2024 के लोकसभा चुनाव समय से पहले होंगे, विपक्ष के दावों में क्यों नहीं है दम? 7 वजहें जानिए

विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की मुंबई बैठक से ठीक पहले 2024 के लोकसभा चुनाव समय से पूर्व कराए जाने के दावों ने जोड़ पकड़ लिए हैं। तमलिनाडु के सीएम एमके स्टालिन, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से भी इसी तरह के दावे किए गए हैं।

नीतीश इससे पहले जून में भी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से तय समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए जाने का दावा कर चुके हैं। ऊपर से केंद्र सरकार ने रसोई गैस की कीमत एक ही बार में 200 रुपए घटाकर विपक्ष को अपने दावों में दम बताने का मौका भी दे दिया है।

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अगर तथ्यों, अतीत के अनुभवों और पीएम मोदी के काम करने के तरीकों पर बारीकी से गौर करें तो विपक्षी दलों के इस दावे में दम नहीं लगता। इसके कई सारे कारण हैं। यहां हम मोटे तौर पर 7 वजहों की चर्चा करना चाहते हैं।

5 राज्यों में विधानसभा चुनाव
अगले साल लोकसभा चुनाव होंगे, उससे पहले इसी साल के आखिर में 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से सिर्फ मध्य प्रदेश में ही बीजेपी की सरकार है। यानी एंटी इंकंबेंसी का सामना चार राज्यों में उन दलों को करना है, जो सत्ता में काबिज हैं। बीजेपी अपने लिए राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में काफी संभावनाएं देख रही है। तेलंगाना में वह अपनी पूरी ताकत झोंक चुकी है। वहां मौजूदा सरकार को 10 साल की एंटी इंकंबेंसी झेलनी पड़ रही है। एमपी में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ओर से जबर्दस्त चुनावी नेटवर्किंग चल रही है। ऐसे में बीजेपी इन राज्यों के परिणामों पर पहले गौर क्यों नहीं करना चाहेगी।

राम मंदिर का उद्घाटन
राम मंदिर आंदोलन और बीजेपी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अगले साल जनवरी के तीसरे हफ्ते में इसका उद्घाटन होना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका शिलान्यास किया था तो उसके उद्घाटन को भी पार्टी भव्य स्वरूप देना चाहेगी। ऐसे में राम मंदिर की शुरुआत से पहले बीजेपी चुनावों में क्यों जाना चाहेगी। इससे चुनाव तैयारियों पर भी असर पड़ सकता है। क्योंकि ममता बनर्जी ने दावा किया है कि भाजपा दिसंबर में चुनाव करवाने की तैयारी कर रही है। दावे तो भाजपा की ओर से चुनावों के लिए हेलीकॉप्टर तक बुक कर लिए जाने चल रहे हैं।

महंगाई कम होने का इंतजार
रसोई गैस सिलेंडर के दाम 200 रुपए कम होने पर विपक्ष ही खूब सारी बातें कह रहा है। कहा जा रहा है यह सब चुनावों को देखते हुए किया गया है। पेट्रोल-डीजल के भी दाम कम होने के कयास लगाए जा रहे हैं। अगर इसका चुनावों से संबंध है तो पांच राज्यों में तो वह होने ही वाले हैं। इसलिए दाम कम होने का फिलहाल लोकसभा चुनावों से कोई मतलब नहीं लगता।

विपक्षी गठबंधन के 'बिखरने' का इंतजार!
विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की तीसरी बैठक से पहले ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नामों की होड़ लग गई है। इससे पहले इनका स्टैंड यही था कि यह चेहरा चुनावों के बाद तय होगा।
तथ्य ये है कि इंडिया गठबंधन की पटना बैठक से पहले जीतन राम मांझी का कुनबा महागठबंधन से छिटक चुका है। बेंगलुरु बैठक से पहले एनसीपी दो फाड़ हो चुकी है और शरद पवार से बगावत की अगुवाई पटना बैठक में शामिल पार्टी के एक बड़े नेता प्रफुल्ल पटेल ने ही की है। खुद शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार के बीच आज भी क्या डील है, इसके बारे में उन दोनों के अलावा दावे के साथ कोई कुछ भी नहीं कह सकता। खुद बड़े पवार के सहयोगी दल भी उन्हें संदेह की नजरों से देखते रहे हैं।

मुंबई बैठक से पहले ममता बनर्जी को टीएमसी, अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी, उद्धव ठाकरे को शिवसेना (यूबीटी), नीतीश कुमार को जेडीयू, अरविंद केजरीवाल को आम आदमी पार्टी के किसी न किसी नेता की ओर से पीएम चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया गया है। जबकि, राहुल गांधी को कांग्रेस इसका स्वाभाविक दावेदार मानकर चलती है। ऐसे में मौजूदा दौर की राजनीति के माहिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष की इस स्थिति को देखने के बाद भी जल्दबाजी क्यों करना चाहेंगे?

यूनिफॉर्म सिविल कोड
देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना भाजपा के तीन सबसे प्रमुख एजेंडों में शामिल रहा है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का पार्टी का सपना साकार हो रहा है और कश्मीर से धारा-370 हट चुका है। यूसीसी का मुद्दा खुद प्रधानमंत्री के स्तर से उठाया जा चुका है। जाहिर है कि पार्टी चुनावों में जाने से पहले इसे भी किसी ठोस मुकाम तक पहुंचाना चाहेगी, जिसका उसे लाभ भी मिल सकता है। बीजेपी का यह कोर प्रोजेक्ट अभी अधूरा है।

चुनावों से पहले मोदी सरकार को कई वादे पूरे करने हैं
पीएम मोदी ने इस साल के 15 अगस्त के भाषण में देश को 2047 तक का रोडमैप दिखा दिया है। महिलाओं और परंपरागत रोजगार से जुड़े कारीगरों के लिए योजना शुरू की जा रही हैं। कई सारे प्रोजेक्ट भी 2024 लोकसभा चुनावों के निर्धारित समय से पहले पूरे होने हैं। ऐसे में पीएम मोदी जल्दबाजी क्यों करना चाहेंगे, जबकि उनके पास मौजूदा कार्यकाल में ही बहुत कुछ करने का अवसर उपलब्ध है। इस लाभ को वह खुद ही क्यों गंवाना चाहेंगे? जबकि, वह यही कहते हैं कि जिसका शिलान्यास करते हैं, उसका उद्घाटन भी करें, उनकी रणनीति और कार्य करने का यही तरीका रहा है। यही नहीं, अगले साल संक्षिप्त ही सही उन्हें बजट पेश करने का मौका भी मिलेगा और वह भी एक अच्छा हथियार हो सकता है।

2004 के चुनाव का बहुत ही बुरा अनुभव
2004 में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं थी। तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी कई दलों की एनडीए सरकार की अगुवाई कर रहे थे। लेकिन, सरकार काफी मजबूत थी। उसके मुकाबले विपक्ष कहीं नजर नहीं आ रहा था। देश में 'इंडिया शाइनिंग' और 'फील गुड' का नारा भाजपा की ओर से बुलंद किया गया था। सरकार पूरी निश्चिंतता में थी। समय से पहले चुनाव करवाने का फैसला लिया गया और बीजेपी को 10 साल का वनवास मिला। क्या पार्टी फिर से वही वाली गलती फिर से दोहराना चाहेगी?

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