही। फिर चर्चा शुरू हुई सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की। अमरिंदर इसके मुखर विरोधी थे। लेकिन, गांधी परिवार की नजदीकियों के चलते इस साल जुलाई में उन्हें पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। सिद्धू ने यह जिम्मेदारी संभालने के लिए जितना तामझाम किया, उतना कांग्रेस की राजनीति में शायद ही कभी देखा गया है।

राजनीतिक 'कलाबाजी' में धुरंधर हो चुके हैं नवजोत सिंह सिद्धू
किसी तरह से दो महीने गुजरे थे कि पार्टी में अलग-थलग किए जाने से नाराज होकर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इसी महीने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही उन्होंने सिद्धू पर कई गंभीर आरोप लगाए और चुनावों में भी हर हाल में उन्हें हराने का ऐलान कर दिया। शायद इसका परिणाम यह हुआ कि सिद्धू सीएम बनते-बनते रह गए और कांग्रेस चरणजीत सिंह चन्नी को ढूंढ़कर ले आई। मंत्रिपरिषद के गठन में भी सिद्धू की अहम भूमिका रही और शपथग्रहण में मंच पर वह 'सुपर' भूमिका में नजर आए। लेकिन, दो दिन बाद ही उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया है। करीब डेढ़ दशक की राजनीति में सिद्धू इतनी कलाबाजियां खा चुके हैं कि वह आगे क्या करने वाले हैं, शायद उन्हीं को पता होगा। इसलिए, अमरिंदर के लिए वह भले ही 'अस्थिर' हों, लेकिन खुद को किसी 'धुरंधर' से कम नहीं समझ रहे होंगे, जिन्होंने 'पंजाब के लिए' पद छोड़ने की दलील दी है।












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