मीराबाई चानू के लिए 'Good Luck' साबित हुईं सोने की बालियां, मां ने अपने गहने बेचकर दी थीं गिफ्ट

नई दिल्ली, जुलाई 24: भारतीय वेटलिफ़्टर मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। वेटलिफ्टिंग में ये भारत का सबसे बड़ा पदक है। मीरबाई से पहले वेटलिफ्टिंग में करनम मलेस्वरी ने ब्रॉन्ज मेडल जीता था। लेकिन मीराबाई के लिए सिल्वर मेडल तक का सफर कतई आसान नहीं रहा। वेटलिफ्टिंग के शानदार प्रदर्शन के दौरान मीराबाई द्वारा कानों में पहनी ओलंपिक के छल्लों के आकार की बालियों ने सभी का ध्यान खींचा, जो उनकी मां ने पांच साल पहले अपने जेवर बेचकर उनके लिए बनवाई थी।

 मां सेखोम ओंग्बी तोम्बी लीमा ने दी थीं बालियां

मां सेखोम ओंग्बी तोम्बी लीमा ने दी थीं बालियां

मीराबाई को कानों की ये बालियां उनकी मां सेखोम ओंग्बी तोम्बी लीमा ने दी थीं। जो उन्होंने पांच साल पहले अपने जेवर बेचकर बनवाई थीं। मीराबाई की मां को उम्मीद थी कि इससे उनका भाग्य चमकेगा। रियो 2016 खेलों में ऐसा नहीं हुआ, लेकिन मीराबाई ने शनिवार सुबह टोक्यो खेलों में पदक जीत लिया और तब से उनकी मां सेखोम ओंग्बी तोम्बी लीमा के खुशी के आंसू रुक ही नहीं रहे हैं।

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    पदक जीतने के बाद रो पड़ीं मीरा की मां

    पदक जीतने के बाद रो पड़ीं मीरा की मां

    पदक जीतने के बाद मीरा की मां ने कहा कि, मैं बालियां टीवी पर देखी थी, मैंने ये उसे 2016 में रियो ओलंपिक से पहले दी थी। मैंने मेरे पास पड़े सोने और अपनी बचत से इन्हें बनवाया था, जिससे कि उसका भाग्य चमके और उसे सफलता मिले। इन्हें देखकर मेरे आंसू निकल गए और जब उसने पदक जीता तब भी। उसके पिता (सेखोम कृति मेइतेई) की आंखों में भी आंसू थे। खुशी के आंसू. उसने अपनी कड़ी मेहनत से सफलता हासिल की।

     मीरा की जीत देखकर निकले मां के आंसू

    मीरा की जीत देखकर निकले मां के आंसू

    उनकी मां ने कहा, उसने हमें कहा था कि वह स्वर्ण पदक या कम से कम कोई पदक जरूर जीतेगी। इसलिए सभी ऐसा होने का इंतजार कर रहे थे। दूर रहने वाले हमारे कई रिश्तेदार शुक्रवार शाम ही आ गए थे। वे रात को हमारे घर में ही रुके। उन्होंने कहा, कई आज सुबह आए और इलाके के लोग भी जुटे, इसलिए हमने टीवी बरामदे में लगा दिया और टोक्यो में मीराबाई को खेलते हुए देखने के लिए लगभग 50 लोग मौजूद थे।कई लोग आंगन के सामने भी बैठे थे। इसलिए यह त्योहार की तरह लग रहा था।

    मीरा ने भारत का 21 साल का इंतजार को खत्म किया

    मीरा ने भारत का 21 साल का इंतजार को खत्म किया

    मीराबाई की रिश्ते की बहन अरोशिनी ने कहा, वह (मीराबाई) बहुत कम घर आती है (ट्रेनिंग के कारण) और इसलिए एक-दूसरे से बात करने के लिए हमने व्हाट्सऐप पर ग्रुप बना रखा है। आज सुबह उसने हम सभी से वीडियो कॉल पर बात की और अपने माता-पिता से उसने आशीर्वाद लिया। मीराबाई को तोक्यो में इतिहास रचते हुए देखने के लिए उनके घर में कई रिश्तेदार और मित्र भी मौजूद भी मौजूद थे। मीराबाई ने महिला 49 किग्रा वर्ग में रजत पदक के साथ ओलंपिक में भारोत्तोलन पदक के भारत के 21 साल के इंतजार को खत्म किया और तोक्यो खेलों में भारत के पदक का खाता भी खोला।

    मीराबाई का बचपन पहाड़ से जलाने की लकड़ियां बीनने जाया करती थीं

    मीराबाई का बचपन पहाड़ से जलाने की लकड़ियां बीनने जाया करती थीं

    मणिपुर से आने वालीं मीराबाई चानू का जीवन संघर्ष से भरा रहा है। मीराबाई का बचपन पहाड़ से जलाने की लकड़ियां बीनने जाया करती थीं। मीराबाई बचपन में तीरंदाज यानी आर्चर बनना चाहती थीं,लेकिन कक्षा आठ की किताब में मशहूर वेटलिफ्टर कुंजरानी की स्टोरी ने उनके लक्ष्य को बदल दिया। इसके बाद उन्होंने वेटलिफ्टिंग करने का फैसला किया। उन्होंने 2014 में ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स में 48 किलो भारवर्ग में सिल्वर मेडल जीता। लगातार अच्छे प्रदर्शन की बदौलत उन्होंने रियो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर लिया था, लेकिन वे रियो में कोई मेडल ना जीत सकीं।

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