प्रशांत भूषण जी जरूर पढ़ें- बेघर कश्मीरियों की दु:ख भरी दास्तां

पहले आतंकवाद और अब अलाववाद की वजह से पांच सौ से ऊपर कश्मीरी विस्थापित तम्बुओं मे जीवन यापन करने को मजबूर हैं। साथ ही बदले हुए मौसम की सर्द हवाएं भी इनकें सब्र का इम्तेहान ले रही है। घर बार बेच कर यूपी-बिहार के चक्कर काट रहे इन कश्मीरियों को रोजगार तक नहीं मिल रहा है। जिसकी वजह से इन्हे अपने पेट की आग बुझाने के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
उदाहरण के तौर पर लखनऊ ही ले लीजिये जहां के मवैया क्षेत्र में प्रेमवती नगर के गढ़ी कनौरा फाटक के पास करीब पांच सौ कश्मीरी परिवार पनाह लिए हुए हैं। इनके साथ बच्चे बुजुर्ग व महिलाएं भी हैं। इस कुनबे के आधे सदस्य दिन भर शहर में घूम-घूम कर लोगों को अपनी बदहाली की दांस्ता सुनाते हैं, और दया खाकर लोग इन्हें सौ-पचास रुपए दे देते हैं।
दर-दर भटकने को मजबूर किया आतंकवाद और अलगाववाद ने
कश्मीर से लखनऊ में आकर अस्थाई रूप से रह रहे वशीर अहमद ने बताया की कश्मीर में इनका पूरा परिवार खुशहाल जीवन बिता रहा था, लेकिन आतंकवाद ने हमारा सब कुछ उजाड़ कर रख दिया। घर बार बेचने के बाद जो पैसे मिले थे, वो सब परिवार के लालन पालन में खत्म हो गये अब हालात ये हैं, कि हमारे पास खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा है। उन्होने बताया की अगर हमारे परिवार के सदस्य दिन भर लोगों से कुछ मांगने न निकले तो परिवार का पेट भरना मुश्किल हो जाये। कभी-कभी तो कर्इ वक्त हमारा परिवार बिना कुछ खाये बीत जाता है।
मोहम्मद लगदी भट्ट ने कागज के एक पन्ना दिखाया, जिस पर जम्मू एण्ड कश्मीर स्टूडेंट रिलीफ कमेटी, जिला बारामुल्ला लिखा था। इसके अलावा कागज पर आग्रेजी मे एक नोट था, जिसमे यह कैम्प अनाथ विधवा के लिए है लिखा था। उसने बताया की कागज के इस पन्ने को लोगों को दिखा कर और अपनी व्यथा की दास्तां लोगो को सुना कर कुछ मिलने की उम्मीद में मिन्नते करता रहता हूं। कुछ लोग हमारे दुख देख कर आनाज वगैरा दान कर देते हैं पर कुछ हमें शक की निगाह से देखते हैं। इस माहौल मे अगर हमारे कैम्प के पास आ कर कुछ मदद कर देता है, तो ऐसा लगता है मानो खुदा हमारे दरवाजे पर खुद ब खुद आ गया है।
कश्मीर पर राजीतिक रोटियां
मोहम्मद लगदी और वशीर अहमद की दास्तां सुनने के बाद यही साबित होता है कि चाहे भाजपा हो या कांग्रेस या फिर आम आदमी पार्टी, सभी दल राजनीतिक रोटियां सेकने में व्यस्त हैं। जमीनी स्तर पर क्या चल रहा है, कश्मीर के लोग वास्तव में क्या झेल रहे हैं, इसकी किसी को भी परवाह नहीं। खास बात यह है कि लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है और यहीं पर मुख्यमंत्री से लेकर सपा के मुखिया समेत तमाम बड़े नेता रहते हैं, लेकिन किसी ने भी इन बेघर कश्मीरियों की मदद के लिये हाथ नहीं बढ़ाये।
और तो और प्रशांत भूषण की आम आदमी पार्टी की लखनऊ इकाई की नजर भी इन कश्मीरियों पर नहीं गई। जरा सोचिये जब सेना तैनात है तो यह मंजर देखने को मिल रहा है, अगर कश्मीर से सेना को हटा लिया जाये तो ऐसे कितने कश्मीरी कितने शहरों में भटकते नजर आयेंगे, इसस बात का अंदाजा हम और आप क्या, खुद प्रशांत भूषण भी नहीं लगा सकते हैं।












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