कांग्रेस को मात देकर हरियाणा में फिर सत्ता पर वापस लौटेगी बीजेपी!

बेंगलुरू। हरियाणा प्रदेश में पहली बार अपने दम पर सत्ता में पहुंची बीजेपी ने आरएसएस कैडर के मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा दांव खेला था। हालांकि मनोहर लाल खट्टर अपने पूरे कार्यकाल में कामकाज से कम अपने विवादित बयानों के लिए ज्यादा सुर्खियों में आए, लेकिन उनके कार्यकाल में हरियाणा में बेटियों की लिंगानुपात में हुई वृद्धि का श्रेय कोई उनसे नहीं छीन पाएगा। खट्टर के नेतृत्व में बीजेपी हरियाणा में दोबारा लौट सकती है, क्योंकि हरियाणा में कांग्रेस समेत विपक्ष बिखरा हुआ है।

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वर्ष 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के सहारे हरियाणा की वैतरणी पार करने वाली बीजेपी ने महज 4 वर्ष में बेटियों का लिंगानुपात का राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा कर बड़ी कामयाबी हासिल की है।हरियाणा में बेटियों के गर्भ में ही खत्म करने की प्रथा पुरानी थी, जिससे प्रदेश के युवाओं को शादी के लिए बेटियों की कमी हो गई थी, लेकिन खट्टर सरकार ने लिंगानुपात को बढ़ाने में सफलता पाई, क्योंकि बीजेपी सरकार से पूर्व हरियाणा की सत्तासीन सरकारों में बेटों की तुलना में बेटियों की संख्या राष्ट्रीय लिंगानुपात की संख्या में काफी कम थी, जो अब 900 के पार पहुंच गई है।

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वर्ष 2014 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने मोदी लहर में कुल 47 सीटें जीतने में कामयाब रही थी जबकि कई गुटों में बंट चुकी कांग्रेस 15 सीट जीतकर तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है। वहीं, इनलो 19 सीटों पर सीट दर्ज कर दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी। वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने हरियाणा में जोरदार प्रदर्शन करते हुए कुल 10 लोकसभा सीट जीतने में कामयाब रही। हरियाणा को लोकसभा चुनाव 2019 में मिली इतनी बड़ी सफलता के लिए कांग्रेस में गुटबाजी को जिम्मेदार ठहराया गया। माना जा रहा है कि गुटों में बंटी हरियाणा कांग्रेस और इनलो को विधानसभा में भी बीजेपी आसानी से परास्त कर देगी।

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जानकार बताते हैं कि हरियाणा कांग्रेस के बड़े सभी नेता ख़ुद को सीएम पद पर देखना चाहते हैं और पार्टी के लिए काम करने की इच्छा उनमें कम दिखाई देती है। कांग्रेस में गुटबंदी का आलम यह था कि लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान कांग्रेस अपनी ज़िला ईकाई भी गठित कर सकी है और बिना संगठन के चुनाव में उतरी कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा। अभी भी कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष गुटबाजी में बंटा हुआ है, जिसका सीधा फायदा मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में बीजेपी को मिलता हुआ दिख रहा है।

2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इसके अलावा जाट बनाम ग़ैर-जाट के मुद्दे ने जीतने में खूब मदद की थी। एक ओर जहां कांग्रेस में गुटबाज़ी के चलते वोटरों को एक साथ नहीं कर पाई, दूसरी ओर इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) भी बिखरा हुआ था, जिससे आए शून्यता को बीजेपी ने कैश कर लिया, क्योंकि जाटों के वोट इनेलो और कांग्रेस की दुविधा में बंट गए, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को हुआ। बीजेपी कुल 58 फीसदी वोट हासिल करने में कामयाब रही है। हरियाणा विधानसभा चुनाव एकदम नजदीक है और अभी तक कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी और इनलो समेत अन्य विपक्ष में बिखराव खत्म नहीं हो सका है।

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गौरतलब है कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व से नाराजगी के चलते हरियाणा में चार बार मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कांग्रेस आलाकमान को अपनी ताकत दिखाने के लिए रोहतक में एक महारैली का आयोजन किया, जिसमें प्रदेश कांग्रेस संगठन नेताओं को छोड़िए, शीर्ष नेतृत्व तक को नहीं पूछा गया। यहां तक कि महारैली में लगाए गए पोस्टरों से भी कांग्रेस आलाकमान की तस्वीर गायब थी।

हु़ड्डा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अशोक तंवर के साथ किसी प्रकार का समझौता करने को राजी नहीं है, इसीलिए रैली करके उन्होंने शक्ति प्रदर्शन किया। ऐसी भी खबरें सुर्खियां बनीं कि अगर शीर्ष नेतृत्व ने उनकी बात नहीं मानीं तो वो अलग रास्ता भी चुन सकते हैं।

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हालांकि नाराजगी की अटकलों के बीच 29 अगस्त को हुड्डा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हुड्डा के आगे नतमस्तक हो गई। सोनिया गांधी ने अशोक तंवर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष से हटाकर कुमारी सैलजा को अध्यक्ष कर दिया और हुड्डा को विधानसभा में विपक्ष के नेता के साथ साथ चुनाव प्रबंधन कमेटी के प्रमुख भी बनाया गया।

कांग्रेस आलाकमान के इस फैसले को हुड्डा की नाराजगी और राज्य के पार्टी नेताओं के आपसी कलह को दूर करने के प्रयास के तौर पर देखा गया, क्योंकि हरियाणा में विधानसभा चुनाव तीन महीने बाद दिसंबर में हो सकते हैं और सोनिया गांधी हरियाणा में गुटबाजी के चलते हुए नुकसान को भूली नहीं हैं।

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उल्लेखनीय है हरियाणा में बीजेपी ने वर्ष 2009 विधानसभा से लगातार अपने वोट शेयर में बड़ा इज़ाफ़ा किया है। 2009 में जहां बीजेपी के पास महज़ 9 फीसदी वोट थे और सिर्फ़ 4 सीटें जीती थी, लेकिन वर्ष 2014 में विधानसभा चुनाव में बिखरे हुए और गुटों में बदले कांग्रेस के चलते 47 सीटें जीतकर प्रदेश में पहली बार बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही।

वर्ष 2014 विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर वर्ष 2009 की तुलना में 9 फीसदी से बढ़कर 34.7 फीसदी हो गया, जो तकरीबन वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनावों के वोट शेयर के आस-पास ही था। हालांकि इसका श्रेय मोदी लहर को अधिक दिया जाता है। 2019 लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने कुल 58 फीसदी वोट हासिल किए हैं और कांग्रेस ने 28 फीसदी ही वोट शेयर हासिल कर पाई। माना जा रहा है कि कांग्रेस को बीजेपी को विधानसभा में टक्कर देने के लिए करीब 30 फीसदी वोट शेयर का अंतर पाटना होगा।

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अक्टूबर 2018 को हरियाणा में बीजेपी सरकार के चार साल पूरा होने पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अपने कामकाज का लेखाजोखा पेश करते हुए उन्होंने हरियाणा में चौतरफा विकास करने का दावा किया, लेकिन पिछले चार वर्ष के कार्यकाल में उनके कामकाज से ज्यादा खट्टर के बेतुके और विवादित बयान अधिक चर्चा में रहे।

हालांकि खट्टर सरकार के प्रयासों से पहली बार प्रदेश के लिंगानुपात में वृद्धि हुई जब बेटों की तुलना में बेटियों की संख्या में इजाफा देखा गया। हरियाणा प्रदेश में लिंगानुपात अब 900 पहुंच गया है जबकि राष्ट्रीय लिंगानुपात 933 है। हालांकि खट्टर सरकार बीजेपी के कार्यकाल में प्रदेश में भ्रष्टाचार के मामले में 32फीसदी कमी और सिस्टम को पारदर्शी बनाने का दावा भी करती है।

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हालांकि खट्टर सरकार के कामकाज की चर्चा उतनी नहीं हो सकी, जितनी दिए गए विवादित बयानों की हुई। वहीं, जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान उपद्रव, रामपाल और राम रहीम की गिरफ्तारी के दौरान हिंसा के अलावा गेस्ट टीचरों और जेबीटी की नियुक्ति मामले में खट्टर सरकार की खूब किरकिरी हुई, लेकिन सीएम विंडो या बायोमेट्रिक अटेंडेंस और पुलिस रिफॉर्म की पहल का श्रेय खट्टर सरकार से कोई नहीं छीन सकेगा।

माना जाता है कामकाज से अधिक ऊल-जुलूल की बयानबाजी के चलते सीएम मनोहर लाल खट्टर कई बार फजीहत का सामना करना पड़ा वरना हरियाणा की खट्टर सरकार ने पिछली सरकारों से बेहतर काम कर दिखाया है। इनमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद उनके कश्मीर बहू वाले विवादित बयान और बलात्कार को लेकर दिए गए उनके बयान प्रमुख हैं।

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