मनोज मुंतशिर ने भगवान राम पर लिखे तुलसीदास के दोहे पर की घटिया तुकबंदी, लोग बोले- तुम कवि कहलाने लायक नहीं
नई दिल्ली, 8 अप्रैल: कई हिट गाने लिख चुके गीतकार मनोज मुंतशिर अक्सर ही अपने बयानों को लेकर विवादों में आते रहते हैं। मनोज सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव हैं और लगातार कुछ ना कुछ पोस्ट करते हैं। दक्षिणपंथी विचारों के माने जाने वाले मनोज ने भगवान श्रीराम पर लिखे कवि तुलसीदास के एक दोहे में तुकबंदी करते हुए ट्वीट की है। जो लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं आई हैं, और इसको लेकर लोगों ने उनको जमकर खरी खोटी सुनाई है।

मनोज ने ट्वीट करते हुए लिखा- निम्नलिखित पद मेरा नहीं है, कहीं सुना तो सोचा आपको भी सुना दूँ. बहुत हुआ, "ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनिया". अब होना चाहिए, "धमक चलत रामभक्त फाटत पैजमिया"
मनोज मुंतशिर ने जो लाइनें शेयर की हैं, वो गोस्वामी तुलसीदास की भगवान राम के बचपन पर लिखी एक कविता का है। जिसमें वो नन्हें राम के चलने, उनकी पैजनिया बजने और इससे एक खुशी का वातावरण बन जाने का जिक्र करते हैं। वहीं मनोज ने क्रिएटिविटी दिखाते हुए इसमें जो बदलाव किया है, उसका अर्थ है- रामभक्त जब चलते हैं तो उनका पाजामा फटता है।

आलोक पुतुल ने इस पर कमेंट करते हुए कहा, ये महान कवि तुलसीदास की चौपाई है। इसका अर्थ है कि जब भगवान रामचंद्र ठुमक कर चलते हैं तो उनकी पैजनिया बजती है। कवि मनोज मुंतशिर के लिखे का अर्थ है कि जब राम भक्त धमक कर चलते हैं तो राम भक्तों का पैजामा फटता है।
पूजा त्रिपाठी ने इसको लेकर मनोज पर गुस्सा निकालते हुए लिखा- स्वयं गोस्वामी तुलसीदास के पद का जो माहौल तुमने उड़ाया है, यह घिनौना और विद्ररुप है। रामभक्त तुम कतई नहीं, कवि कहलाने के लायक भी नहीं।
लेखक अशोक पांडेय ने इस पर लिखा- राम के बचपन की जो सबसे सुंदर छवियाँ तुलसीदास ने खिंची हैं, उनमें से एक है - ठुमुकि चलत रामचंद्र... इस छवि को घृणित तुकबंदी से सिर्फ़ एक पतित व्यक्ति खंडित कर सकता है। दुख यही है कि पोलिटिकल खेमेबंदी के चलते इस नीच कृत्य को भी कुछ लोगों का समर्थन मिलेगा।

लेखक राहुल पंडित ने मनोज मुंतशिर को जवाब देते हुए लिखा- सॉरी मनोज, पजामा मानसिक रूप से विक्षिप्त लोग फाड़ते हैं, राम भक्त नहीं। ऐसे समय में जब राम के नाम पर चंद गुंडे दूसरे समुदाय की बहु-बेटियों के साथ बलात्कार करने की खुली धमकी दे रहे हैं, हमें ऐसी वाहियात क्रीएटिविटी से बचना चाहिए।

हरेश्याम शुक्ल ने लिखा- बाबा तुलसीदास की कालजयी रचना जिसमें प्रभु श्री राम की बाल लीला को दर्शाया गया है, जिसे सुनकर या देखकर कोई भी भारतीय हिन्दू, मुसलमान, सिख, बौद्ध और जैन सब आनंदित हो जाते हैं. उनका अपमान करते हुए तुम्हें शर्म भी न आई।












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