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पूर्वांचल में माफ़िया डॉन: भदोही के बाहुबली नेता विजय मिश्रा की कहानी

By Bbc Hindi
पूर्वांचल का माफ़िया
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नाम-पता पूछने के बाद, लोहे का बड़ा सा फाटक खुला. अंदर अहाते में सादे कपड़ों में कंधों पर बंदूक लटकाए दो लोग खड़े थे. उनके पीछे बड़ी-बड़ी गाड़ियों की एक लंबी कतार. उस कतार के पीछे एक यज्ञशाला दिख रही थी. अभी मैं हाथ में नोटपैड लिए माहौल समझ ही रही थी कि सामने सादे सफ़ेद कपड़ों में बाहुबली नेता विजय मिश्रा दिखे.

अगर पहले से पता नहीं होता तो ये विश्वास करना मुश्किल था कि 64 वर्षीय विजय मिश्रा पर एक वक़्त में 60 से ज़्यादा आपराधिक मुक़दमे थे. 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने जो शपथ पत्र दाख़िल किया था उसके मुताबिक़ उन पर 16 आपराधिक मुक़दमे थे. इनमें हत्या, हत्या के प्रयास और आपराधिक साज़िश रचने जैसे गम्भीर आरोपों वाले मुक़दमे भी शामिल हैं. हालांकि उन्होंने हमेशा सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए इन मुक़दमों को विपक्ष की साज़िश बताया.

भदोही का धानापुर गांव, बनारस से सिर्फ़ 50 किलोमीटर दूर है लेकिन घने कोहरे, ट्रैफ़िक और रास्ते में सड़क निर्माण के चलते दिल्ली से धानापुर पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई. यहाँ भदोही की ज्ञानपुर सीट से लगातार चौथी बार विधायक बने विजय मिश्रा का घर ढूँढने में हमें कोई मुश्किल नहीं हुई.

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बातचीत के लिए भीतर ले जाते हुए विजय मिश्रा बरामदे से कुछ दूरी पर मौजूद अपने घर की ओर बढ़ने लगे. भूल-भुलैया सी उस इमारत के बरामदों, जीनों और कमरों को पार करते हुए हम घर के बहुत अंदर मौजूद एक कमरे में इंटरव्यू के लिए बैठ गए. यह कमरा विजय मिश्रा का निजी कक्ष था जिसमें एक पलंग, कुछ काग़ज़ों और कपड़ों से भरी पेटियों के अलावा, हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें थीं.

एक नज़र उनके राजनीतिक सफ़र पर डालिए-

•भदोही से कांग्रेस ब्लॉक प्रमुख के रूप में तीन दशक पहले राजनीतिक यात्रा की शुरुआत

•ज्ञानपुर सीट से 2002, 2007 और 2012 में विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट से जीता

•अखिलेश यादव ने 'बाहुबली -विरोधी' छवि मज़बूत करने के लिए 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उनका टिकट काट दिया

•जवाब में विजय मिश्रा निषाद पार्टी के टिकट पर लड़े और मोदी लहर के बावजूद चुनाव जीते

पूर्वांचल में माफ़िया गैंगवार शुरू होने की कहानी

विजय मिश्रा ने राजनीति के शुरुआती दिनों के बारे में बताया, "1980 के आस-पास मैं भदोही आया और काम शुरू किया. यहां एक पेट्रोल पम्प मिल गया और मेरे कुछ ट्रक चलने लगे. कई बार व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी आकर धमाका देते. तब मेरे परिचित पंडित कमलापति जी ने कहा कि चुनाव लड़ो. उन्होंने ही टिकट दिलवाया और 1995 तक हम ब्लॉक प्रमुख हो गए. इस वक़्त तक हमारे राजीव गाँधी से बहुत अच्छे सम्बंध हो गए थे. उनके जाने के बाद कांग्रेस से नाता टूट गया. तभी हम नेता जी (मुलायम सिंह यादव) के सम्पर्क में आए."

कांग्रेस से सपा तक

विजय मिश्रा ने राजनीति के शुरुआती दिनों के बारे में बताया, "1980 के आस-पास मैं भदोही आया और काम शुरू किया. यहां एक पेट्रोल पंप खुल गया और मेरे कुछ ट्रक चलने लगे. कई बार व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी आकर धमकी देते. तब मेरे परिचित पंडित कमलापति जी ने कहा कि चुनाव लड़ो. उन्होंने ही टिकट दिलवाया और 1995 तक हम ब्लॉक प्रमुख हो गए. इस वक़्त तक हमारे राजीव गाँधी से बहुत अच्छे सम्बंध हो गए थे. उनके जाने के बाद कांग्रेस से नाता टूट गया. तभी हम नेता जी (मुलायम सिंह यादव) के संपर्क में आए."

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इसी बीच बैकग्राउंड में उनके कमरे में पड़ी चूहेदानी में फंसे एक चूहे के किकियाने की आवाज़ लगातार आ रही थी.

समाजवादी पार्टी में शामिल होने की कहानी याद करते हुए विजय जोड़ते हैं, "2000 के आस-पास नेताजी ने हमको बुलाकर अपनी एक समस्या का हल करने के लिए कहा. यहां शिवकरण यादव काके ज़िला पंचायत के अध्यक्ष होते थे. उन्होंने नेता जी को शायद गाली दे दी थी इसलिए नेताजी चाहते थे कि हर क़ीमत पर उन्हें अगले चुनाव में हराया जाए. उन्होंने हमें ज़िला पंचायत के तीन टिकट दिए और सब पर हमारे लोग जीत गए".

विजय मिश्रा का कहना है कि 2001 में उन्हें विधायक का टिकट इस शर्त पर मिला कि वे ज्ञानपुर के साथ-साथ हंडिया, भदोही और मिर्ज़ापुर के सपा उम्मीदवारों को जिताएंगे और साथ ही भदोही लोकसभा सीट भी जितवाएंगे. सभी सीटों पर सपा जीत भी गई.

वे कहते हैं, "2005 में हमारी पत्नी रामलली ज़िला पंचायत अध्यक्ष हो गईं. 2007 का चुनाव भी हम जीत गए. नेताजी का बाक़ी सब अच्छा था. मानते थे, अपने आदमी के साथ खड़े रहते थे लेकिन उनके यहाँ सिर्फ़ एक ही समस्या थी. उनके यहां जो भी राजनीति करे, उनके यादवों के नीचे ही करे."

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सपा से अलगाव

विजय मिश्रा के सपा से ख़राब होते रिश्तों के बारे में बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह कहते हैं, "विजय मिश्रा का सत्ता का विरोध करने का एक लंबा इतिहास रहा है. फिर वो चाहे सुश्री मायावती से इनकी लंबी लड़ाई हो या सपा से इनका विरोध. मिश्रा लंबे समय तक मुख़्तार अंसारी के गुट के प्रमुख स्ट्रैटेजिस्ट और उनके क़रीबी रहे हैं. इसलिए 2017 के राज्य चुनाव में अपनी बाहुबली विरोधी छवि पुख़्ता करने के लिए अखिलेश ने इनसे और मुख़्तार अंसारी दोनों से बराबर दूरी बनाते हुए यह संदेश दिया की अगर विजय का टिकट काटा है तो मुख़्तार को भी गले नहीं लगाया".

मिश्रा का राजनीतिक असर इतना था कि 2017 में बसपा, सपा और भाजपा सबसे लड़कर मोदी लहर में उन्होंने 20 हज़ार वोटों से ज्ञानपुर की सीट पर जीत दर्ज की. दूसरा उदाहरण 2014 में सपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने वाली उनकी बेटी सीमा का है. बिल्कुल ग़ैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाली सीमा को अचानक उतारा गया और मोदी लहर में भी एक लाख से ऊपर वोट बटोर कर वह भदोही से दूसरे नंबर पर रहीं.

आपराधिक इतिहास

विजय मिश्रा के ऊपर लगे कई आपराधिक मुक़दमों में जुलाई 2010 में बसपा सरकार में नंद कुमार नंदी पर हुआ जानलेवा हमला सबसे प्रमुख है. 12 जुलाई 2010 को इलाहाबाद में नंदी की हत्या के इरादे के किए गए एक बम विस्फोट में उनके एक सुरक्षाकर्मी और इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर विजय प्रताप सिंह सहित दो लोग मारे गए थे. नंदी इस हमले में घायल तो हुए लेकिन उनकी जान बच गई.

बाद में इस मामले में विजय मिश्रा नामजद रहे. फिर 2012 के चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कोर्ट में आत्मसमर्पण किया. पवन बताते हैं, "2012 के चुनाव से पहले जब वह आए तो उन्होंने एकदम साधु की वेशभूषा बना रखी थी. लंबी दाढ़ी, लंबे बाल. इसी तरह जेल में रहते हुए सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत गए."

विजय मिश्रा का कहना है कि यह सारे मुक़दमे झूठे हैं.

वे कहते हैं, "2009 फ़रवरी में भदोही में उपचुनाव होने थे, मैंने मायावती की मदद करने से इनकार किया तो वो नाराज़ हो गईं. मुझे पकड़ने के लिए पुलिस भेज दी. उसी वक़्त नेता जी भदोही में सभा कर रहे थे. हमने स्टेज से जनता को अपनी पत्नी रामलली के सिंदूर का वास्ता देते हुए कहा कि अब रामलली का सुहाग उन्हीं के हाथों में है. नेताजी ने कहा कि जिसकी हिम्मत हो पकड़कर दिखा दे हमें. और फिर वो हमें हेलिकॉप्टर में लेकर उड़ गए. बस इसी के बाद मायावती जी ने हम पर ये सब झूठे मुक़दमे डलवा दिए".

मिश्रा कहते हैं, "आप हमें 'बाहुबली' नहीं, जनबली कहिए. जनबली यानी जिसके साथ जनता का बल हो."

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मुलायम यादव परिवार पर

समाजवादी पार्टी को लेकर अपनी कड़वाहट वे छिपाते नहीं हैं, "नेताजी को जब तक विजय मिश्रा से काम था, तब तक हम बाहुबली नहीं थे और जब काम ख़त्म हो गया तो हम अचानक बाहुबली हो गए. अगर हम बाहुबली थे तो इन्होंने हमें 2012 में टिकट क्यों दिया? 2014 में हमारी बेटी को टिकट क्यों दिया? 2016 तक भी हमारी पत्नी को एमएलसी का टिकट क्यों दिया?"

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जिस निषाद पार्टी से विजय मिश्रा ने 2017 का चुनाव जीता था, उस पार्टी से उन्हें 'पार्टी के ख़िलाफ़ काम करने' की वजह से निलंबित किया जा चुका है. भाजपा की ओर अपने बढ़ते झुकाव की ओर इशारा करते हुए वह जोड़ते हैं, "महाराज जी (योगी आदित्यनाथ) काम तो ठीक कर रहे हैं लेकिन उनके अफ़सर अच्छे नहीं हैं. और जहाँ तक हमारी बात है, हमें तो हर बार भदोही की जनता और माता रानी की कृपा ही जिताती रही है. यह चुनाव भी मेरे लिए भदोही की जनता ही लड़ेगी".

वरिष्ठ पत्रकार उत्पल पाठक कहते हैं, "भदोही में कालीन के सिवा कोई उद्योग नहीं. चारों ओर से बनारस, प्रयागराज, प्रतापगढ़, ग़ाज़ीपुर और जौनपुर जैसे पूर्वांचल के महत्वपूर्ण शहरों से सटा भदोही एक छोटा सा लो-प्रोफ़ाइल क़स्बा है इसलिए यहां अपराधियों को शेल्टर दिलवाना और देना आसान रहा है. उतना ही आसान हथियारों के साथ-साथ अपहरण के लिए उठाए गए लोगों को छिपाना भी इसलिए भदोही हमेशा से अपराधियों के लिए कमोबेश एक सेफ़ ज़ोन की तरह रहा है".

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'ब्राह्मणवादी नेता' और 'देवी उपासक' की छवि

विजय मिश्रा की राजनीति में जाति के महत्व के बारे में बताते हुए उत्पल बताते हैं, "भदोही ब्राह्मण बहुल क्षेत्र है और माफ़िया नेताओं में हरिशंकर तिवारी के गोरखपुर तक सिमटने के बाद ख़ाली हुए स्पेस को विजय मिश्रा ने अपने लिए इस्तेमाल किया. उन्होंने एक रणनीति के तहत ख़ुद को पूर्वांचल के एकलौते ब्राह्मण माफ़िया नेता के तौर पर स्थापित किया. आईपीएस अफ़सर से लेकर सिपाही तक, जज से लेकर वकील तक, डॉक्टर से लेकर पत्रकार तक- हर कहीं ब्राह्मण कनेक्शन ढूँढकर लोगों को अपने खेमे में करने की कोशिश करना उनकी पुरानी आदत है".

उस पर इन्होंने जानबूझ कर अपनी छवि बड़े 'देवी उपासक' की बनाई है. साल में आने वाली दोनों नवरात्रियों में व्रत रखना, चुनाव जीतने के लिए बड़े बड़े यज्ञ करवाना और हिंदू त्योहारों पर बड़ी पूजाएँ आयोजित करना उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं.

उनका मुंबई कनेक्शन

जौनपुर और प्रतापगढ़ के साथ-साथ भदोही भी पूर्वांचल का वो इलाक़ा है जहां से बड़ी संख्या में लोग मुंबई की ओर पलायन करते हैं. पवन बताते हैं, "मुंबई पलायन कर चुके ज़्यादातर भदोही वासियों के लिए विजय मिश्रा महत्वपूर्ण नाम है. फ़ोन करके काम करवाने से लेकर रुपए-पैसे से मदद करने तक मुंबई में बसने और फलने-फूलने में इन्होंने अपने लोगों की काफ़ी मदद की है इसलिए पलायन कर चुकी भदोही की जनता भी इनकी 'गुड बुक्स' में रहना चाहती है, वोट देती है, हर संभव मदद करती है और समय-समय पर 'बाबा का आशीर्वाद' लेने चली आती है".

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English summary
Mafia Don in Purvanchal The Story of Vijay Mishra the Bahubali leader of Bhadohi

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