बिहार में राजनीति के दिलजले, न घर के रहे न घाट के

नई दिल्ली। गये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। बिहार में दलबदलू नेताओं की यही हालत है। लोकसभा चुनाव के लिए सभी 40 सीटों पर तस्वीर साफ हो चुकी है। अधिकतर सीटों पर उम्मीदवार तय हो गये हैं। सियासी रंगमंच से पर्दा हटने के बाद दलबदलू नेताओं को जोर का झटका लगा है। उनके पास अब एक ही रास्ता बचा है कि वे निर्दलीय मैदान में ताल ठोकें। ऐसे नेताओं में मौजूदा सांसद और पूर्व मंत्री भी हैं। लोभ-लालच और अहंकार ने इन्हें न घर का रखा न घाट का।

अरुण कुमार

अरुण कुमार

अरुण कुमार 2014 में जहानाबाद से रालोसपा के टिकट पर सांसद चुने गये थे। बीच सफर में ही उनकी रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा से खटपट शुरू हो गयी। दल में रह कर भी अपने मन की करते रहे। कभी नीतीश और जार्ज फर्नांडीस के करीब रहे अरुण कुमार को मजबूत नेता माना जाता था। नीतीश से झगड़ा होने के बाद वे उपेन्द्र कुशवाहा के संग आये थे। इनसे भी पटरी नहीं बैठी। भूमिहारवाद के नाम पर खुद की पार्टी बनायी। गांधी मैदान में रैली की, लेकिन फुस्स हो गयी। 2015 में जब अनंत सिंह की नीतीश सरकार ने गिरफ्तारी करायी थी तब अरुण कुमार ने नीतीश की छाती तोड़ने की धमकी दी थी। बाद में भाजपा के खिलाफ भी बयान देते रहे। 2019 के चुनाव के पहले अरुण कुमार की हालत कटी पतंग की तरह हो गयी। एनडीए ने इनके लिए नो इंट्री का बोर्ड टांग दिया था। कुशवाहा पहले से ही रंज थे। लालू के खिलाफ लड़ने वाले अरुण के राजद में जाने की चर्चा होने लगी। लेकिन राजद ने भूमिहार समुदाय के इस दबंग नेता में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। घर तो छोड़ दिया लेकिन कोई ठिकाना नहीं मिला। सांसद रहते हुए भी उनकी ऐसी हालत हो गयी।

रामा सिंह

रामा सिंह

रामा सिंह उर्फ रामाकिशोर सिंह दबंग नेता माने जाते हैं। बाहुबली रामा सिंह को रामविलास पासवान ने सांसद बनाया था। 2014 में वे वैशाली सीट से चुने गये थे। लोजपा में उनकी पूछ भी थी। लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे के सवाल पर उनकी रामविलास पासवान से ठन गयी। उन्होंने उपेक्षा का आरोप लगाया और लोजपा को नतीजा भुगतने की चेतावनी दी। विधानसभा चुनाव में एनडीए के खिलाफ प्रचार करने लगे। पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। कई कोशिशों के बाद भी उनकी पासवान से सुलह नहीं हो सकी। 2019 चुनाव के पहले से ये बात पक्की थी कि रामा सिंह को कोई नया ठिकाना खोजना होगा। महागठबंधन में सीट को लेकर पहले मारामारी मची थी। वैसे भी वैशाली से राजद के लिए रघुवंश प्रसाद सिंह की सीट लॉक थी। रामा सिंह एक दूसरे राजपूत बहुल क्षेत्र शिवहर पर उम्मीद लगाये बैठे थे। वे राजद से टिकट चाहते थे। लेकिन इस उम्मीद पर भी पानी फिर गया।

उदय नारायण चौधरी

उदय नारायण चौधरी

बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी 2015 का विधानसभा चुनाव हार गये थे। नीतीश के खासमखास थे लेकिन उन्हीं से लड़ बैठे। कुछ पाने की उम्मीद में शरद यादव की पार्टी में गये। वे जमुई रिजर्व सीट पर लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन महागठबंधन में शरद यादव की चली ही नहीं। गिर पड़ कर किसी तरह अपने लिये टिकट जुटाया। उदय नारायण चौधरी मुंह ताकते रह गये। उदय नारायण खुद को दलित राजनीति का बड़ा नेता मानते हैं, लेकिन किसी दल ने उनको घास नहीं डाली।

रामजतन सिन्हा

रामजतन सिन्हा

बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रामजतन सिन्हा एक समय भूमिहार समुदाय के बड़े नेता माने जाते थे। कांग्रेस के दिन गिरे तो वे हाशिये पर चले गये। यहां वहां की सैर भी की। 2019 लोकसभा चुनाव के ठीक पहले वे जदयू में शामिल हुए थे। उन्हें उम्मीद थी कि नीतीश कुमार जहानाबाद सीट पर उन्हें मौका देंगे। लेकिन नीतीश ने इस सीट पर पिछड़ा कार्ड खेला और चंदेश्वर चंद्रवंशी को टिकट दे दिया।

लवली आनंद

लवली आनंद

लवली आनंद बिहार के बाहुबली नेता आनंद मोहन की पत्नी हैं। आनंद मोहन अभी जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। उनकी राजपूत समुदाय में अच्छी पैठ है। लवली आनंद ने 1994 में लालू यादव के दबदबे को तोड़ कर वैशाली से लोकसभा का उपचुनाव जीता था। इसके बाद लवली और आनंद मोहन की बिहार की सियासत के मजबूत किरदार बन गये। लेकिन दोनों का राजनीति में कहीं एक जगह मन नहीं रमा। चुनाव जीतने के लिए इधर उधर जाते रहे। आनंद मोहन को जेल हो गयी। लवली आनंद का सितारा गर्दिश में चला गया। 2019 लोकसभा चुनाव के पहले वे इस उम्मीद से कांग्रेस में गयी थीं कि शिवहर से उन्हें उम्मीदवार बनाया जाएगा। आनंद मोहन एक बार शिवहर से लोकसभा चुनाव जीत चुके थे। लेकिन सीट बंटवारे में शिवहर सीट राजद के खाते में चली गयी। अब नाराज लवली ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का एलान किया है।

कई और भी हैं दिलजले

पूर्व केन्द्रीय मंत्री नागमणि, बिहार के पूर्व मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा, नरेन्द्र सिंह की उम्मीदों पर भी पानी फिरा है। नागमणि राजनीति पर्यटक रहे हैं। कई दलो में घूमने के लिए विख्यात नागमणि समरस समाज पार्टी चला रहे थे। 2017 में वे उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी में मिल गये थे। बाद में उपेन्द्र कुशवाहा ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारी अध्य़क्ष बनाया था। नागमणि काराकाट से चुनाव लड़ना चाहते थे। बात बन नहीं रही थी। फरवरी 2019 में नागमणि ने आरोप लगाया कि उपेन्द्र कुशवाहा ने मोतिहारी सीट 10 करोड़ रुपये में माधव आनंद को बेच दी है। इसके बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी। भगवान सिंह कुशवाहा भी उपेन्द्र कुशवाहा के साथ थे। दिसम्बर 2018 में रालोसपा छोड़ दी। आरा सीट पर चुनाव लड़ने की आस में उन्होंने जदयू का दामन थामा था। लेकिन सीट बंटवारे में आरा सीट भाजपा को मिली। यह उसकी जीत हुई सीट थी। इसी तरह नीतीश के करीबी रहे पूर्व मंत्री नरेन्द्र सिंह जीतन राम मांझी के साथ थे। बांका से चुनाव लड़ने की तमन्ना में वे फिर नीतीश के साथ आये। लेकिन जदयू ने यहां से गिरधारी यादव को अपना उम्मीदवार बना दिया।

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