यूपी की वो 17 सीटें, जहां भाजपा पर भारी पड़ सकता है SP-BSP-RLD का महागठबंधन

यूपी की 17 सीटों पर सपा-बसपा और आरएलडी का महागठबंधन भाजपा पर भारी पड़ सकता है। जानिए कौन सी हैं वो सीटें...

नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े सूबे और केंद्र की कुर्सी के लिए बेहद अहम माने वाले उत्तर प्रदेश में सियासी मैदान सज चुका है। 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 में से 71 सीटें जीतने वाले एनडीए के लिए इस बार राह आसान नजर नहीं आ रही है। सपा-बसपा-आरएलडी के महागठबंधन और बदली हुई रणनीति के तहत यूपी के सियासी मैदान में उतरी कांग्रेस ने प्रदेश की 17 लोकसभा सीटों पर भाजपा की चुनौती को काफी हद तक बढ़ा दिया है। खबर है कि इस बदले हुए सियासी माहौल में सत्ता विरोधी लहर से बचने के लिए भारतीय जनता पार्टी यूपी के कई मौजूदा सांसदों के टिकट काट सकती है। हालांकि टिकट कटने की स्थिति में बागी नेताओं के कारण संभावित नुकसान भी पार्टी की चिंता बढ़ा सकता है।

RLD के आने से मुश्किल हुई राह

RLD के आने से मुश्किल हुई राह

ईटी की खबर के मुताबिक, 2014 में यूपी में जीती गई 71 सीटों में से 17 सीटें ऐसी हैं, जहां 2019 में जीत हासिल करना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। इन सीटों में सबसे पहला नंबर है पश्चिमी यूपी की बागपत लोकसभा सीट का। बागपत लोकसभा सीट से वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह सांसद हैं। सपा-बसपा के महागठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के शामिल होने से इस सीट पर भाजपा की जीत की संभावना अब धुंधली हो गई है। बागपत लोकसभा सीट से अजीत सिंह के बेटे और आरएलडी के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी चुनाव मैदान में उतरने की घोषणा कर चुके हैं। वहीं, मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से आरएलडी अध्यक्ष अजीत सिंह चुनावी ताल ठोंक रहे हैं। अजीत सिंह के उतरने से मुजफ्फरनगर सीट के समीकरण भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं।

इलाहाबाद सीट पर मिल सकती है चुनौती

इलाहाबाद सीट पर मिल सकती है चुनौती

सपा और बसपा के साथ आने से यूपी की इलाहाबाद सीट पर भी भाजपा के लिए मुकाबला बेहद कड़ा हो गया है। समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद रेवती रमण सिंह 2009 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से जीते थे। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार श्यामा चरण गुप्ता के सामने उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हाल ही में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुईं यूपी के बहराइच (सुरक्षित सीट) से लोकसभा सांसद सावित्री बाई फूले इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर सकती हैं। ऐसी स्थिति में बहराइच सीट पर मुकाबला भाजपा के लिए कठिन हो जाएगा। इस सीट पर बड़ी संख्या में कुर्मी समुदाय के वोट हैं और अगर बेनी प्रसाद वर्मा सावित्री बाई फुले को समर्थन देते हैं, तो उनके लिए जीत का राह काफी आसान हो जाएगी।

केशव प्रसाद मौर्य को फिर उतार सकती है BJP

केशव प्रसाद मौर्य को फिर उतार सकती है BJP

इनके अलावा यूपी की बाराबंकी लोकसभा सीट (सुरक्षित) भी इस बार भाजपा के लिए कठिन चुनौती मानी जा रही है। बाराबंकी सीट से कांग्रेस के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद पीएल पूनिया अपने बेटे तनुज के लिए टिकट मांग रहे हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में पीएल पूनिया ने इस सीट पर जीत हासिल की थी। इसके बाद भाजपा उम्मीदवार प्रियंका रावत ने 2014 के लोकसभा चुनाव में पूनिया को हराकर इस सीट पर जीत हासिल की। इससे पहले यूपी की कैराना, फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। सियासी जानकारों की मानें तो कैराना में महागठबंधन का उम्मीदवार भाजपा पर फिर से भारी पड़ सकता है। वहीं, भाजपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पार्टी अपनी खोई हुई फूलपुर लोकसभा सीट हासिल करने के लिए यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को चुनाव मैदान में उतार सकती है।

वो सीटें, जहां सपा-बसपा से मिलेगी चुनौती

वो सीटें, जहां सपा-बसपा से मिलेगी चुनौती

अगला नंबर यूपी की कानपुर लोकसभा सीट का है, जहां से वर्तमान में पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी सांसद हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो अगर मुरली मनोहर जोशी ने इस बार चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया तो भाजपा के लिए कानपुर सीट पर मुकाबला काफी कड़ा हो सकता है। वहीं, यूपी की अकबरपुर और अंबेडकर नगर दो ऐसी सीटें हैं, जहां बसपा सुप्रीमो मायावती की अच्छी पकड़ है। इन दोनों सीटों पर भाजपा की राह मुश्किल नजर आ रही है। इनके अलावा यूपी की कुछ ऐसी सीटें भी हैं, जहां भाजपा को समाजवादी पार्टी से कड़ी चुनौती मिल सकती है। ये सीटें हैं- बलिया, भदोही, चंदौली, फतेहपुर और देवरिया, यहां सपा की मजबूत पकड़ है। यूपी की उन्नाव सीट पर भी इस बार भाजपा के लिए जीत हासिल करना आसान नजर नहीं आ रहा।

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