Lok Sabha Election 2024: बंगाल में कांग्रेस के खिलाफ अचानक इतनी आक्रामक क्यों हो गई हैं ममता?

बंगाल में लोकसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे की चर्चा के बीच पिछले दिनों मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी अचानक कांग्रेस के खिलाफ काफी आक्रामक हो गईं। ममता के बर्ताव में आए बड़े बदलाव का विश्लेषण करें तो स्पष्ट लग रहा है कि उन्हें अपने सबसे बड़े वोट बैंक के खिसकने का डर सता रहा है।

टीएमसी सुप्रीमो पिछले कुछ समय से लगातार कह रही थीं कि 'इंडिया' ब्लॉक पूरे देश के लिए है और बंगाल में टीएमसी अकेले बीजेपी को हराने में सक्षम है। वह पहले कांग्रेस को राज्य में 2 सीटें देने को तैयार भी थीं, लेकिन बाद में दो टूक कहने लगीं कि तृणमूल कांग्रेस एक भी सीट नहीं छोड़ेगी।

mamata banerjee and congress

मुस्लिम-बहुल इलाके में घुसे राहुल तो बिफरीं ममता!
मुख्यमंत्री बनर्जी ने कांग्रेस के खिलाफ अपने तेवर उस दिन काफी आक्रामक कर लिए जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' लेकर राज्य के मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद में घुसे।

शुक्रवार को ममता बनर्जी ने एक धरने के दौरान कहा, 'मैंने कांग्रेस से कहा कि 300 सीटों पर लड़े (बाकी पर इंडिया ब्लॉक के अन्य साथी लड़ेंगे), लेकिन उन्होंने नहीं सुना। अब वे मुस्लिम वोटरों में बैचैनी पैदा करने के लिए राज्य में आए हैं।'

वो बोंली, 'बीजेपी हिंदू वोटरों में हड़बड़ी पैदा करने की कोशिश कर रही है। हमारी जैसी सेक्युलर पार्टियां क्या करेंगी? मैं नहीं जानती कि अगर (कांग्रेस) 300 सीटों पर लड़ती है तो 40 सीटें भी जीतेगी।'

बंगाल में 27% मुस्लिम वोट बैंक पर कब्जे की लड़ाई
बंगाल में 27% मुस्लिम वोटर हैं। परंपरागत तौर पर राज्य में मुस्लिम वोट बैंक पर एकतरफा लेफ्ट फ्रंट का कब्जा होता था। 2006 से लेकर 2008 तक राज्य में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जिसके बाद यह वोट बैंक पूरी तरह से ममता बनर्जी के साथ हो गया।

इनमें रिजवानुर रहमान आत्महत्या कांड, सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलन शामिल हैं। पिछले 5-6 वर्षों में राज्य में पंचायतों से लेकर विधानसभा चुनावों में भी यह मुस्लिम वोट बैंक पूरी तरह से टीएमसी के साथ नजर आया है।

इसी का परिणाम है कि 2021 के बंगाल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस-लेफ्ट में गठबंधन के बावजूद इन्हें एक भी सीट नहीं मिली। जबकि, जबकि इन्होंने इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) जैसी कथित 'कट्टर' मुसलमानों की पार्टी से भी तालमेल किया था।

2011 से ममता सरकार मुस्लिमों के प्रति रही है बेहद उदार
बंगाल में मुसलमानों का ममता की पार्टी के पीछे एकतरफा झुकाव की कई वजहें हैं। 2011 में सत्ता में आने के बाद से टीएमसी सरकार ने इस वोट बैंक को रिझाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ा है।

इमामों को भत्ता देने के साथ-साथ, मुस्लिम छात्रों को स्कॉलरशिप, उनके लिए वेलफेयर बोर्ड का गठन और सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसाओं के लिए 50 करोड़ रुपए अनुदान तक दिए हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और एनआरसी जैसे मसलों पर ममता विरोध में किसी भी हद तक जाने को तैयार बैठी रहती हैं।

सागरदिघी की हार से हताश हुई थीं ममता
दरअसल, एक साल पहले फरवरी 2023 में सागरदिघी विधानसभा उपचुनाव में लेफ्ट समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार बायरन बिस्वास की जीत ने ममता के कान खड़े कर दिए थे। यह सीट उसी मुर्शिदाबाद जिले में है, जहां 66.28% आबादी मुस्लिम है, जो प्रदेश में सबसे ज्यादा है।

हालांकि, बाद में बिस्वास भी टीएमसी में चले गए, लेकिन यह संदेश जरूर निकला कि बंगाल का मुसलमान भी मौका पाने पर ममता का साथ छोड़ भी सकता है।

सर्व-धर्म रैली में भी ममता को दिखी वोट बैंक की चिंता
22 जनवरी, 2024 को जब अयोध्या में भगवान राम लला के प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन किया गया था, तो ममता बनर्जी ने कोलकता में एक सर्व-धर्म रैली आयोजित की थी। लेकिन, उस मौके पर भी वह मुस्लिम वोटरों को यही आगाह करती रहीं कि टीएमसी की जगह किसी दूसरी पार्टी को वोट देकर 'अपना मत बर्बाद' न करें।

'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' ने ममता को किया 'आउट ऑफ कंट्रोल'
ममता की ओर से कांग्रेस को 40 सीटें मिलने पर भी नाउम्मीदी जताने वाला बयान उसी दिन आया, जिस दिन राहुल गांधी मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद और मालदा में अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा को लेकर घुसे थे।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत दर्ज करने के बाद से कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम वोट बैंक को वापस पाने के लिए अपने सारे घोड़े छोड़ रखे हैं। ममता के हालिया बयान में उसी मुस्लिम जनाधार के खिसकने का डर महसूस हो रहा है।

बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 7 सीटें मुस्लिम-बहुल हैं और अन्य 6 सीटों पर भी मुसलमान वोट निर्णायक साबित होते हैं।

2019 के लोकसभा चुनावों में इन 7 मुस्लिम-बहुल सीटों में से टीएमसी 3 जीती थी और बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटर वाली सभी सीटें भी यही जीत गई थी। इस चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट के बीच कोई गठबंधन नहीं हुआ था।

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