मोदी-ओबामा की मुलाकात से कौन सी करवट लेंगे भारत और अमेरिका

Narendra Modi and Barack Obama meeting affect Indo-American relationship
नई दिल्ली (ब्यूरो)। खबर आयी है कि अमेरिका के राष्ट्रपति सितंबर के महीने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। इस मुलाकात का पूरे विश्व को इंतजार रहेगा, खास कर चीन, रूस और जापान को। खैर अन्य देशों की बात करना तो अलग मुद्दा है। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि इसस मुलाकात के साथ भारत और अमेरिका कौन सी करवट लेने वाले हैं।

सितंबर में मोदी की अमेरिका ट्रिप कैसी होगी, मुलाकात में कौन-कौन से मुद्दे रखे जायेंगे, आदि यह सब तय होगा अगले हफ्ते जब साउथ एंड सेंट्रल एश‍िया के लिये अमेरिका की सहायक सचिव निशा देसाई बिसवाल दिल्ली आयेंगी। निशा का काम होगा इस वार्ता को सफलतापूर्वक आयोजित करना। निशा ही प्रोपोजल तैयार करेंगी कि अमेरिका के विदेश सचिव जॉन कैरी और ओबामा मोदी से कब मिलेंगे।

वर्तमान परिस्थतियों की बात करें तो भारत और अमेरिका उस चौराहे पर साथ खड़े हैं, जहां पर पोखरण परीक्षण से लेकर नरेंद्र मोदी को अमेरिकी वीजा दिये जाने की चर्चा पिछले कई वर्षों से होती रही है। 1990 के दशक के बाद से दोनों देशों ने बहुत सारे सकारात्मक कदम उठाये।

अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो पोखरण में द्वितीय परीक्षण के बाद अमेरिका भारत से चौकन्ना हो गया था। वहां के टीवी चैनलों पर बहस छिड़ गई थी कि इस परीक्षण के बाद भारत कितना शक्त‍िशाली बनकर उभरा है। उस वक्त अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता थी कि पोखरण परीक्षण के बाद क्या होगा?

उस वक्त अमेरिका ने सोचा कि भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया जाये, लेकिन तत्कलीन सिनेटर जेसी हेल्म्स ने अमेरिकी सरकार से कहा कि ऐसा करने पर भारत की सड़कों पर भारतीय सरकार का विरोध नहीं होगा, बल्क‍ि लोग नई दिल्ली में स्थति अमेरिकी दूतावास का घेराव करने पहुंच जायेंगे।

तब खटास आने के आसार थे, लेकिन ऐसा नही हुआ और आज तक अमेरिका और भारत के रिश्तों में मधुरता बरकरार है। भारत में सिलिकॉन वैली के निर्माण में भी अमेरिका का बड़ा योगदान रहा। आईटी हब बनने के साथ-साथ भारत आउटसोर्स‍िंग का बड़ा हब बन गया।

घड़ी की सुई अगर 2005 में ले जायें तो तभी से अमेरिका ने मोदी पर वीजा प्रतिबंध लगाया था। 9 साल का यह प्रतिबंध छोटी-मोटी बात नहीं। खैर उसे लेकर लीख पीटने का अब कोई मतलब नहीं, क्योंकि अब स्वयं ओबामा ने मोदी को चाय पर बुलाया है।

इस मुलाकात के साथ भारत के प्रति अन्य देशों का नजरिया बदलने वाला है। रही बात अमेरिका की तो वह कोई भी सौदा घाटे का नहीं करता। लिहाजा यहां मोदी सरकार के लिये कुछ सुझाव तो बनते ही हैं।

मुलाकात के वक्त अमेरिका भी तमाम प्रस्ताव रखेगा, उन प्रस्तावों पर गंभीरतापूर्वक विचार करना ही होगा। भारत के लिये सबसे महत्वपूर्ण है यहां के मिडिल क्लास परिवार। अमेरिका के साथ संबंध ही यहां के मिडिल क्लास परिवारों के बच्चों के लिये रोजगार के अवसर खोलेंगे। यही वो मुलाकात होगी, जो बड़े स्तर पर कंपनियों को आगे बढ़ने का चांस देगी और मिडिल क्लास भारतीय परिवारों की लाइफस्टाइल में अपग्रेडेशन होगा। यह वो मुलाकात है, जो कृष‍ि पर निर्भर परिवारों के लिये नये अवसर लेकर आयेगी, यह वो मुलाकात है जो छोटे उद्योगों को बड़ा बनने में मदद कर सकती है।

पिछले 10 सालों में जो कुछ भी नये कदम उठाये गये, उनमें बिचौलियों की भूमिका हमेशा से अहम रही। उम्मीद है कि मोदी की नई विदेश नीति बिचौलियों का खेल समाप्त कर देगी। हम आपको बता दें कि अमेरिका की संस्था यूएससीआईआरएफ इस वक्त मोदी के हर एक काम पर नजर बनाये हुए है। मोदी के सितंबर तक के क्रियाकलापों को नोट कर महत्वपूर्ण बिंदु व्हाइट हाउस भेजे जायेंगे, ताकि अमेरिका भारत के साथ उसी के अनुसार आगे की प्लानिंग कर सके।

खैर अंत में हम प्रधानमंत्री को उनके चुनाव प्रचार के दौरान कहे गये शब्द याद दिलाना चाहते हैं, जो उन्होंने काशी के लिये कहे थे। उन्होंने कहा था कि वो गंगा के तट पर बसी काशी को ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर लाना चाहते हैं।

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