26/11 Attack: कौन थे उन्‍नीकृष्‍णन? कारगिल का शेर, जो ताज में 14 बंधकों का बना मसीहा! आतंकियों से लिया लोहा

26/11 Mumbai Attack: 26 नवंबर 2008। मुंबई की रात खून में डूबी थी। ताज होटल की भव्य इमारत में लश्कर के आतंकवादी घुसे हुए थे। सैकड़ों लोग बंधक थे। हर तरफ गोली की आवाजें, धुएं का गुबार और चीखें। ऐसे वक्त में जब आम इंसान भी कांप जाए, वहां एक शख्स अकेला दहाड़ रहा था - मेजर संदीप उन्नीकृष्णन (Sandeep Unnikrishnan)।

जिन्होंने घायल होने के बावजूद 14 बंधकों को जिंदा निकाला, कई आतंकियों को ढेर किया और आखिरी सांस तक लड़े। उनके आखिरी शब्द थे - 'ऊपर मत आना... मैं देख लूंगा।'

Sandeep Unnikrishnan 26 11

वो पल जब संदीप ने मौत को चुनौती दी

28 नवंबर 2008, रात करीब 1 बजे। एनएसजी की 51 स्पेशल एक्शन ग्रुप की टीम ताज की पुरानी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ रही थी। टीम लीड कर रहे थे मेजर संदीप उन्नीकृष्णन। अचानक ऊपर से ग्रेनेड आया, फिर AK-47 की बौछार। कमांडो सुनील यादव बुरी तरह घायल होकर सीढ़ियों से लुढ़क गए। संदीप दौड़े, सुनील को देखा, साथी को पीछे भेजा और अकेले ऊपर की ओर बढ़ गए। साथियों ने रोका तो सिर्फ इतना कहा - 'Don't come up... मैं इन सबको देख लूंगा।'

वो आखिरी बार सुने गए उनके शब्द थे। उसके बाद जो हुआ, वो भारतीय सेना के इतिहास की सबसे वीर गाथाओं में से एक है। संदीप अकेले पाम लाउंज और बॉलरूम की तरफ बढ़े। एक आखिरी ग्रेनेड फेंका, खिड़कियां चूर-चूर कर दीं और आतंकियों पर टूट पड़े। गोलियां उनके शरीर को छलनी कर गईं। निचले जबड़े से सिर तक एक गोली ने सब खत्म कर दिया। लेकिन जाते-जाते उन्होंने एक आतंकी को ऐसा जख्मी किया कि उसका खून से सना जूता वहीं छूट गया। उनकी शहादत ने आतंकियों का रास्ता रोक दिया। बाकी कमांडोज को मौका मिला और ऑपरेशन पूरा हुआ।

वो 14 जिंदगियां जिन्हें संदीप ने नया जीवन दिया

ताज के डेटा सेंटर में 36 घंटे से ज्यादा वक्त से प्रिया फ्लोरेंस मार्टिस और उनका साथी मनीष छिपे थे। न खाना, न पानी, बस मौत का इंतज़ार। संदीप की बहादुरी की वजह से ही कमांडोज उस हिस्से तक पहुंच पाए। उन्हीं की टीम ने प्रिया, मनीष और 12 अन्य बंधकों को जिंदा बाहर निकाला। 14 जिंदगियां... जिनके लिए संदीप आज भी जीवित हैं।

बचपन से शहादत तक - संदीप की पूरी कहानी

15 मार्च 1977, केरल के कोझिकोड में जन्म। पिता के. उन्नीकृष्णन इसरो में रिटायर्ड ऑफिसर, मां धनलक्ष्मी गृहिणी। बाद में परिवार बेंगलुरु शिफ्ट हुआ। फ्रैंक एंटनी पब्लिक स्कूल में पढ़ाई। स्कूल के प्रिंसिपल क्रिस्टोफर ब्राउनी आज भी याद करते हैं - 'संदीप बचपन से कमांडो कट हेयर रखता था। कहता था - मैं बड़ा होकर आर्मी जॉइन करूंगा।'

1999 में लेफ्टिनेंट बनते ही करगिल भेज दिया गया। 31 दिसंबर 1999 की रात - सिर्फ 6 जवानों के साथ पाकिस्तानी पोस्ट पर हमला किया, 200 मीटर आगे बढ़कर तिरंगा लहराया। 2005 में मेजर बने, घातक कोर्स टॉप किया, फिर एनएसजी में चुने गए। ऑपरेशन विजय, पराक्रम, रक्षक, ब्लैक टॉर्नेडो - हर जगह उनकी बहादुरी की गूंज थी।

नवंबर 2008 में पापा को फोन किया था -

'17 दिसंबर को घर आ रहा हूं, दोस्त की शादी है।' रिटर्न टिकट 30 दिसंबर की थी। पर 26 नवंबर को ड्यूटी लगी मुंबई। पापा को सिर्फ इतना कहा - 'मुंबई में हालात खराब हैं, दुआ करना।' यह उनका आखिरी फोन था।

वो दिन जब बेंगलुरु का आसमान भी रो पड़ा

29 नवंबर 2008। संदीप का पार्थिव शरीर बेंगलुरु पहुंचा। हजारों लोग सड़कों पर। उस दिन बेंगलुरु में काले बादल छा गए, बारिश होने लगी। अखबारों ने लिखा - 'धरती ही नहीं, आसमान भी अपने जांबाज बेटे के लिए रो रहा है।'

सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार। मरणोपरांत देश के सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार - अशोक चक्र से सम्मानित किया। बेंगलुरु में एक फ्लाईओवर, एक रोड, एक सोसाइटी - सब उनके नाम पर। ताज के जिस बॉलरूम में उन्होंने आखिरी सांस ली, वहां उनकी याद में एक स्मृति फलक आज भी है।

आज भी गूंजता है उनका नाम

हर 26 नवंबर को जब हम मोमबत्ती जलाते हैं, जब हम उन 166 शहीदों को याद करते हैं, तो सबसे ऊंची आवाज़ में एक नाम गूंजता है - मेजर संदीप उन्नीकृष्णन। क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया - हीरो फिल्मों में नहीं, असल जिंदगी में पैदा होते हैं। और जब देश पर बन आए, तो वो अकेले भी पूरी फौज बन जाते हैं।

संदीप नहीं रहे, पर उनकी वो आखिरी दहाड़ आज भी ताज की दीवारों में गूंजती है - 'मैं देख लूंगा...' जय हिंद। सैल्यूट, मेजर संदीप उन्नीकृष्णन।

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