Mahatma Jyotiba Jayanti: महिला शिक्षा के प्रखर समर्थक थे महात्मा फुले, हमारे लिए इतना प्रेरणादाई है उनका जीवन
Mahatma Jyotiba Phule Jayanti 2025: भले ही आज देश में सरकार बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान चला रही है लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में एक ऐसा व्यक्ति था जिसने आज से लगभग 175 साल पहले ही महिला शिक्षा की बात कही थी। ये महान व्यक्तित्व थे महात्मा ज्योतिबा फुले जिन्होंने कहा था कि, "देश में जब तक महिलाएं शिक्षित नहीं होंगी, समाज आगे नहीं बढ़ सकता।"
आज, 11 अप्रैल को पूरा देश महात्मा जोतिराव गोविंदराव फुले की जयंती मना रहा है। महाराष्ट्र में जन्में फुले का पूरा जीवन सामजिक कुरितियों से लड़ते ही बीता था। उनके जयंती विशेष पर आईए जानते हैं उनके प्रेरणादायक जीवन की कहानी...

Mahatma Jyotiba Jayanti: समाज को समर्पित रहा पूरा जीवन
महात्मा ज्योतिबा फुले का नाम भारतीय सामाजिक सुधार आंदोलन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। 19वीं शताब्दी के इस महान विचारक, समाजसेवी और सुधारक ने जाति, वर्ग और लिंग के अन्यायपूर्ण भेदभाव के विरुद्ध जिस साहसिकता से आवाज उठाई, वह आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने 'एग्रीकल्चर एक्ट' पास किया।
महात्मा फुले का महिला शिक्षा के प्रति समर्पण और दूरदर्शिता वो भी एक ऐसे युग में जब महिलाओं को पढ़ना-लिखना पाप माना जाता था, अकल्पनीय था। सिर्फ महिला साक्षरता पर ही नहीं बल्कि महिलाओं और लड़कियों से जुड़ी बाल विवाह, विधवा विवाह, जैसी हर कुरीतियों का उन्होंने पुरजोर विरोध किया।
Mahatma Jyotiba Jayanti :प्रारंभिक जीवन और विचारों की नींव
ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। वे माली जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे उस समय सामाजिक रूप से पिछड़ा और निम्न माना जाता था। उनके नाम में जुड़ा 'फुले' भी उनकी जाति से पड़ा था। प्रारंभ से ही फुले ने देखा कि समाज में ऊँच-नीच का बोलबाला है और महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय है।
उन्होंने पढ़ाई के दौरान अनुभव किया कि शिक्षा का अधिकार केवल उच्च जातियों और पुरुषों तक सीमित था। यही अनुभव उनके भीतर परिवर्तन की भावना को जन्म देने वाला बना। मराठी भाषा में प्रारंभिक शिक्षा लेने वाले ज्योतिराव ने उस दौर में अपनी पत्नी को भी शिक्षित किया था उनका ये कदम कई लोगों को नागवार गुजरा और समाजिक तौर पर उनका भारी विरोध हुआ था।
Jyotiba Phule ने खोला महिला शिक्षा के लिए पहला स्कूल
महात्मा फुले ने जब यह देखा कि समाज में लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है, तो उन्होंने ठान लिया कि इस असमानता को दूर करना होगा। 1848 में उन्होंने पुणे में देश का पहला लड़कियों का स्कूल शुरू किया यह कदम न सिर्फ क्रांतिकारी था बल्कि अत्यंत साहसी भी, क्योंकि उस समय समाज के अधिकांश लोग महिला शिक्षा के खिलाफ थे। वे मानते थे कि पढ़ी-लिखी महिलाएं 'धर्म भ्रष्ट' कर देंगी।
जब इस विद्यालय में पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक राजी नहीं हुआ तब उन लड़कियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने उठाई। वो भारत की पहली महिला शिक्षिका हैं। इस स्कूल में दलित और शूद्र वर्ग की बच्चियों को भी पढ़ाया जाता था यह कदम सामाजिक क्रांति का प्रतीक बन गया।
सामाजिक विरोध, अपमान और संघर्ष की कहानी
- ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरम्भ कराया और इसे मुंबई उच्च न्यायालय से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे।
- साल 1848 में ज्योतिबा फुले एक ब्राह्मण मित्र की शादी में गये हुए थे। यहां पर छोटी जाति का होने के कारण उनका खूब अपनान किया गया। उसी समय उन्होंने सामाजिक असमानता को जड़ से उखाड़ फेंकने की कसम खाई थी।
- ज्योतिराव ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने पहली बार 'दलित' शब्द का प्रयोग किया था। बाबा साहेब अंबेडकर भी महात्मा फुले के विचारों से प्रेरित थे।
- महात्मा फुले को उनके कार्यों के लिए समाज से तीव्र विरोध झेलना पड़ा। उन पर और उनकी पत्नी पर कीचड़ फेंका गया, अपशब्द कहे गए, यहां तक कि उन्हें अपने घर से निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका मानना था कि "स्त्री और पुरुष दोनों के समान विकास के बिना समाज की उन्नति अधूरी है।"
- महात्मा ज्योतिबा फुले का कहना था कि "यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं, तो आप एक व्यक्ति को शिक्षित करते हैं; लेकिन यदि आप एक स्त्री को शिक्षित करते हैं, तो आप पूरे परिवार को शिक्षित करते हैं।" उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के लिए 3 स्कूल खोले।
- फुले दंपति की सामाजिक सुधार में अमुल्य योगदान देख कर ज्योतिराव को 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में 'महात्मा' की उपाधि दी गई।
सत्यशोधक समाज की स्थापना
1873 में महात्मा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इसका उद्देश्य था - जातिगत भेदभाव का अंत, स्त्रियों और शूद्रों को समान अधिकार दिलाना और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना। यह संगठन महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ-साथ विधवा पुनर्विवाह और बाल विवाह उन्मूलन जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी सक्रिय रहा।
साहित्य की ओर विशेष झुकाव
ज्योतिराव फुले साहित्य प्रेमी भी थे उन्होंने अपने जीवन काल में कई पुस्तकें भी लिखीं। गुलामगिरी, तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत ये किताबें आज भी लिट्रेचर में प्रासंगिक मानी जाती हैं।
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