ममता बनर्जी का 'स्ट्रीट फाइटर' के रूप में लौटना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती!
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नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलकाता के मेट्रो चैनल पर केंद्र सरकार के खिलाफ धरना पर बैठी हैं। ममता बनर्जी का आरोप है कि सीबीआई केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही है। पश्चिम बंगाल में 34 साल तक राज करने वाली लेफ्ट सरकार को 2011 में सत्ता से बेदखल करने से पहले उनकी छवि 'स्ट्रीट फाइटर' की रही है। सूबे की सीएम होने होने के बाद भी उन्होंने अपने भूमिका में लौटने का लौटने का फैसला लिया है और वो सड़क पर उतर चुकी हैं। ये भारतीय जनता पार्टी के लिए चिंता की बात है, विशेषतौर पर तब जब पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री केंद्र सरकार पर राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप लगाने के बाद विपक्ष को भाजपा के खिलाफ एकजुट कर रही हैं।

क्या है ताजा विवाद
ममता बनर्जी और मोदी सरकार के बीच ताजा विवाद उस समय हो रहा है जब देश तीन महीने बाद नई केंद्र सरकार चुनने जा रहा है। चुनाव पूर्व केंद्र की कटुता राज्यों में शासित विपक्षी पार्टियों के साथ बढ़ती जा रही है, विशेषतौर पर बंगाल में ममता बनर्जी और दिल्ली में केजरीवाल के साथ। इन दोनों ने भाजपा के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। तृणमूल कांग्रेस सरकार के साथ ताजा विवाद की शुरुआत रविवार को हुई, जब केंद्रीय जांच एजेंसी(सीबीआई) की टीम कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ के लिए कोलकाता पहुंची। सीबीआई राज्य के चिटफंड मामलों, जिसमें सारदा केस भी शामिल है, उनसे पूछताछ करने आई थी। कोलकाता पुलिस ने इससे पहले ही उन्हें हिरासत में ले लिया और बाद में रिहा कर दिया। इसके बाद सोमवार को राज्य सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची। मीडिया रिपोट्स के मुताबिक वो राज्यपाल से भी इस मामले में शिकायत करेगी। ममता ने अपनी आक्रामक राजनीतिक स्टाइल के तहत इसके बाद कोलकाता पुलिस आयुक्त के घर में घुसने की सीबीआई की योजना का विरोध करते हुए अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। इस बीच, भाजपा नेताओं ने राज्य में कानून और व्यवस्था की खराब स्थिति का हवाला देते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है ।अगर इतिहास देखा जाए तो ममता बंगाल में लेफ्ट के खिलाफ आक्रामक चेहरों में एक थी। उस समय वो इसी तरह सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करती थी। इस स्थिति में धरना के एक बड़ी कोशिश थी। इस तरह से वो भाजपा को संदेश दे रही है कि आने वाले चुनावों में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती हैं।

ममता राइटर्स बिल्डिंग में धरने पर बैठी
अगर इतिहास की गहराई में उतर कर देखा जाए तो ममता बनर्जी की आक्रामक रणनीति इसे प्रमाणित करती है। तारीख सात जनवरी 1993, ममता बनर्जी तब यूथ कांग्रेस की नेता थी। तब वो राइटर बिल्डिंग में घुस गई थी। वो तब के सीएम ज्योति बसु के चैंबर के सामने धरने पर बैठ गई थी। वो रेप के एक मामले में रेप पीड़िता के लिए न्याय की मांग कर रही थी। इतना ही नहीं तनाव बढ़ने के बावजूद ममता ने अपना धरना नहीं खत्म किया और ज्योति बसु के
ऑफिस के बाहर तब तक धरने पर बैठी रही जब तक पुलिस ने उन्हें बाल घसीटते हुए बिल्डिंग से बाहर नहीं फेंका। बाद में उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। इस घटना का अंत यहीं नहीं हुआ। इस घटना के 17 साल बाद मनीष गुप्ता, जिन्होंने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था, वो तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए। ममता ने उन्हें जादवपुर सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टटाचार्य के खिलाफ चुनाव में खड़ा किया।

24 अगस्त 2008 को धरने पर ममता
24 अगस्त 2008 को ममता कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया(मार्क्सवादी) पार्टी के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टटाचार्य की अगुवाई वाली लेफ्ट सरकार के खिलाफ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गई। ममता लेफ्ट सरकार के उस फैसले के खिलाफ धरने पर बैठी थी, जिसमें सरकार ने टाटा मोर्टस को नैनो कार के उत्पादन के लिए 1000 एकड़ जमीन किसानो से अधिग्रहित करके दी थी। इस फैसले की बुरी कीमत लैफ्ट को चुकानी पड़ी और ममता पश्चिम बंगाल में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा बन गईं। इसके बाद चुनावों में लेफ्ट को इसका खामियाजा चुनाव हार कर भुगतना पड़ा। भाजपा को इस तथ्य से भलीभांति परिचित होने चाहिए कि उन्होने विपक्षी पार्टी को मात दी है। ये उनकी आक्रामक राजनीति है, जिसे राजनेता के तौर पर उन्होंने इस्तेमाल किया है। यही कारण था कि 2011 में उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री के रूप में शासन करने की उनकी क्षमता पर सवाल भी उठे थे। उस समय इस सवाल पर व्यापक रूप से बहस हुई थी कि क्या ममता बनर्जी स्ट्रीट फाइटर की अपनी छवि बदलकर अच्छी प्रशासक साबित होंगी।

उन्होंने अपनी पार्टी को दो चुनावों में लगातार जीत दिलाई है। शासन करने की उसकी क्षमता अब इस तरह के एक सवाल का मतलब नहीं है क्योंकि ये 2011 से पहले की बात थी। भाजपा ने उन्हें सड़क पर लाने के लिए ये सब किया है। लेकिन ये एक बात है जिस पर भाजपा को चिंता करनी चाहिए। 2019 का चुनाव विपक्ष के नेताओं को घेरने के साथ-2 , धर्म और जाति पर भी लड़ा जाएगा। एक ऐसा राज्य जो राजनीतिक हिंसा के लिए जाना जाता है वो लगता है कि इस चुनाव में और इस तरह की हिंसा में धकेला जा सकता है। अब सवाल ये कि ममता बनर्जी इससे कैसे निपटेंगी? इस धरने से वो केजरीवाल की तरह आंदोलनकारी की भूमिका में खिसक जाएगी और आक्रामक भाजपा को मात देने की कोशिश करेंगी।












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