Manmohan singh government scams: वो घोटाले जो मनमोहन सिंह सरकार के पतन का कारण बने
Manmohan singh government scams: भारत के पूर्व प्रधामनंत्री और दिग्गन कांग्रेसी नेता डॉ मनमोहन सिंह का गुरुवार की रात निधन हो गया। 92 वर्षीय मनमोहन सिंह का देश 2004 से 2014 तक लगातार दो कार्यकाल तक प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने वाले मनमोहन सिंह की छवि एक सफल राजनेता से अधिक एक सफल अर्थशास्त्री की रही है। जिन्हें देश में आई सबसे बड़ी मंदी से भारत को उबारने का श्रेय दिया जाता है।
हालांकि मनमोहन सिंह के दस साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल में कई बड़े-बड़े घोटाले हुए जिसके कारण से मनमोहन के प्रतिनिधित्व वाली पूर्व की यूपीए सरकार भाजपा के निशाने पर आती रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तो मनमोहन सरकार के दस साल के कार्यकाल पर एक श्वेत पत्र भी जारी कर चुकी हैं जिसमें मनमोहन सरकार में हुए 15 घोटालों का जिक्र किया था। आइए जानते हैं कौन से वो घोटाले हैं, जो मनमोहन सरकार के पतन का कारण बने थे?

2G टेलीकॉम घोटाला (2G Scam)
2 जी टेलीकॉम जिसे स्पेक्ट्रम घोटाले के नाम से भी जाना जाता है। मनमोहन सरकार में हुआ ये घोटाला अब तक के सबसे घोटालों में से एक है। 2010 में हुए इस घोटाले में 14 लोगों और तीन कंपनियों पर 76 हजार करोड़ का घोटाला करने का आरोप था। इससे 1.76 लाख करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का नुकसान हुआ था। आरोपियों में पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम समेत अन्य कई नामी नेता और टेलिकॉम कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी का नाम शामिल था। इस घोटाले में 122 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस बेचे और आवंटित किए गए थे जो टेलीकॉम ऑपरेटरों को फायदा पहुंचाने वाले थे।इस घोटाले में नीलामी करने के बजाय पहले आओ पहले की नीति पर लाइंसेस आवंटित किए गए थे।
कोयला घोटाला (coal scam)
2012 में ये घोटला सामने आया था। मनमोहन सरकार द्वारा प्राइवेट कंपनियों को कैप्ट्विव के लिए कोयला ब्लॉकों के आवंटट में भ्रष्टाचार और अनियमिता पाई गई थी। ये मामाला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और कोर्ट ने अपने आदेश में 2024 आवंटनों को रद्द कर दियाथा। सीएजी के अनुमान के अनुसार इस घोटाले से सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ का नुकसान हुआ था। 14 अरोपियों को अब तक लोअर कोर्ट ने सजा सुना दी है बाकी का मामला अभी भी कोर्ट में चल रहा है।
कॉमनवेल्थ गेम घोटाला (CWG)
कॉमनवेल्थ गेम घोटाला जिसे हिंदी में राष्ट्रमंडल खेल घोटाला के नाम से जाना जाता है। ये मनमोहन सरकार में हुए सबसे बड़े हुए घोटाले में से एक है। जिसकी वजह से मनमोहन सरकार जमकर विपक्ष के निधाने पर आ गई थी। दरअसल तत्कालीन मनमोहन सरकार ने दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन करवाया था। इन खेलों से जुड़ी कई योजनाएं और प्रोजेक्ट में बड़े स्तर का भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता हुई थी।
फरवरी 2013 सीबीआई की विशेष अदालत ने प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत पाए और सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था। आरोपियों पर धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 900 मिलियन रुपये से अधिक का नुकसान पहुंचाने का आरोप तय हुआ था। इस मामले में 8 मामलों में आरोप-पत्र दायर हुए थे। ये माममे दिल्ली की कोर्टों में अभी भी लंबित चल रहे हैं।
आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला (Adarsh Housing Society Scam)
मनमोहन सरकार में हुआ घोटाला रक्षा लैंड प्रोजेक्ट के तहत अपार्टमेंट के आवंटन से जुड़ा था। दरअसल, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी मुंबई के कोलाबा में 31 मंजिला अपार्टमेंट की बिल्डिंग है। इस बिल्डिंग में 1999 में कारगिर युद्ध के युद्धनायकों और युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं को दिया जाना था लेकिन इस इमारत के फ्लैट नौकरशाह, राजनेताओं और उनके रिश्तेदार रहने लगे। जबकि कारगिल युद्ध से इन सबका कोई लेना-देना नहीं था।
वाड्रा डीएलएफ लैंड डील (Vadra land deal)
रियल स्टेट से जुड़ा हुआ ये मामला कांग्रेस सुप्रीमों सोनिया गांधी के इकलौते दामाद यानी कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा से जुड़ा है। जिसके कारण कांग्रेस और गांधी परिवार आज भी भाजपा के निशाने पर है। दरअलस, रॉबर्ट वाड्रा और भारत के रियल एस्टेट डेवेलपर कंपनी डीएलएफ लैंड डील के बीच हुआ था।
वाड्रा क कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने गुडगांव के मानेसर, शिकोहपुर में ओंकारेश्वर से जमीन साढ़े सात करोड़ में खरीदी थी। साढ़े तीन एकड़ जमीन का म्यूटेशन दूसरे ही दिन वाड्रा की कंपनी के पक्ष में कर दिया गया और महज एक दिन अंदर वाड्रा को जमीन के मालिकाना हक भी ट्रांसफर कर दिए गए। चूंकि उस समय हरियाणा और पंजाब में कांग्रेस सरकार थी इसलिए एक दिन में वाड्रा को ये जमीन और म्यूटेशन मिल गया।
जमीन ट्रांसफर करने के बाद आवासीय प्रोजेक्ट के लिए की परमीशन मिलते ही जमीन की कीमत कई गुना बढ़ जाती है। दो महीने बाद ही वाड्रा की कंपनी से 2008 में डीएलएफ ये जमीन 58 करोड़ में खरीदती है। यानी महज चंद महीनों में सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी को 700 प्रतिशत से ज्यादा मुनाफा होता है। 2012 में भूपेंद्र हुड्डा की सरकार ने सरकारी कॉलोनी के निर्माण के लिए लाइंसेंस डीएलएल को ट्रांसफर कर दिया था। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए ये घोटाला लाभकारी साबित हुआ और चुनावों कांग्रेस को करारी हार सामना करना पड़ा और मोदी सरकारी आस्तित्व में आई।
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