जो पिछले 10 साल में ना हुआ उसे सुषमा स्वराज ने कर दिखाया
नई दिल्ली। पूर्वोत्तर के आतंकियों के खिलाफ भारतीय सेना का अभियान महज एक इत्तेफाक भी हो सकता है जब मणिपुर के हमले में 18 जवान शहीद हुए थे। म्यांमार सीमा से आतंकियों के खिलाफ कार्यवाही की योजना भारतीय सेना ने अगस्त 2014 में की थी और इसके लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने खुद सख्ती से कदम बढ़ाये थे।

म्यांमार शुरु से ही भारत के साथ इस मुद्दे पर सहयोग के लिए तैयार है कि सीमा पार से भारत के खिलाफ आतंकियों की गतिविधियों पर दोनों देशों की सेना साझा रूप से कार्यवाही करके रोक लगायेंगी।
1992 में हुई थी शुरुआत
इसकी शुरुआत तब हुई थी जब 1992 में भारत ने आंग सू की को नेहरू शांति पुरस्कार से सम्मानित किया था। दोनों देशों के बीच मैत्री रवैये से यहां के आतंकियों में काफी नाराजगी फैल गयी जिसके बाद यहां की सरकार ने इस साझा अभियान से अपने हाथ पीछे खींच लिये।
अगस्त 2014 को हुई साझा ऑपरेशन पर बातचीत शुरु
म्यांमार शुरु में खुद की जमीन पर इस अभियान के लिए भारत को इजाजत देने के लिए तैयार नहीं था। लेकिन जब सुषमा स्वराज ने 2014 में इस मुद्दे को म्यांमार के साथ उठाया तो म्यांमार इस अभियान के लिए राजी हो गया। साथ ही इस बात पर भी सहमति बनी कि इस अभियान के चलते देश की बदनामी नहीं होनी चाहिए।
अगस्त 2014 की बैठक के बाद बातचीत के कई दौर चलें कि कैसे इस मु्देद को आगे लेकर चला जाए। लेकिन इन मुलाकातों के बाद आखिरकार दोनों देशों के बीच सहमति बनी और भारत ने इस अभियान को म्यांमार के सगैंग इलाके में घुसकर अंजाम दिया।
पहले भी भारत-म्यांमार ने किया है साझा अभियान
भारत इससे पहले भी म्यांमार के साथ साझा अभियान कर चुका है। इससे पहले 1995 और 2006 में दोनों देशों ने आतंकी संगठनों को साझा रुप से निशाना बनाया था। लेकिन इस बार आतंकियों का यह मुद्दा पहले की अपेक्षा कहीं गंभीर था।
पूर्वोत्तर भारत के ये आतंकी संगठन काफी मजबूत हो गये थे और कई छोटे-बड़े संगठन एक ही छत के नीचे आ गये थे। इन आतंकियों के पास भारी मात्रा में आधुनिक हथियार भी पहुंचने लगे थे। ऐसे में भारत ने म्यांमार के साथ इस समझौते पर पहुंचने में सफलता पायी कि भारत म्यांमार की सीमा में यह अभियान चलायेगा और इस बार यह अभियान काफी समय तक चलेगा।












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