Lok Sabha Election Exit Poll 2024: आखिर क्यों मुश्किल हो रहा मोदी को हराना, कहां चूक रहा विपक्ष?
Lok Sabha Election Exit Poll 2024: लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरह से तमाम एग्जिट पोल लगातार तीसरी बार मोदी सरकार बनने की ओर इशारा कर रहे हैं उसके बाद विपक्ष ने फिर से अपना पुराना राग अलापना शुरू कर दिया है। कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर से साफ कर दिया है कि वह चुनाव प्रक्रिया, मीडिया को हार के लिए निशाना बनाएगी।
तमाम एग्जिट पोल को कांग्रेस ने मोदी-मीडिया एग्जिट पोल कहना शुरू कर दिया है। एक के बाद एक लगातार चुनाव में हार के बाद कांग्रेस पार्टी अभी भी हार से बच निकलने की राह तलाश रही है, बजाए इसके कि हार की वजहों पर मंथन किया जाए।

आत्ममंथन की बजाए दोषारोपण
किसी भी समस्या का हल निकालने के लिए सबसे अहम होता है कि समस्या को स्वीकार किया जाए, जबतक समस्या की वजह की स्वीकृति नहीं होगी, उसका हल निकलना असंभव है, कुछ ऐसा ही कांग्रेस पार्टी के साथ होता नजर आ रहा है। कांग्रेस पार्टी अभी भी हार की वजह को स्वीकारने की बजाए दोषारोपण में जुटी है।
देश के सबसे लोकप्रिय नेता मोदी
एग्जिट पोल के आंकड़ों पर विश्वास करें तो 4 जून को एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार बनाने जा रहे हैं। देश में कई ऐसे प्रधानमंत्री हुए हैं जिन्होंने लंबे समय तक देश की बागडोर संभाली है।
लेकिन बतौर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के कार्यकाल को मिला लें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के आजाद इतिहास के सबसे लोकप्रिय नेता नजर आते हैं। वह देश के इतिहास में सर्वाधिक सफल नेता हैं, जिन्हें अभी तक हराया नहीं जा सका है।
यूपी-उत्तराखंड बेहतरीन मॉडल
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों की बात करें तो यहां भी भाजपा फिर से वापसी करती नजर आ रही है। पार्टी को यहां सत्ता में होने का लाभ मिल रहा है।
लोक कल्याणकारी योजनाएं, जवाबदेही और प्रभावी कामकाज के तरीके के बल पर पार्टी ने देश की राजनीति में बदलाव लाने का काम किया है। ऐसे में भाजपा का यह मॉडल अन्य राजनीतिक दलों के लिए बेहतर उदाहरण साबित हो सकता है।
जातिगत राजनीति बेअसर
देश की राजनीति में आज भी जाति अहम मुद्दा है। लेकिन पूरी तरह से जातिवादी और क्षेत्रीय राजनीति का दौर अपनी लोकप्रियता खो रहा है। जातिगत राजनीति पर आधारित पार्टी राष्ट्रीय नता दल और समाजवादी पार्टी परिवारों को राजनीति में आगे बढ़ाने का विकल्प मात्र नजर आने लगी हैं।
तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव अहम पदों पर मौजूद हैं। लालू प्रसाद यादव ने अपनी बेटी मीसा भारती को राजनीति में उतार दिया, वह राज्यसभा सांसद हैं। वहीं रोहिणी आचार्य इस बार लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं। ऐसे में जाति के नाम पर मतदाताओं को रिझा पाना आसान नहीं होगा।
संविधान खतरे में
इस चुनाव में संविधान को बचाने का मुद्दा विपक्ष ने जोरशोर से उठाया। लेकिन मतदाताओं पर इस मुद्दे का कोई खास असर होता नहीं दिखा।
भाजपा ने आसानी से इस मुद्दे को दरकिनार किया और स्पष्ट किया कि कोई भी ताकत भारत के संविधान को छू नहीं सकती है। लिहाजा राहुल गांधी का चुनावी रैलियों में संविधान की प्रति ले जाना बेअसर नजर आ रहा है।
आरक्षण का मुद्दा विफल
विपक्ष ने आरक्षण के मुद्दे को भी लोगों के बीच उठाया और दावा किया कि भाजपा सरकार फिर से आई तो आपका आरक्षण खत्म हो जाएगा। लेकिन भाजपा सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें तो ऐसा कतई होता नहीं दिखा है।
पीएम मोदी के नेतृत्व में संस्थान और मजबूत हुए हैं, यहां लोगों का प्रतिनिधित्व स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है। एक तरफ देश की राष्ट्रपति महिला आदिवासी हैं तो दूसरी तरफ तीन दलित जज सुप्रीम कोर्ट में हैं। इस तरह के कई उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि भाजपा सामाजिक न्याय को असल मायनों में लागू करती है।
दक्षिण में भाजपा की पैठ
दक्षिण भारत में भाजपा की पैठ की बात करें तो यह पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है, यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता देशभर में बढ़ी है। कर्नाटक में भाजपा सत्ता में रही है। पुड्डुचेरी में भी पार्टी सत्ता में साझेदार है। कर्नाटक और तेलंगाना में पार्टी के सांसद हैं। पहली बार देश के विदेश मंत्री और वित्त मंत्री तमिलनाडु से हैं।












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