महाराष्‍ट्र-हरियाणा चुनाव: अगर बीजेपी से छिटके जाट और मराठा तो बिगड़ सकता है खेल!

बेंगलुरु। हरियाणा और महाराष्‍ट्र में विधानसभा चुनाव परिणाम से पहले ही भारतीय जनता पार्टी दोनों राज्यों में सत्ता वापसी को लेकर निश्चिंत हैं। लेकिन उसकी चिंता अधिक अधिक से सीट जीतने की हैं। भाजपा को मालूम हैं कि अगर महाराष्‍ट्र में मराठी और हरियाणा में जाटों का पूरा साथ नहीं मिला तो उसकी सत्ता में दोबारा वापसी का जश्‍न फीका पड़ सकता हैं। इसीलिए भाजपा चुनाव-प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी हैं। बता दें हरियाणा की सियासत में यदि जातिगत समीकरणों पर नजर डालें तो प्रदेश में करीब 17 प्रतिशत से अधिक वोट जाट बिरादरी के हैं। वहीं महाराष्ट्र की सियासत में मराठा समुदाय किंगमेकर माना जाता है। राज्य में मराठों की आबादी 28 से 33 फीसदी है। राज्य की विधानसभा की कुल 288 सीटों में से 80 से 85 सीटों पर मराठा वोट निर्णायक माना जाता है।

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इसीलिए सत्ता में वापसी के लिए निश्चिंत होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के मैदान में डटे रहने के साथ ही बीजेपी के सारे स्टार प्रचारक मनोहर लाल खट्टर और देवेंद्र फडणवीस की सत्ता में वापसी के लिए दिन रात एक कर दिया। इससे ये साफ दिखता हैं कि बीजेपी दोनों प्रदेशों से विरोधी पार्टियों का पूरा सफाया कर अधिकांश सीटों पर अपना कब्जा जमाकर एक छत्र राज करने की फिराक में हैं। हरियाणा की चुनावी बिसात पर जातिगत समीकरणों को साधकर जिस तरह से सोची समझी रणनीति के तहत सियासी दलों ने अपने प्रत्याशियों को रण में उतारा है।

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इससे प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर मुकाबले से और रोचक होने के आसार हैं। समीकरणों को देखें तो यह बात तय है कि हरियाणा में इस बार जातिगत धुव्रीकरण का खेल जमकर खेला जाएगा। सियासी दल और उनके प्रत्याशी भी इन्ही समीकरणों में अपनी जीत की राह भी ढूंढ रहे हैं। हालांकि पांच साल बाद भी महाराष्ट्र और हरियाणा में हो रहे चुनावों के पैटर्न में कोई बदलाव नहीं लग रहा है। बीजेपी के पास कहने को जो बातें 2014 के आम चुनाव में थीं वे ही विधानसभा चुनावों में भी हावी रहीं। पांच साल बाद महाराष्ट्र और हरियाणा में बीजेपी को वोट मांगने के लिए वही मुद्दा है जो आम चुनाव में रहा। राष्ट्रवाद, धारा 370 और वीर सावरकर बीजेपी के लिए जिताऊ चुनावी मुद्दे हैं।

 भाजपा का यह दांव कर सकता है कमाल

भाजपा का यह दांव कर सकता है कमाल

विपक्ष का जो हाल हैं उससे तो साफ है कि बीजेपी को सत्ता में वापसी को लेकर कोई शक नहीं है, अगर कुछ है तो वो सीटों को लेकर जरुर है। बीजेपी के चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक देने का एक मतलब ये भी जरूर है कि हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा के चलते उसे जाट वोटों की उतनी ही फिक्र है जितनी शरद पवार के चलते महाराष्ट्र में मराठा वोटों की।

हालांकि महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के बूते भाजपा ने सूबे के सबसे मजबूत वोट बैंक को काफी हद तक साध लिया है। कांग्रेस और एनसीपी के मराठा नेताओं की बीजेपी में दिलचस्पी की भी ये बड़ी वजह रही और वह बीजेपी में शामिल होने की लंबी कतार लग गयी थी। दरअसल बीजेपी इस बात को बखूबी समझती है कि मराठा उसके परंपरागत वोटर नहीं हैं! मराठाओं की पहली पसंद एनसीपी, उसके बाद शिवसेना और तीसरे नंबर पर कांग्रेस आती थी, लेकिन नरेंद्र मोदी की राजनीति ने इस समीकरण को पूरी तरह से तोड़ दिया है! हालांकि इस बार के चुनाव में मराठों का बड़ा तबका बीजेपी के साथ गया है क्योंकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठा समुदाय की सबसे बड़ी मराठा आरक्षण की मांग को पूरा कर बड़ा दांव चला था।

विपक्ष ने पहले ही हार मान ली!

विपक्ष ने पहले ही हार मान ली!

चुनाव प्रचार के दौरान ही रुख साफ हो चुका हैं कि विपक्ष पहले से ही हार मान चुका हैं। चुनाव प्रचार के आखिरी दौर से पहले सोनिया गांधी हरियाणा में रैली करने वाली थीं, लेकिन वो रद्द कर दी गयी। सोनिया गांधी के महाराष्ट्र में भी शरद पवार के साथ रैली किये जाने की बात सामने आयी लेकिन सोनिया गांधी हरियाणा के महेंद्रगढ़ में रैली करने वाली थीं जो बाद में राहुल गांधी के हवाले कर दी गयी। अरविंद केजरीवाल ने भी हरियाणा चुनावों को पहले रुचि दिखाई लेकिन पूरा चुनाव प्रचार बीत गया लेकिन वो तो झांकने तक नहीं गये। वे क्या हरियाणा की 90 सीटों में से 46 पर चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी का दिल्ली का कोई नेता भी हरियाणा में नहीं नजर आया।

भाजपा का 75 पार का लक्ष्‍य

भाजपा का 75 पार का लक्ष्‍य

बता दें 2014 में हरियाणा की 90 सीटों में से बीजेपी के हिस्से में 47 आयी थीं जबकि कांग्रेस ने 15 सीटें जीती थी। हालांकि, दूसरे नंबर पर आईएनडीएल रही जिसके 19 एमएलए विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे। तब दो सीटें हरियाणा जनहित पार्टी और एक-एक शिरोमणि अकाली दल और बीएसपी के खाते में जा पहुंची थीं। पांच निर्दलीय भी विधायक बने थे। यही वजह है कि इस बार बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बड़ा लक्ष्य रख दिया है। वैसे आम चुनाव में 300 पार का टारगेट तो पूरा हो ही चुका है। इस बार शाह ने हरियाणा में 75 पार का लक्ष्‍य रखा हैं। हरियाणा में 'मनोहर सरकार दोबारा बनाने की तैयारी चल रही है और इसी हिसाब से दो स्लोगन चल रहे हैं ‘इस बार-75 पार'और ‘फिर एक बार - मनोहर सरकार के नारे गूंज रहे हैं।

क्या विपक्षी पार्टियों का हो जाएगा सफाया ?

क्या विपक्षी पार्टियों का हो जाएगा सफाया ?


गौरतलब हैं कि 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 122 सीटें मिली थीं जबकि शिवसेना के 63 विधायक चुने गये थे। इस बार दोनों दल गठबंधन कर साथ चुनाव लड़ रहे हैं इसलिए अगर दोनों की पिछली बार की सीटें जोड़ दें तो ये संख्या 185 हो जाती है। गौर करने वाली बात ये हैं कि बीजेपी और शिवसेना महाराष्ट्र चुनाव इस बार मिल कर लड़ रहे हैं, पिछली बार अलग हो गये थे। बीजेपी ने शिवसेना नहीं बल्कि एनसीपी के सपोर्ट से सरकार बनायी थी। ये बात अलग है कि बाद में दोनों ने हाथ मिला कर एनसीपी को किनारे कर दिया। जिस हिसाब से एनसीपी और कांग्रेस नेताओं ने पार्टी छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन किया है, उससे तो यही लग रहा था कि विधानसभा चुनाव में बीजेपी विरोधियों का पूरी तरह सफाया कर देगी। इस बार भाजपा और शिवसेना दोनों दल गठबंधन कर साथ चुनाव लड़ रहे हैं इसलिए अगर दोनों की पिछली बार की सीटें जोड़ दें तो ये संख्या 185 हो जाती है।

 ओपनियन पोल की रिपोर्ट

ओपनियन पोल की रिपोर्ट

ओपिनियन पोल में इस बार बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के हिस्से में 225-232 सीटों का अनुमान लगाया जा रहा है। जन पोल के मुताबिक इस बार बीजेपी को 142-147 सीटें मिल सकती हैं जबकि शिवसेना को 83 से 85 सीटें मिल सकती हैं। इससे पहले एबीपी न्यूज-सी वोटर के ओपिनियन पोल में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को 200 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था। जन की बात ओपिनियन पोल भी महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को 48-52 सीटें मिलने का अनुमान लगा रहा है। एबीसी न्यूज-सी वोटर पोल में भी कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के 55 सीटें जीतने का अनुमान लगाया गया था। ओपिनियन पोल के हिसाब से तो कहीं से भी नहीं लगता कि महाराष्ट्र से कांग्रेस और एनसीपी का पूरी तरह सफाया होने जा रहा है।

हरियाणा चुनाव में बीजेपी का स्लोगन है अबकी बार 75 पार। हो सकता है बीजेपी 2014 के मुकाबले इस बार ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब हो, लेकिन ओपिनियन पोल भी पार्टी के लक्ष्य को पूरा होते नहीं देख रहे हैं। रिपब्लिक-जन की बात के ओपिनियन पोल में दावा किया गया है कि सत्ताधारी बीजेपी को हरियाणा में 58 से 70 सीटें जीतने की संभावना बन रही है। पोल के मुताबिक कांग्रेस भी 12 से 18 सीटें जीत सकती है. पोल के मुताबिक, साल भर से भी उम्र में छोटी जननायक जनता पार्टी के खाते में 5-8 सीटें आ सकती हैं। वैसे महीने भर पहले हुए एबीपी न्यूज सी वोटर ओपिनियन पोल में हरियाणा में बीजेपी के हिस्से में 46 फीसदी वोट शेयर जाने का अनुमान लगाया गया था।

इस हिसाब से बीजेपी के खाते में 78 सीटें संभावित मानी गयी थीं। हालांकि, उस ओपिनियन पोल में कांग्रेस को भी बढ़त बनाते माना गया था और बताया गया कि पार्टी हरियाणा में इस बार 22 सीटें जीत सकती है। बीजेपी के लिए तो नहीं लेकिन कांग्रेस के लिए ये संख्या फिलहाल काफी ज्यादा लग रही है। वो भी ऐसे में जब हरियाणा में कांग्रेस के भीतर ही खुली जंग छिड़ी हुई हो। पांच साल तक पीसीसी अध्यक्ष रहे अशोक तंवर कांग्रेस छोड़ चुके हैं और टिकट बंटवारे में भी उनके समर्थकों को हाशिये पर रखा गया है। जहां तक टिकटों का सवाल है तो भूपिंदर सिंह हुड्डा के दबदबे के चलते प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा को भी अपने लोगों को टिकट दिलाने में बहुत मुश्किल हुई है।

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