Malegaon Blast Case: 'मोहन भागवत को अरेस्ट करने का आदेश था', मालेगांव केस पर EX ATS अफसर का बड़ा खुलासा
Mehboob Mujawar on Malegaon blast case: 2008 के मालेगांव विस्फोट केस को लेकर एक चौंकाने वाला दावा सामने आया है। महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) की उस शुरुआती जांच टीम के सदस्य रहे रिटायर्ड इंस्पेक्टर मेहबूब मुजावर ने अब एक बड़ा खुलासा किया है। उनका कहना है कि मालेगांव ब्लास्ट की जांच के दौरान उन्हें कुछ कॉन्फिडेंशियल ऑर्डर दिए गए थे, जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने का निर्देश भी शामिल था।
मुजावर के मुताबिक, यह सब कुछ "भगवा आतंकवाद" की कहानी गढ़ने के लिए किया जा रहा था। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने इन आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें यह "भयानक" और "तथ्यों से परे" लगा।

मुजावर का यह बयान ऐसे समय आया है जब स्पेशल एनआईए कोर्ट (NIA Court) ने गुरुवार को मालेगांव विस्फोट (Malegaon Blast Case) मामले में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। यह फैसला 17 साल बाद आया है, जब 29 सितंबर 2008 को रमजान के महीने में महाराष्ट्र के मुस्लिम-बहुल इलाके मालेगांव में एक धमाका हुआ था। इस धमाके में 6 लोगों की मौत और 101 लोग घायल हुए थे।
"ATS की जांच फर्जी थी, सच्चाई सामने आ गई है"
कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए रिटायर्ड इंस्पेक्टर मेहबूब मुजावर ने कहा कि यह फैसला उन "झूठी चीजों" को उजागर करता है जो उस समय ATS ने की थीं। उन्होंने कहा कि यह फैसला उस फर्जी जांच को बेनकाब करता है, जो फर्जी अफसरों ने की थी।
मुजावर ने कहा कि उन्हें एक बार आदेश मिला था कि "जा कर मोहन भागवत को पकड़ लाओ।" हालांकि, उन्होंने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह जानते थे कि "हकीकत क्या है" और यह आदेश "भयावह" था।
"आदेश नहीं माने, तो झूठा केस दर्ज किया"
मेहबूब मुजावर ने बताया कि उन्हें राम कालसंगरा, संदीप डांगे, दिलीप पाटीदार और मोहन भागवत जैसे लोगों के संबंध में गोपनीय आदेश दिए गए थे। लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ये सभी आदेश ऐसे नहीं थे जिनका पालन किया जा सके। एक ऐसे कद्दावर शख्स को पकड़ना मेरी क्षमता से बाहर था।
उन्होंने आगे दावा किया कि उन्होंने इन आदेशों को मानने से इनकार कर दिया और इसके परिणामस्वरूप उनके खिलाफ एक फर्जी मामला दर्ज कर दिया गया, जिसने उनकी 40 साल की पुलिस सेवा को तबाह कर दिया। मुजावर ने जोर देकर कहा कि, "भगवा आतंकवाद जैसा कुछ भी नहीं था। सब कुछ फर्जी था।" उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास अपने दावों को साबित करने के लिए दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं।
एनआईए की जांच में फंसा मामला
गौरतलब है कि मालेगांव विस्फोट की जांच पहले ATS के पास थी, लेकिन बाद में इसे नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) को सौंप दिया गया था। एनआईए कोर्ट में चल रहे मुकदमे के दौरान कई गवाह मुकर गए और सबूतों की कमी के चलते साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित समेत सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया गया।
मुजावर के इस बयान से मालेगांव केस पर एक बार फिर से राजनीतिक बहस छिड़ गई है। "हिंदु आतंकवाद" शब्द का इस्तेमाल पहली बार इस केस के दौरान प्रमुखता से हुआ था और इसने देश की राजनीति में ध्रुवीकरण ला दिया था। अब, जब कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है और जांच पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, तब पूर्व ATS अधिकारी के ये बयान पूरे मामले को एक नए मोड़ पर ले जाते हैं।
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